स्वप्न मेरे: मई 2026

शनिवार, 16 मई 2026

के हम अब पराई कलम हो रहे हैं ...

नफ़ा करते-करते भी कम हो रहे हैं.
बुढ़ापे में तेवर नरम हो रहे हैं.

ये दौलत की तितली पकड़ते-पकड़ते,
बहुत दूर अपनों से हम हो रहे हैं.

जमा खर्च करते हुए हमने जाना,
उधारी में डूबी रकम हो रहे हैं.

झगड़ते-लिपटते ख़रामा-ख़रामा,
शरीके-कदम हम-कदम हो रहे हैं.

किसानों के कानों में बरखा के मोती,
कहरवा की मीठी रिदम हो रहे हैं.

दुःख आए तो अपनों की यादें भी आईं,
सुख आए तो हम बे-शरम हो रहे हैं.

ख़ुदा की नहीं खा रहे हैं हमारी,
क़सम से हम उनकी क़सम हो रहे हैं.

ख़बर की लिखावट का तड़का है कहता,
के हम अब पराई कलम हो रहे हैं.

बुधवार, 6 मई 2026

पर कर के वही काम दुबारा न करो तुम …

बाज़ी ये कभी जीत के हारा न करो तुम.
शतरंज में प्यादों को उतारा न करो तुम.

है भूल अगर इश्क़ जो हम से, तो सितमगर,
भूले से भी ये भूल सुधारा न करो तुम.

सरगोशियाँ बस्ती की ये बदनाम करेंगी,
आवाज़ दे के हम को पुकारा न करो तुम.

जीवन के ये जो खेल हैं उत्सव से नहीं कम,
जीतो न अगर शर्त तो हारा न करो तुम.

जीने की जो आदत है जियो वक़्त को हर पल,
बेकार कभी वक़्त गुज़ारा न करो तुम.

ख़ुद ढूँढ के पीना जो समुंदर की तलब है,
नदिया को नमक डाल के खारा न करो तुम.

अब हो जो गया इश्क़ तो फिर क्या ही करोगे,
पर कर के वही काम दुबारा न करो तुम.