स्वप्न मेरे: तितली
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शनिवार, 26 जुलाई 2025

लोगों के बीच बात ये नज़र-नज़र गई ...

उनके भी तेरे मेरे और सबके घर गई.
उनकी तलाश में नज़र किधर-किधर गई.

चश्मा लगा के लोग काम पर चले गए,
सुस्ती को फिर जगह मिली जिधर-पसर गई.

घर लौटने की आस में कुछ लोग खप गए,
इक भीड़ गाँव-गाँव से शहर-शहर गई.

ख़ामोश तीरगी का शोर गूँजता रहा,
फिर ख़्वाब-ख़्वाब रात ये पहर-पहर गई.

जागा जो इश्क़, आरज़ू के पंख लग गए,
तितली बुझाने प्यास फिर शजर-शजर गई.

बादल के साथ-साथ रुख़ हवा का देख कर,
उम्मीद भी किसान की इधर-उधर गई.

लब सिल दिए सभी के पर सभी को थी ख़बर,
लोगों के बीच बात ये नज़र-नज़र गई.

शनिवार, 21 जून 2025

किरन जब खिलखिलाती है तेरी तब याद आती है …

ये सिगरेट-चाय-तितली-गुफ्तगू सब याद आती है.
तेरी आग़ोश में गुज़री हुई शब याद आती है.

इसी ख़ातिर नहीं के तू ही मालिक है जगत भर का,
मुझे हर वक़्त वैसे भी तेरी रब याद आती है.

मेरे चेहरे पे गहरी चोट का इक दाग है ऐसा,
ये दर्पण देख लेता हूँ तेरी जब याद आती है.

न थी उम्मीद कोई ज़िन्दगी से पर ये सोचा था,
न आएगी कभी भी याद पर अब याद आती है.

सफ़र आसान यूँ होता नहीं है ज़िंदगी भर का,
मुहब्बत में रहो तो दर्द की कब याद आती है.

किसी का अक्स जो तुम ढूँढती रहती हो बादल में,
कहूँ शब्दों में सीधे से तो मतलब याद आती है.

धरा पर धूप उतर आती है ले के रूप की आभा,
किरन जब खिल-खिलाती है तेरी तब याद आती है.

शनिवार, 30 सितंबर 2023

उत्तर है इसके हल में ...

क्यों अटके बीते पल में.
जब सब आज है या कल में.

रब, रिश्ते, मय, इश्क़, नज़र,
फँस जाओगे दलदल में.

ठुठ्ररी ठुठ्ररी बैठी है,
रात सिकुड़ कर कम्बल में.

किसने कैसे बूँद रखी,
नील गगन के बादल में.

फूट रही थी गुमसुम सी,
एक जवानी पिंपल में.

जुगनू बन कर धूप छुपी,
काली रात के आँचल में.

खामोशी ख़ामोश रही,
सन्नाटों की हलचल में.

धूल सी यादें चिपकी हैं,
घर की हर इक चप्पल में.

मैल उतारी यूँ ग़म की,
मल मल कर शावर जल में.

जीवन सपने हाँ इक तितली,
उत्तर है इसके हल में.

मंगलवार, 12 सितंबर 2023

छाती पे उनकी मूंग भी दलने तो दे मुझे ...

सागर बुला रहा है निकलने तो दे मुझे.
तू बर्फ से पानी में बदलने तो दे मुझे.

चुपके से आफताब ने बादल से यूँ कहा,
बिखरूंगा इन फ़िज़ाओं में ढलने तो दे मुझे.

देखोगे असमान में चमकूंगा एक दिन,
छोटा सा एक ख्वाब हूँ पलने तो दे मुझे.

बच्चे जो आए सामने मैं बाप हो गया,
पापा जो सामने हैं मचलने तो दे मुझे.

तितली सी इर्द-गिर्द महकती मिलेगी तू,
इस प्रेम के गुलाल को मलने तो दे मुझे.

तारे भी तोड़ लाऊंगा अमरुद चीज क्या,
अब नाम लेके तेरा उछलने तो दे मुझे.

उनको गुनाह की तो सजा मिल ही जायगी,
छाती पे उनकी मूंग भी दलने तो दे मुझे.

सोमवार, 24 जुलाई 2023

इश्क़ में रोज़ वजूहात बदल जाते हैं ...

बहते अश्कों की जो बरसात बदल जाते हैं.
दर्द में डूबी हुई रात बदल जाते हैं.

ग़र तरक़्क़ी के शजर उग सके पगडण्डी पर,
शह्र के साथ ये देहात बदल जाते हैं.

चाय उँगली से हिलाने का असर मत पूछो,
मीठी चीनी के भी अनुपात बदल जाते हैं.

साथ आ जाएँ तो क्या कुछ न बदल जाएगा,
जिनकी आमद से ये लम्हात बदल जाते हैं.

तितलियाँ रंग-बिरंगी हैं यहाँ मत भेजो,
बातों-बातों में ख़यालात बदल जाते हैं.

आपका घूरना, फिर देखना, फिर शरमाना,
देखते देखते ख़तरात बदल जाते हैं.

इश्क़ तसलीम तो कर लेंगे नज़र से पर फिर,
होंठ से कहते हुए बात बदल जाते हैं.

आज इस बात पे, कल और किसी किस्से पर,
इश्क़ में रोज़ वजूहात बदल जाते हैं.
(तरही ग़ज़ल)

गुरुवार, 13 जुलाई 2023

ये काली लट तेरी उलझा रही है ...

हवा कुछ गीत ऐसे गा रही है.
किसी की याद संग-संग आ रही है.

अभी छेड़ो न तितली को, सुनो जी,
पहाड़ा इश्क़ का समझा रही है.

पहनती है नहीं, ये तो बता दे,
अंगूठी कब मेरी लौटा रही है.

लचकती सी जो गुज़री है यहाँ से,
लड़ी कचनार की बल खा रही है.

नहीं है इश्क़ तो क्यों लाल झुमका,
मेरे स्वेटर में यूँ उलझा रही है.

तेरी ये गंध जैसे इत्र बन कर,
सुलगते कश में उतरी जा रही है.

ग़ज़ल पूरी मैं कब की कर भी लेता,
ये काली लट तेरी उलझा रही है.

सोमवार, 27 जुलाई 2020

वक़्त की साँकल में अटका इक दुपट्टा रह गया


आँसुओं से तर-ब-तर मासूम कन्धा रह गया
वक़्त की साँकल में अटका इक दुपट्टा रह गया

मिल गया जो उसकी माया, जो हुआ उसका करम
पा लिया तुझको तो सब अपना पराया रह गया

आदतन बोला नहीं मैं, रह गईं खामोश तुम 
झूठ सच के बीच उलझा एक लम्हा रह गया

छू के तुझको कुछ कहा तितली ने जिसके कान में 
इश्क़ में डूबा हुआ वाहिद वो पत्ता रह गया

आपको देखा अचानक बज उठी सीटी मेरी
उम्र तो बढ़ती रही पर दिल में बच्चा रह गया

कर भी देता मैं मुकम्मल शेर तेरे हुस्न पर
क्या कहूँ लट से उलझ कर एक मिसरा रह गया

मैं भी कुछ जल्दी में था, रुकने को तुम राज़ी न थीं
शाम का नीला समुन्दर यूँ ही तन्हा रह गया

बोलना, बातें, बहस, तकरार, झगड़ा, गुफ्तगू  
इश्क़ की इस दिल्लगी में अस्ल मुद्दा रह गया

कुछ कहा नज़रों ने, कुछ होठों ने, सच किसको कहूँ 
यूँ शराफत सादगी में पिस के बंदा रह गया

रविवार, 20 जुलाई 2014

हवा के हाथ से बदली गिरी है ...

लचकती डाल से इमली गिरी है
कहीं पे आज फिर बिजली गिरी है

वहाँ भवरों की हलचल है अभी तक
जहाँ कच्ची कली जंगली गिरी है

सितारों में तुम्हारा अक्स होगा
खनकती सी हंसी उजली गिरी है

उसे थामा हुआ था इश्क ने ही
किताबों से जो इक तितली गिरी है

शजर उगता वहीं है प्रेम का फिर
जहाँ पे इश्क की गुठली गिरी है

सियासत दान कब गिरते हैं देखो
गिरी है बस तो इक दिल्ली गिरी है

जो राधा हो गया वो जान पाया
कहाँ पे कृष्ण की मुरली गिरी है

लो दस्तक आ गई सावन की फिर से
हवा के हाथ से बदली गिरी है