भूल जाओ इसे रख के पाताल में.
ग़म न बाँटों किसी से किसी हाल में.
जीत ख़रगोश की हो या कछुए की हो,
फ़र्क़ होता है दोनों की पर चाल में.
धर्म, दौलत, नियंत्रण, ये सत्ता, नशा,
सब फ़रेबी हैं आना न तुम चाल में.
रिश्ते-नाते, मुहब्बत, ये बन्धन, वचन,
मौज लोगे न आओगे गर जाल में.
आप चाहें न चाहें ये बस में नहीं,
मिल ही जाएँगे कंकड़ हर इक दाल में.
अल-सुबह उठ के गुलशन में आए हो क्यूँ,
फूल खिलने लगे हैं हर इक डाल में.
तैरना-डूबना तो है सब को यहाँ,
जब उतरना हैं जीवन के इस ताल में.
साल-दर-साल आता है मुड़-मुड़ के कुछ,
उम्र मुड़ के न आएगी पर साल में.
शनिवार, 11 जुलाई 2026
रविवार, 5 जुलाई 2026
हुवे स्वाद फ़ीके मेरी चासनी के ...
बदी, बंदगी, ग़म, हँसी, दिल्लगी के.
नहीं छोड़ता हूँ में मौक़े ख़ुशी के.
तुम अपना-पराया, मिटा कर तो देखो,
सफ़र कितने आसान हैं ज़िन्दगी के.
लहू हमने देखा है ताज़ा टपकता,
खतावार लम्हों से अब-तक सदी के.
वफ़ा, कहकहे, जाम, रिश्तों में लज्ज़त,
मिले ग़र ये बूटे खिलें दोस्ती के.
तुम्हें लफ़्ज़-दर-लफ़्ज़, रेशा-ब-रेशा,
पढ़ूँगा हुनर देखना शायरी के.
ये झिड़की थी, फिरकी थी, धमकी थी क्या था,
संदेशे नहीं ग़र जो नाराज़गी के.
सुलगता सा सूरज, सितारे, ये आतिश,
ये जुगनू मिले दौड़ में रौशनी के.
वे हैं देश-द्रोही के हैं राज-द्रोही,
गले में हैं फन्दे किसी अजनबी के.
जुदा रंगो-बू, ताज़गी, ढंग, सीरत,
मगर ग़म हैं यकसाँ गुलों में लड़ी के.
न खिड़की खुली ओर न छत झिलमिलाई,
हुवे स्वाद फ़ीके मेरी चासनी के.
नहीं छोड़ता हूँ में मौक़े ख़ुशी के.
तुम अपना-पराया, मिटा कर तो देखो,
सफ़र कितने आसान हैं ज़िन्दगी के.
लहू हमने देखा है ताज़ा टपकता,
खतावार लम्हों से अब-तक सदी के.
वफ़ा, कहकहे, जाम, रिश्तों में लज्ज़त,
मिले ग़र ये बूटे खिलें दोस्ती के.
तुम्हें लफ़्ज़-दर-लफ़्ज़, रेशा-ब-रेशा,
पढ़ूँगा हुनर देखना शायरी के.
ये झिड़की थी, फिरकी थी, धमकी थी क्या था,
संदेशे नहीं ग़र जो नाराज़गी के.
सुलगता सा सूरज, सितारे, ये आतिश,
ये जुगनू मिले दौड़ में रौशनी के.
वे हैं देश-द्रोही के हैं राज-द्रोही,
गले में हैं फन्दे किसी अजनबी के.
जुदा रंगो-बू, ताज़गी, ढंग, सीरत,
मगर ग़म हैं यकसाँ गुलों में लड़ी के.
न खिड़की खुली ओर न छत झिलमिलाई,
हुवे स्वाद फ़ीके मेरी चासनी के.
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