रविवार, 28 दिसंबर 2025
कुछ किताबों से भरा मासूम सा झोला गया …
और फिर धन्दा वहाँ हथियार का खोला गया.
प्यार का मौसम यदि रखना है क़ायम तो सुनें,
शब्द बोलें वो जिसे सो बार हो तोला गया.
एक परवाने की बातों से समझ आया यही,
मौत समझो जिस्म से जो प्यार का शोला गया.
आदमी की दोपहर उतनी ही तीखी हो गई,
ज़िन्दगी में रंग जितना धूप का घोला गया.
रौशनी करते हुए ही गुम फ़िज़ाओं में हुए,
जुगनुओं के जिस्म से जब रात का चोला गया.
इस कदर चालाकियाँ बिखरी हुई हैं हर तरफ़,
शब्द के भंडार में इक शब्द था भोला, गया.
घुस गई जब गंध वादी में नए बारूद की,
साथ खुश्बू के लरजती तितली का टोला गया.
आ गई दुनिया सिमिट के चिप के इस संसार में,
कुछ किताबों से भरा मासूम सा झोला गया.
शुक्रवार, 19 दिसंबर 2025
अर्थ गीता के जग में अटल हो गए …
माता यमुना के तेवर प्रबल हो गए
प्रभु सुदामा से मिल कर विकल हो गए
दो नयन रुक्मणी के सजल हो गए
कालिया पूतना सृष्टि लीला सकल
मोर-पंखी निरे कोतु-हल हो गए
तान छेड़ी मुरलिया की बेसुध किया
मंजरी ग्वाल-बाले अचल हो गए
सौ की मर्यादा टूटी सुदर्शन चला
पल वो शिशुपाल के काल-पल हो गए
रूह प्रारब्ध ही बस बचा किंतु तन
अग्नि, पृथ्वी, गगन, वायु, जल हो गए
कर के नारायणी कौरवों की तरफ़
कृष्ण ख़ुद पाण्डवों की बगल हो गए
इन्द्र के कोप से त्राण ब्रज का किया
तुंग गिरिराज भी तीर्थस्थल हो गए
सृष्टि मैं इष्ट मैं अंश सब में मेरा
श्याम वर्णी ये कह कर विरल हो गए
मथुरा-गोकुल से मथुरा से फिर द्वारका
युग के रणछोड़ योगी कुशल हो गए
राधे-राधे जपा हो गई तब कृपा
कुंज गलियन में जीवन सफल हो गए
द्वारिकाधीश जब से हुए सारथी
ख़ुद-ब-ख़ुद प्रश्न सम्पूर्ण हल हो गए
श्याम तेरी लगन और मीरा मगन
ख़ुद हला-हल तरल गंगा-जल हो गए
कर्म पथ, योग पथ, भक्ति पथ, धर्म क्या
अर्थ गीता के जग में अटल हो गए
शनिवार, 6 दिसंबर 2025
तुम साथ रहोगे तो सफ़र ठीक रहेगा ...
गुस्से को झटक दोगे तो सर ठीक रहेगा.
देना है जो अन्जाम किसी बात को, अब दो,
कुछ देर दवाओं का असर ठीक रहेगा.
छत फूस की होगी तो उड़ा लेंगी हवाएँ,
इसको जो बदल दोगे तो घर ठीक रहेगा.
क्योंकि था पिता जी को मिला, आपका हक हो,
बेहतर तो है तन्हा ये शिखर ठीक रहेगा.
अब ये न करो वो न करो ठीक नहीं है,
क्या मन में किसी बात का डर ठीक रहेगा.
चाहत है के आँगन में चहकते हों परिन्दे,
फूलों से लदा एक शजर ठीक रहेगा.
मुश्किल ही सही वक़्त गुज़र जाएगा यूँ तो,
तुम साथ रहोगे तो सफ़र ठीक रहेगा.
शनिवार, 8 नवंबर 2025
रोक ले जो यादों को ऐसा क्या शटर होगा ...
वक्त तो मुसाफ़िर है किसके पास ठहरा है,
आज है ये मुट्ठी में कल ये मुख़्तसर होगा.
मस्तियों में रहता है, हँस के दर्द सहता है,
तितलियाँ पकड़ता है, प्यार का असर होगा.
फ़र्श घास का होगा, बादलों की छत होगी,
ये हवा का घेरा ही बे-घरों का घर होगा.
पलकों की हवेली में ख़्वाब का खटोला है,
ख़ुश्बुओं के आँगन में, इश्क़ का शजर होगा.
छुट्टियों पे बादल हैं मस्त सब परिंदे हैं,
सोचता हूँ फिर कैसे, चाँद पे डिनर होगा.
नींद की खुमारी में, लब जो थरथराए हैं,
हुस्न को ख़बर है सब, इश्क़ बे-ख़बर होगा.
खिड़कियों को ढक लो तो धूप रुक भी जाती है,
रोक ले जो यादों को ऐसा क्या शटर होगा.
शनिवार, 1 नवंबर 2025
तक़दीर नई लिख पाऊँ मैं, ऐ काश वो पेंसिल आ जाए ...
इस बार करो कुछ तुम दिलबर, अब लौट के घर दिल आ जाए.
आँधी का इरादा लगता है, बादल भी गरजते हैं नभ पर,
मंज़िल पे कदम अब रखना है, आनी है जो मुश्किल आ जाए.
जाहिल हो के काबिल या फ़ाज़िल, कामिल हो के हो चाहे बिस्मिल,
चौबन्द रहे नाकेबंदी, इस बार जो क़ातिल आ जाए.
अभ्यास, मनन, चिंतन, मेहनत, हो जाए है पल में बे-मानी,
दो चार कदम चल कर झट से, कदमों में जो मंज़िल आ जाए.
अलमस्त हसीना दक्षिण की , हंस-हंस के मिला करती है जो,
उल्फ़त का तक़ाज़ा कर दूँगा, भाषा जो ये तामिल आ जाए.
चंदा की सुनहरी टैरस तक, कुछ वक़्त लगेगा आने में,
बादल हैं गगन पर कजरारे, बरसात न झिल-मिल आ जाए.
मुश्किल से जो मिलता है मुझको, हाथों से फ़िसल जाता है सब,
तक़दीर नई लिख पाऊँ मैं, ऐ काश वो पेंसिल आ जाए.
शनिवार, 25 अक्टूबर 2025
फिर सियासत को नया गठ-जोड़ दो ...
बुझ गए जो दीप मिल के फोड़ दो.
धूप ने आते ही बादल से कहा,
तुम तो बीडू रास्ता ये छोड़ दो.
तंग होते जा रहे हैं शहर सब,
गाँव की पगडंडियों को मोड़ दो.
दर्द हो महसूस बोले ही बिना,
दिल से दिल के तार ऐसे जोड़ दो.
जोड़ने की बात फिर से कर सके,
फिर सियासत को नया गठ-जोड़ दो.
सोमवार, 20 अक्टूबर 2025
दीपावली …
अमावस की हथेली से फिसल कर,
उजालों के दरीचे खुल रहे हैं.
प्रकाश पर्व की, असत्य पर सत्य की विजय की, राम जी के अयोध्या आगमन दिवस की समस्त जगत को हार्दिक शुभकामनाएँ … मँगल भव … 🌹🌹❤️🌹🌹🌹🌹
शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2025
रीत करवा की ...
इससे कहीं आगे है हम दोनों का सच
पल-पल का रिश्ता, जो है रोज़ का किस्सा
कहानी हर लम्हे की, प्रेम के उतरने की
मुझे यक़ीन है तेरी साधना पर
तेरे व्रत, तेरी प्रार्थना पर ...
जानता हूँ जुड़ जाएँगी कुछ नयी साँसें
आज फिर मेरे जीवन में
सुनो ...
एक संकल्प मैं भी लेना चाहता हूँ, आज
करना चाहता हूँ तमाम सांसें, साझा तेरे साथ
दुआ करना करवा माई से
स्वीकार हो मेरा भी संकल्प पूजा के साथ
मैं जानता हूँ जंगली गुलाब
तेरी हर बात सुनता है ऊपर वाला ...
सोमवार, 6 अक्टूबर 2025
तारीख ...
बदला हुआ तो कुछ भी नहीं था
ये हवा, हरियाली, फूल रेत, ये सडकें …
थे … पर बदले हुए नहीं
जुदा जुदा, अलग अलग, रोज़ से कुछ
सिवाय एक तारीख़ के
बदल गई जो
समय के एक पल के साथ
ले आता है जो हर साल, आज का दिन
और ले आता है झोली भर ख़ुशियाँ ...
कभी न ख़त्म होने वाला अहसास
हम दोनों का, सुख-दुःख का
इश्क़, मुहब्बत से गुज़रे हर उस वक़्त का
बुना था जिसे लम्हा-दर-लम्हा
नज़र-ब-नज़र हम दोनों के दरमियाँ ...
सोच की हद ...
ज़िन्दगी थोड़ी है,
इसलिए सोचा है
बस तुम्हें प्यार करूँगा ...
गुरुवार, 25 सितंबर 2025
माँ
आ गई २५ सितम्बर ... वैस तो माँ आस-पास ही होती है पर आज के दिन रह-रह के उसकी कमी महसूस होती है ... माँ जो है मेरी ... पिछले 13 सालों में उम्र पक गई, बूढ़ा भी हो गया पर उसे याद कर के बचपना घिर आता है …
माँ नायक अध्यापक रथ-संचालक होती है.
तिल-तिल जलती जीवन पथ पर दीपक होती है.
दख़ल बनी रहती जब तक घर गृहस्ती में माँ की,
हँसी-ठिठोली गुस्सा मस्ती तब तक होती है.
रिश्ते-नाते, लेन-देन, सुख-दुख, साँझ-सवेरा,
माँ जब तक होती है घर में रौनक होती है.
उम्र भले हो घर में सब छोटे ही रहते हैं,
बूढ़ी हो कर भी माँ सबकी रक्षक होती है.
देख के क्यों लगता है तुरपाई में उलझी माँ,
रिश्तों के कच्चे धागों में बंधक होती है.
बचपन से ले कर जब तक रहती हमें ज़रूरत,
संपादक हो कर भी वो आलोचक होती है.
कदम-कदम पे माँ ने की है क्षमता विकसित जो,
निर्णय लेने में पल पल निर्णायक होती है.
शनिवार, 20 सितंबर 2025
जो बनाते हैं अक्सर हवाई-क़िला ...
हम-सफ़र रह-गुज़र में मिले अन-गिनत,
जो भी हमसे मिला दर्द में तर मिला.
वक़्त पर चन्द पत्ते भी पतझड़ हुए,
वक़्त पर फूल भी मुस्कुरा कर खिला.
बूँद से बूँद मिल के नदी बन गई,
लोग जुड़ते रहे बन गया क़ाफ़िला.
चन्द लफ़्ज़ों ने घायल किया है उसे,
खुरदरी राह पर जो न अब तक छिला.
पेड़ टूटा जहाँ घास थी जस-की-तस,
जिसकी गरदन थी ऊँची वो जड़ से हिला.
उनको मिलती है मंज़िल भी बस ख़्वाब में,
जो बनाते हैं अक्सर हवाई-क़िला.
शुक्रवार, 12 सितंबर 2025
कान्हा - एक ग़ज़ल
मेरी एक ग़ज़ल वर्षा जी की आवाज़ में … वर्षा जी रायपुर की रहने वाली हैं और बहुत ही कमाल की आवाज़ है उनकी …
बहुत आभार वर्षा जी का इस कान्हा को समर्पित ग़ज़ल को आवाज़ देने के लिए …
पाँव कान्हा के छू कर विहल हो गए
माता यमुना के तेवर प्रबल हो गए
सौ की मर्यादा टूटी सुदर्शन चला
पल वो शिशुपाल के काल-पल हो गए
राधे-राधे जपा हो गई तब कृपा
कुंज गलियन में जीवन सफल हो गए
सोमवार, 8 सितंबर 2025
पर न जाने घर पे कितनी बार ही खटके हुए …
और कुछ लम्हे किसी दीवार पे अटके हुए.
हम है ठहरी झील की मानिन्द गुज़रे वक़्त की,
लोग आते है किसी की याद में भटके हुए.
डूबना तो था हमारे भाग्य में लिक्खा हुआ,
हम तो वो हैं तिनके से भी खींच के झटके हुए.
एक आवारा नदी से बह रहे थे दूर तक,
वक़्त के बदलाव में तालाब हम घट के हुए.
उगते सूरज को हमेशा साथ रखते हैं सभी,
हम हैं ढलती शाम जैसे धूप से पटके हुए.
नाप में छोटा बड़ा होना लिखा तक़दीर में,
हम क़मीज़ों से हैं अक्सर शैल्फ़ में लटके हुए.
क्या कहूँगा सोच कर खोला नहीं दर फिर कभी,
पर न जाने घर पे कितनी बार ही खटके हुए.
शनिवार, 16 अगस्त 2025
जन्माष्टमी …
युगपुरुष योगिराज द्वारकाधीश श्री कृष्ण जन्माष्टमी की सभी को हार्दिक बधाई और ढेरों शुभकामनाएँ … 🌹🌹
#janmashtami #जन्माष्टमी #krishna
शनिवार, 9 अगस्त 2025
जिसे समझ है उसे कैसे हिदायत भेजूँ ...
किसे मैं सिर्फ़ ये रेशम सी मुहब्बत भेजूँ.
यही है शर्त मुझे साथ ही रखना होगा,
तो कौन कौन है मैं जिसको ये दौलत भेजूँ.
चुकाना चाहते है क़र्ज़ के जैसे वे इसे,
किसी को कैसे में एहसान की लागत भेजूँ.
सहेजने के लिए कौन मुनासिब है बता,
में किसको रीति-रिवाजों की रिवायत भेजूँ.
ख़ुदा तो प्रेम को मैंने ही बनाया पहले,
में किसका दोष निकालूँ किसे लानत भेजूँ.
मेरा तो दिल भी मेरे पास नहीं रहता है,
में किसके पास कहो इसकी शिकायत भेजूँ.
वो ना-समझ भी जो लगते तो बता देता सब,
जिसे समझ है उसे कैसे हिदायत भेजूँ.
शनिवार, 2 अगस्त 2025
किसी के पास सदा वक़्त रुका होता है ...
हज़ार बार उठेगा जो लगी हो ठोकर,
उठा न फिर वो नज़र से जो गिरा होता है.
उसी जगह पे महकती है मुहब्बत पल-पल,
जहाँ-जहाँ भी तेरा ज़िक्र हुआ होता है.
न जाने कब ये बखेड़ा खड़ा करे कोई,
शरीफ़ दिल में जो शैतान छुपा होता है.
तुम्हारे साथ का मतलब ये समझ पाया हूँ,
हसीन मोड़ भी मंज़िल का पता होता है.
उसे यक़ीन है गंगा में धुलेंगे सारे,
गुनाह कर के वो हर बार गया होता है.
किसी को मिलने की ख़ुद से भी नहीं है फ़ुरसत,
किसी के पास सदा वक़्त रुका होता है.
शनिवार, 26 जुलाई 2025
लोगों के बीच बात ये नज़र-नज़र गई ...
उनकी तलाश में नज़र किधर-किधर गई.
चश्मा लगा के लोग काम पर चले गए,
सुस्ती को फिर जगह मिली जिधर-पसर गई.
घर लौटने की आस में कुछ लोग खप गए,
इक भीड़ गाँव-गाँव से शहर-शहर गई.
ख़ामोश तीरगी का शोर गूँजता रहा,
फिर ख़्वाब-ख़्वाब रात ये पहर-पहर गई.
जागा जो इश्क़, आरज़ू के पंख लग गए,
तितली बुझाने प्यास फिर शजर-शजर गई.
बादल के साथ-साथ रुख़ हवा का देख कर,
उम्मीद भी किसान की इधर-उधर गई.
लब सिल दिए सभी के पर सभी को थी ख़बर,
लोगों के बीच बात ये नज़र-नज़र गई.
शनिवार, 19 जुलाई 2025
सभी को बोलता हूँ मीत न पाया अब तक ...
में शब के साथ-साथ बीत न पाया अब तक.
दुआ जो जीतने की करती है अक्सर मेरी,
में उससे जीत कर भी जीत न पाया अब तक.
किसी के प्रेम की नमी ने भिगोया इतना,
नदी सा सूख के भी रीत न पाया अब तक.
हर एक मोड़ पर मिले हैं अनेकों रहबर,
तुम्हारी सोच के प्रतीत न पाया अब तक.
प्रवाह, सोच, लफ़्ज़, का है ख़ज़ाना भर के,
बहर में फिर भी एक गीत न पाया अब तक.
रुका हुआ हूँ, वक़्त बन्द घड़ी का जैसे,
में अपनी सोच से ही जीत न पाया अब तक.
किवाड़ ख़ुद ही दिल के बन्द किए हैं अकसर,
सभी को बोलता हूँ मीत न पाया अब तक.
बुधवार, 9 जुलाई 2025
कब तलक तिश्नगी नहीं जाती ...
और दिल से कभी नहीं जाती.
ये जुदाई सही नहीं जाती.
नींद, डर, ख्व़ाब, आते-जाते हैं,
मौत आ कर कभी नहीं जाती.
आँख से हाँ लबों से ना, ना, ना,
ये अदा हुस्न की नहीं जाती.
राज़ की बात ऐसी होती है,
हर किसी से जो की नहीं जाती.
शायरी छोड़ कर ज़रा सोचो,
मय निगाहों से पी नही जाती.
तट पे गंगा के आजमाएंगे,
कब तलक तिश्नगी नहीं जाती.
बुधवार, 2 जुलाई 2025
दोस्ती वैसे भी हमको है निभानी आपकी ...
क्या करूँ यादों का पर जो हैं पुरानी आपकी.
ज़ुल्फ़ का ख़म गाल का डिम्पल नयन की शोख़ियाँ,
रात मद्धम, खुश्क लम्हे, टुक सरकती ज़िन्दगी,
बज उठे ऐसे में चूड़ी आसमानी आपकी.
शोर उठा अब तक पढ़ी, बोली, सुनी, देखी न हो,
मुस्कुरा के हमने भी कह दी कहानी आपकी.
शुक्र है आँखों कि भाषा सीख कर हम आये थे,
वरना मुश्किल था पकड़ना बेईमानी आपकी.
फैंकना हर चीज़ को आसान होता है सनम,
दिल से पर तस्वीर पहले है मिटानी आपकी.
जोश में कह तो दिया पर जा कहाँ सकते थे हम,
गाँव, घर, बस्ती, शहर है राजधानी आपकी.
हमसे मिल कर चुभ गया काँटा सुनो जो इश्क़ का,
काम आएगी नहीं फिर सावधानी आपकी.
चाँद, उफुक, बादल, तेरा घर, बोल जाना है कहाँ,
दोस्ती वैसे भी हमको है निभानी आपकी.
शुक्रवार, 27 जून 2025
उम्र मुड़ के न आएगी पर साल में …
भूल जाओ इसे रख के पाताल में.
जीत ख़रगोश की हो या कछुए की हो,
फ़र्क़ होता है दोनों की पर चाल में.
धर्म, दौलत, नियंत्रण, ये सत्ता, नशा,
सब फ़रेबी हैं आना न तुम चाल में.
रिश्ते-नाते, मुहब्बत, ये बन्धन, वचन,
मौज लोगे न आओगे गर जाल में.
आप चाहें न चाहें ये बस में नहीं,
मिल ही जाएँगे कंकड़ हर इक दाल में.
अल-सुबह उठ के गुलशन में आए हो क्यूँ,
फूल खिलने लगे हैं हर इक डाल में.
तैरना-डूबना तो है सब को यहाँ,
जब उतरना हैं जीवन के इस ताल में.
साल-दर-साल आता है मुड़-मुड़ के कुछ,
उम्र मुड़ के न आएगी पर साल में.
शनिवार, 21 जून 2025
किरन जब खिलखिलाती है तेरी तब याद आती है …
तेरी आग़ोश में गुज़री हुई शब याद आती है.
इसी ख़ातिर नहीं के तू ही मालिक है जगत भर का,
मुझे हर वक़्त वैसे भी तेरी रब याद आती है.
मेरे चेहरे पे गहरी चोट का इक दाग है ऐसा,
ये दर्पण देख लेता हूँ तेरी जब याद आती है.
न थी उम्मीद कोई ज़िन्दगी से पर ये सोचा था,
न आएगी कभी भी याद पर अब याद आती है.
सफ़र आसान यूँ होता नहीं है ज़िंदगी भर का,
मुहब्बत में रहो तो दर्द की कब याद आती है.
किसी का अक्स जो तुम ढूँढती रहती हो बादल में,
कहूँ शब्दों में सीधे से तो मतलब याद आती है.
धरा पर धूप उतर आती है ले के रूप की आभा,
किरन जब खिल-खिलाती है तेरी तब याद आती है.
शनिवार, 14 जून 2025
उठा के हाथ में कब से मशाल बैठा हूँ ...
में कब से दिल में छुपा के मलाल बैठा हूँ.
नहीं है कल का भरोसा किसी का पर फिर भी,
ज़रूरतों का सभी ले के माल बैठा हूँ.
मुझे यकीन है पहचान है ज़रा मुश्किल,
लपेट कर में सलीक़े से खाल बैठा हूँ.
उदास रात की स्याही से डर नहीं लगता,
हरा भी लाल भी ले कर गुलाल बैठा हूँ.
नहीं है इश्क़ तो फिर बोल क्यों नहीं देते,
बिना ही बात में वहमों को पाल बैठा हूँ.
कभी तो झुण्ड परिन्दों का फँस ही जाएगा,
बहेलिया हूँ में फैला के जाल बैठा हूँ.
मुसाफिरों से ये कह दो के अब निकल जाएँ,
उठा के हाथ में कब से मशाल बैठा हूँ.
शनिवार, 7 जून 2025
बारिश ...
कर रही है बोर बारिश.
तुम कहाँ जाओगी जाना,
हो रही घनघोर बारिश.
टप टपा टप, टप टपा टप,
शोर ही बस शोर बारिश.
मार डाले लोग कितने,
उफ़ ये आदम-खोर बारिश.
डूब जाए ना सभी कुछ,
पृथ्वी के हर छोर बारिश.
कुछ हवाएं चल रही हैं,
होगी अब कमज़ोर बारिश.
दिल भिगोया मिल गए हम,
या ख़ुदा चित-चोर बारिश.
शनिवार, 31 मई 2025
एक दिन हमको मिला वो बीच से चटका हुआ ...
ख्व़ाब है बदनाम आवारा मेरा भटका हुआ.
मखमली सी याद है के पाँव की दस्तक कोई,
दिल के दरवाज़े में हलके से कहीं खटका हुआ.
ढेर सारी नेमतें ख़ुशियाँ उसी में बन्द हैं,
ट्रंक बापू का कबाड़े में जो है पटका हुआ.
हम तरक्क़ी के नशे में छोड़ कर हैं आ गए,
प्रेम धागा घर के रोशन-दान में लटका हुआ.
गुफ़्तगू करते थे खुद से आईने के सामने,
एक दिन हमको मिला वो बीच से चटका हुआ.
गुरुवार, 15 मई 2025
उनको तो सिर्फ एक ये चिल्लर दिखाई दे ...
ऐसा न काश एक भी मंज़र दिखाई दे
हाथों में हमको यार के खंजर दिखाई दे
अंदर से जो है काश वो बाहर दिखाई दे
सुख दुख के बीच कोई तो अन्तर दिखाई दे
बादल भी काश सोच समझ कर ले फैंसला
बरसें न गर ग़रीब का छप्पर दिखाई दे
कहते हैं लोग आज भी मेरे लिए यही
अंदर वही बशर है जो बाहर दिखाई दे
इंसान देख ले तो उसे दिख ही जाएगा
सब कुछ तो साफ़ साफ़ ही अंदर दिखाई दे
सिक्कों के साथ मन का ये बच्चा चहक उठा
उनको तो सिर्फ एक ये चिल्लर दिखाई दे
शुक्रवार, 25 अप्रैल 2025
जितनी विजय है उतनी ही स्वीकार हार है …
मुख जिसका शिष्टता से ढका इश्तहार है.
किसने किया है साँसों का वितरण बताओ तो,
जीवन मरण का कौन यहाँ सूत्र-धार है.
शालीनता के सूत्र किताबों में छोड़ना,
बदले समय में बस ये सफलता का द्वार है.
अब तक न ओढ़ पाया जो निष्पक्ष आवरण,
कहता है स्वाभिमान से इतिहासकार है.
हर सत्य के निवास पे कालिख पुती हुई,
वातावरण में झूठ का इतना प्रचार है.
अपना तो सब मेरा है मगर, सबका सब मेरा,
इस बात का जो सार है उत्तम विचार है.
कहने को लगती ठीक है पर सच में दिल को क्या,
जितनी विजय है उतनी ही स्वीकार हार है.
रविवार, 6 अप्रैल 2025
शुक्रवार, 28 मार्च 2025
होठों के आस पास ये इक टूटा जाम है …
किसको पता प्रथम है के अंतिम प्रणाम है.
घर था मेरा तो नाम भी उस पर मेरा ही था,
ईंटों की धड़कनों में मगर और नाम है.
कोशिश करोगे तो भी न फिर ढूँढ पाओगे,
अक्सर वहीं मिलूँगा जो मेरा मुक़ाम है.
होता है ज़िन्दगी में कई बार इस क़दर,
दिन उग रहा है पर न पता किसकी शाम है.
घर यूँ जलाया उसने मेरे सामने लगा,
अब हो न हो ये कोई पड़ोसी का काम है.
यादों में क़ैद कर के रखा है तमाम उम्र,
सच-सच कहो ये आपका क्या इंतक़ाम है.
घायल न कर दे मय की तलब इस क़दर मुझे,
होठों के आस-पास ये इक टूटा जाम है.
शुक्रवार, 14 मार्च 2025
होली है …
फागुन का गीत गाइए होली का रोज़ है
पलकें ज़रा उठाइए होली का रोज़ है
ख़ुद में सिमट न जाइए होली का रोज़ है
कीचड़ नहीं ये रंग हैं ताज़ा पलाश के
यूँ तो न मुँह बनाइए होली का रोज़ है
कुछ लोग पीट-पीट के छाती कहेंगे अब
पानी न यूँ बहाइए होली का रोज़ है
बाहर खड़े हैं देर से आ आइये हज़ूर
हमको न यूँ सताइए होली का रोज़ है
भर दूँ ये माँग आपकी उल्फ़त के रंग में
हाँ है तो मुस्कुराइए होली का रोज़ है
कुर्ता सफ़ेद डाल के ये रिस्क ले लिया
बच बच के आप जाइए होली का रोज़ है
वैसे भी मुझपे इश्क़ का रहता है अब नशा
ये भांग मत पिलाइए होली का रोज़ है
बुधवार, 26 फ़रवरी 2025
महा शिवरात्रि …
अभी कुछ दिन पहले बाबा भीमाशंकर के दर्शन का सौभाग्य मिला और बाबा की विशेष कृपा से कुछ लिखने को प्रभु ने प्रेरित किया … आज महा शिवरात्रि पर रचना के कुछ अँश प्रस्तुत कर रहा हूँ, शीघ्र ही पूरी रचना के साथ प्रस्तुत होऊँगा…जय जय भोले नाथ 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
तू उदय न अस्त में शेष है, तू प्रलय विनाश प्रलेश है
तू ही शब्द-अशब्द विशेष है, तू ही ब्रह्म-नाद में लेश है
तू भवेश,अशेष,महेश है, तू ही सर्व-बंध-विमोचनम्
तू ही डम-ड-डम, तू ही बम-ब-बम, तू त्रयम्बकम्, तू शिव:-शिवम्
तू ही संत असंत महंत है, तू क्षितिज है छोर दिगंत है
तू अनादि-आदि न अंत है, तू असीम अपार, अनंत है
तू अघोर घोर जयंत है, तू ही सर्व लोक चरा-चरम्
तू ही डम-ड-डम, तू ही बम-ब-बम, तू त्रयम्बकम्, तू शिव:-शिवम्
तू ही गीत-अगीत प्रगीत में, तू ही छन्द ताल पुनीत में
तू भविष्य में तू अतीत में, तू समय के साथ व्यतीत में
तू ही वाध यंत्र सुगीत में, तू मृदंग नृत्य है तांडवम्
तू ही डम-ड-डम, तू ही बम-ब-बम, तू त्रयम्बकम्, तू शिव:-शिवम्
तू पुराण है तू नवीन है, तू प्रगट भी हो के विलीन है
तू ही चिर-समाधि में लीन है,ये जगत भी तेरे अधीन है
तू ही ज्ञान, ध्यान प्रवीन है, तू ही शंभु-शंभु महेश्वरम्
तू ही डम-ड-डम, तू ही बम-ब-बम, तू त्रयम्बकम्, तू शिव:-शिवम्
#mahashivratri #shivstuti #महाशिवरात्रि
शनिवार, 22 फ़रवरी 2025
सुबूतों से मिटा कर आ गया हूँ नाम सारे ...
सुबूतों से मिटा कर आ गया हूँ नाम सारे.
वो हारेंगे मगर दोहराएंगे यह बात फिर फिर,
चुनावों के अभी आने तो दो परिणाम सारे.
मुझे मेरे ही बच्चों ने मेरा बचपन दिखाया.
गए मेहमान बाहर, चट हुए बादाम सारे.
किसी से कब वफादारी निभाती हैं ये लहरें,
मिटा डालेंगी गीली रेत से पैगाम सारे.
पसीने की महक से दूर तक नाता नहीं है,
मगर हैं चाहते उनको मिलें आराम सारे.
सलाखों की घुटन कुछ पल कभी महसूस करना,
परिंदे छोड़ दोगे पिंजरे से उस शाम सारे.
भटकता है तो मन है खोजता हर दर पे खुशियाँ,
सुकूने दिल है तो घर में सभी हैं धाम सारे.
#स्वप्न_मेरे
सोमवार, 10 फ़रवरी 2025
परिन्दे ले ही जाते हैं उड़ा कर ...
हक़ीकत ले ही आती है उठा कर.
इबादत पर सियासत हो जहाँ पे,
निकल जाओ वहाँ से सर झुका कर. .
उन्हें भी प्यार हमसे हो गया है,
कभी तो बोल दें वो मुस्कुरा कर.
सभी क़ानून इनकी जेब में हैं,
बरी हो जाएँगे सब कुछ चुरा कर.
मिटेंगे दाग़ लेकिन याद रखना,
कमीजें फट भी जाती हैं धुला कर.
न उनको भूल पाए हम कभी भी,
चले आये थे यूँ सब कुछ भुला कर.
शिकारी जाल जितने भी बिछा लें,
परिन्दे ले ही जाते हैं उड़ा कर.
शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2025
लाइफ़ लाइन …
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तू भले ही पार पचास है,मेरी चाय की तू मिठास है
जो बुझी नहीं है अभी तलक, तू वो तिशनगी तो वो प्यास है
तू है मेरे इश्क़ का तर्जुमा, तेरा शुक्रिया तेरा शुक्रिया
मुझे जुगनुओं की तलाश थी, ये चराग़ तूने जला दिया
मेरे साथ साथ रही सदा, मुझे ज़िंदगी से मिला दिया
मेरे हम-सफ़र मेरी हम-नवा, तेरा शुक्रिया तेरा शुक्रिया
ये हसीन पल की जो रात है, तेरे मेरे बीच की बात है
तुझे क्या बताऊँ में दिल-रुबा, यही ज़िंदगी की हयात है
ये सफ़र जो साथ है तय किया,तेरा शुक्रिया तेरा शुक्रिया
शनिवार, 1 फ़रवरी 2025
हमको अपनों ने मिल के लूटा है ...
दिल किसी बात पर तो टूटा है.
मन्नतें हो रहीं है सब पूरी,
कैसे कह दूँ शजर ये झूठा है.
छोड़ आये उसी मोहल्ले को,
जिस जगह वक़्त हमसे छूटा है.
कुछ हकीकत चुभी है पैरों में,
काँच का ख्व़ाब है जो टूटा है.
मैं उधर तुम इधर चली आईं,
चश्म-दीदी गवाह बूटा है.
याद के ढेर हैं जहाँ बिखरे,
वो ठिकाना ही अपना कूचा है.
दुश्मनों का इलाज था लेकिन,
हमको अपनों ने मिल के लूटा है.
#स्वप्न_मेरे
शनिवार, 25 जनवरी 2025
मिलते हैं मेरे जैसे, किरदार कथाओं में ...
देता है कोई छुप कर, तक़रीर सभाओं में.
इक याद भटकती है, इक रूह सिसकती है,
घुँघरू से खनकते हैं ख़ामोश गुफाओं में.
बादल तो नहीं गरजे, बूँदें भी नहीं आईं,
कितना है असर देखो, आशिक की दुआओं में.
चीज़ों से रसोई की, अम्मा जो बनाती थी,
देखा है असर उनका, देखा जो दवाओं में.
हे राम चले आओ, उद्धार करो सब का,
कितनी हैं अहिल्याएं, कल-युग की शिलाओं में.
जीना भी तेरे दम पर, मरना भी तेरी खातिर,
मिलते हैं मेरे जैसे, किरदार कथाओं में.
(तरही ग़ज़ल)
शनिवार, 18 जनवरी 2025
साहिल से कुछ ही दूर जो फिसल गया ...
पैदल तो छाँव-छाँव बस निकल गया.
क़िस्मत वो अपने आप ही बदल गया,
गिरने के बावज़ूद जो संभल गया.
बस उतनी ज़िन्दगी से उम्र कम हुई,
जो वक़्त तू-तड़ाक में निकल गया.
क़ातिल मेरे हिसाब से तो वो भी है,
सपनों को दूसरे के जो कुचल गया.
क्या सामने वो आ सकेगा धूप के,
हलकी सी रोशनी में जो पिघल गया.
कुछ सर ही फूटने को थे उतावले,
पत्थर का क्या क़सूर जो मचल गया.
क्यों हाल उस गरीब का हो पूछते,
साहिल से कुछ ही दूर जो फिसल गया.
रविवार, 12 जनवरी 2025
पार कैसे जाना है, कश्तियाँ समझती हैं ...
कौन है निशाने पर, पुतलियाँ समझती हैं.
पल दो पल कहीं जीवन, मौत का कहीं तांडव,
खेल है ये साँसों का, अर्थियाँ समझती हैं.
काफिला है यादों का, या हवा की सरगोशी,
कौन थपथपाता है, खिड़कियाँ समझती हैं.
चूड़ियों की खन-खन में, पायलों की रुन-झुन में,
कौन दिल की धड़कन में, लड़कियाँ समझती हैं.
नौनिहाल आते हैं, पढ़ के जब मदरसे से,
लफ्ज़ किसने सीखा है, तख्तियाँ समझती हैं.
कुछ सफ़ेद पोशों की, गूँजती हैं तकरीरें,
कितने घर जलेंगे अब, बस्तियाँ समझती हैं.
तुम तो इक मुसाफिर हो, फिक्र हो तुम्हें क्यों फिर,
पार कैसे जाना है, कश्तियाँ समझती हैं.
(तरही ग़ज़ल)
शनिवार, 4 जनवरी 2025
टूटी हो छत जो घर की तो आराम ना चले ...
जब तक ये फैसला हो कोई नाम ना चले.
कोशिश करो के काम में सीधी हों उंगलियाँ,
टेढ़ी करो जरूर जहाँ काम ना चले.
कोई तो देश का भी महकमा हुज़ूर हो,
हो काम सिलसिले से मगर दाम ना चले.
भाषा बदल रही है ये तस्लीम है मगर,
माँ बहन की गाली तो सरे आम ना चले.
तुम शाम के ही वक़्त जो आती हो इसलिए,
आए कभी न रात तो ये शाम ना चले.
बारिश के मौसमों से कभी खेलते नहीं,
टूटी हो छत जो घर की तो आराम ना चले.