स्वप्न मेरे: जुलाई 2026

रविवार, 5 जुलाई 2026

हुवे स्वाद फ़ीके मेरी चासनी के ...

बदी, बंदगी, ग़म, हँसी, दिल्लगी के.
नहीं छोड़ता हूँ में मौक़े ख़ुशी के.

तुम अपना-पराया, मिटा कर तो देखो,
सफ़र कितने आसान हैं ज़िन्दगी के.

लहू हमने देखा है ताज़ा टपकता,
खतावार लम्हों से अब-तक सदी के.

वफ़ा, कहकहे, जाम, रिश्तों में लज्ज़त,
मिले ग़र ये बूटे खिलें दोस्ती के.

तुम्हें लफ़्ज़-दर-लफ़्ज़, रेशा-ब-रेशा,
पढ़ूँगा हुनर देखना शायरी के.

ये झिड़की थी, फिरकी थी, धमकी थी क्या था,
संदेशे नहीं ग़र जो नाराज़गी के.

सुलगता सा सूरज, सितारे, ये आतिश,
ये जुगनू मिले दौड़ में रौशनी के.

वे हैं देश-द्रोही के हैं राज-द्रोही,
गले में हैं फन्दे किसी अजनबी के.

जुदा रंगो-बू, ताज़गी, ढंग, सीरत,
मगर ग़म हैं यकसाँ गुलों में लड़ी के.

न खिड़की खुली ओर न छत झिलमिलाई,
हुवे स्वाद फ़ीके मेरी चासनी के.