स्वप्न मेरे: 2026

शनिवार, 8 अगस्त 2026

मगर मुश्किल है राँझे-हीर का किरदार हो जाना ...

मुझे अच्छा लगेगा आपका सरकार हो जाना,
ये गलती है, तो इस गलती, का सौ-सौ बार हो जाना.

छपक छप-छप लहर के साथ सागर पार हो जाना,
इसे कहते हैं उनसे प्यार का इज़हार हो जाना.

न पूछो दिल पे कब क्या क्या शरीफ़ों के गुज़रती है,
दबे से राज़ का यूँ एक दिन अख़बार हो जाना.

हसीनों की अदा में ख़ासियत ये आम होती है,
लगे दिल झूमने तो यक-ब-यक इनकार हो जाना.

चहक उठता था हर बचपन, महक उठता था हर यौवन,
खटकता है बुजुर्गों का वहाँ दीवार हो जाना.

खिलें गुल, चूम ले तितली, गुज़र जाएँ वो इठला कर,
यही है हाँ, यही है हाँ, किसी से प्यार हो जाना.

सज़ा इस ज़िन्दगी में क्या कोई इस से बड़ी होगी,
जिसे हो भूलना उस बेवफ़ा से प्यार हो जाना.

में अपनों से तुम अपनों से लड़ो मिलना है तब मुमकिन,
मगर मुश्किल है राँझे-हीर का किरदार हो जाना.

शनिवार, 1 अगस्त 2026

रहना नहीं इधर न रहो पर उधर नहीं ...

उड़ लेंगे आसमान में इसकी फ़िकर नहीं,
तकलीफ़ है हमें के परिंदों के पर नहीं,

तुम हो मेरे क़रीब ज़माने का डर नही,
दुख, दर्द, धूप, छाँव का हम पर असर नहीं,

आँखों में आंसुओं का जो सैलाब है जमा,
लोगों पे आज़माना इन्हें मेरे पर नहीं,

महसूस कर सकोगे जो बैठोगे आस-पास,
शबनम की बूँद हूँ मैं दहकता शरर नहीं,

है राह शबनमी तो मैं रिश्ते भी तोड़ दूँ,
माना के हमको इश्क़ है पर इस क़दर नहीं,

इस रास्ते से हो के गुज़रते भी किस तरह,
इस रास्ते में छाँव का कोई शजर नहीं,

ये राह इसलिए भी महकती है अब तलक,
तितली परिंदे ढेर हैं लेकिन बशर नहीं,

माना वे तेरे ख़ास हैं, पर हम भी कुछ तो हैं,
रहना नहीं इधर न रहो पर उधर नहीं,

शनिवार, 25 जुलाई 2026

झूठ लाए हैं सच छुपाने को ...

हो के ख़ुशबू सा फैल जाने को,
एक मुद्दत लगी फ़साने को.

वक़्त लगता है फिर बनाने को,
एक टूटे से आशियाने को.

मसअले तो सुलझ भी जाते हैं,
कौन तैयार है भुलाने को.

तीरग़ी देख हमको है काफ़ी,
एक जुगनू तुझे मिटाने को,

उनकी यादों की आँच काफी है,
एक सिगरेट नई जलाने को.

दर्द ग़र दिल में हो तो अक्सर ही,
ज़ोर लगता है मुस्कुराने को,

चलते-चलते चलेगा सच बन कर,
झूठ लाए हैं सच छुपाने को.

शनिवार, 18 जुलाई 2026

है आज धार कुंद तो खंज़र उदास है ...

माँ बाप की तो खैर, कबूरत उदास है,
परदेस घर के बच्चे चले घर उदास हैI

तितली परिंदे, मेघ, हवा, फूल सब खफ़ा,
तुम क्या गए के सुरमई मंज़र उदास हैI

बरसेगा छत पे कान में बादल के बोल दो,
डूबा हुआ हूँ इश्क़ में छप्पर उदास हैI

काँटा उसे भी इश्क़ में शायद चुभा न हो,
जिस बात पे वो खुश था उसी पर उदास हैI

सर दूसरे का फोड़ के एहसास ही नहीं,
ठोकर लगी तो आज ये पत्थर उदास हैI

कागज़ की नाव कैसे मुझे पार कर गई,
यह बात सोच कर ये समुन्दर उदास हैI

गर्दन पे जब चला है तो बे-खौफ चल गया,
है आज धार कुंद तो खंज़र उदास हैI

शनिवार, 11 जुलाई 2026

उम्र मुड़ के न आएगी पर साल में ...

भूल जाओ इसे रख के पाताल में.
ग़म न बाँटों किसी से किसी हाल में.

जीत ख़रगोश की हो या कछुए की हो,
फ़र्क़ होता है दोनों की पर चाल में.

धर्म, दौलत, नियंत्रण, ये सत्ता, नशा,
सब फ़रेबी हैं आना न तुम चाल में.

रिश्ते-नाते, मुहब्बत, ये बन्धन, वचन,
मौज लोगे न आओगे गर जाल में.

आप चाहें न चाहें ये बस में नहीं,
मिल ही जाएँगे कंकड़ हर इक दाल में.

अल-सुबह उठ के गुलशन में आए हो क्यूँ,
फूल खिलने लगे हैं हर इक डाल में.

तैरना-डूबना तो है सब को यहाँ,
जब उतरना हैं जीवन के इस ताल में.

साल-दर-साल आता है मुड़-मुड़ के कुछ,
उम्र मुड़ के न आएगी पर साल में.

रविवार, 5 जुलाई 2026

हुवे स्वाद फ़ीके मेरी चासनी के ...

बदी, बंदगी, ग़म, हँसी, दिल्लगी के.
नहीं छोड़ता हूँ में मौक़े ख़ुशी के.

तुम अपना-पराया, मिटा कर तो देखो,
सफ़र कितने आसान हैं ज़िन्दगी के.

लहू हमने देखा है ताज़ा टपकता,
खतावार लम्हों से अब-तक सदी के.

वफ़ा, कहकहे, जाम, रिश्तों में लज्ज़त,
मिले ग़र ये बूटे खिलें दोस्ती के.

तुम्हें लफ़्ज़-दर-लफ़्ज़, रेशा-ब-रेशा,
पढ़ूँगा हुनर देखना शायरी के.

ये झिड़की थी, फिरकी थी, धमकी थी क्या था,
संदेशे नहीं ग़र जो नाराज़गी के.

सुलगता सा सूरज, सितारे, ये आतिश,
ये जुगनू मिले दौड़ में रौशनी के.

वे हैं देश-द्रोही के हैं राज-द्रोही,
गले में हैं फन्दे किसी अजनबी के.

जुदा रंगो-बू, ताज़गी, ढंग, सीरत,
मगर ग़म हैं यकसाँ गुलों में लड़ी के.

न खिड़की खुली ओर न छत झिलमिलाई,
हुवे स्वाद फ़ीके मेरी चासनी के.

सोमवार, 29 जून 2026

दिल में छुपा है इश्क़ जो कैसे बताओगे ...

तुम धूप का लिबास पहन कर जो आओगे.
मुमकिन है तीरग़ी से कभी मिल न पाओगे.

कश-कश के साथ तुमको भी पी लूँगा सोच लो,
हमको जो एक बार भी सिगरेट पिलाओगे.

आसान आसमान पे उनको है टाँकना,
पर ये बताओ चाँद को कब तक हटाओगे.

पूरा करो के तोड़ दो कोशिश तो पर करो,
वादा किया है खुद से तो कब तक निभाओगे.

उतरो के दो-दो हाथ समुंदर से भी करो,
चप्पू बताओ रेत में कब तक चलाओगे.

इज़हार अपना इश्क़ न करने में देर हो,
दिन-रात उनकी याद में वरना बिताओगे.

पहचानी रह-गुजर पे भी मंज़िल का है पता,
सम्मान होगा राह जो अपनी बनाओगे.

नाक़ामियों से उलझे रहोगे जो देर तक,
तुम क़द को कैसे अपने शिखर तक उठाओगे.

खुल कर तो बात बोलना अब तक न आ सका,
दिल में छुपा है इश्क़ जो कैसे बताओगे.

बुधवार, 24 जून 2026

कैसे कहेंगे उसको वो बे-रोज़गार है …

दीवार है जो बीच की उसमें दरार है.
कंधों पे अब इस छत का भी दारोमदार है.

किस बात का बताओ तुम्हें इंतज़ार है.
अब हो गया तो बोल भी दो हमसे प्यार है.

जिसकी नहीं कलम से कभी दोस्ती हुई,
कहते हैं वो भी एक उपन्यासकार है.

क़ानून सिर्फ़ एक है क़ानून कुछ नहीं,
जंगल का फिर भी हाल मगर शानदार है.

पैसा अगर हो पास तो जितनी बुराई हो,
बच्चा रईस बाप का भी होनहार है.

सच है के उसके दिल को नहीं जान पाएगा,
माना तमाम ग्रंथों का वो जानकार है.

मोहलत मिली न इश्क़ से आठों पहर जिसे,
कैसे कहेंगे उसको वो बे-रोज़गार है.

गुरुवार, 18 जून 2026

कह-कहे फ़्री में तोल देता है …

पोल ऐसे ही खोल देता है.
वो कहीं कुछ भी बोल देता है.

सोच लो कम-से-कम है क्या क़ीमत,
वो तो कोड़ी का मोल देता है.

टू-द-पॉइंट जवाब दूँ कैसे,
प्रश्न जब गोल-गोल देता है.

कौन सी चैट है ख़ुदा जाने,
लोल के बदले लोल देता है.

वो मदारी है विष फ़िज़ाओं में,
लफ़्ज़-दर-लफ़्ज़ घोल देता है.

वो प्रजातंत्र का है निर्देशक,
चुप ही रहने का रोल देता है.

है तो मुश्किल मगर वो दुख ले कर,
कह-कहे फ्री में तोल देता है.

शनिवार, 6 जून 2026

छज्जे में फिर मिले हैं कबूतर लहुलुहान ...

हम क्यों हुए हैं इश्क़ में गिर कर लहुलुहान.
अब तक हुवे नहीं जो सितमगर लहुलुहान.

कुछ प्रश्न, प्रश्न तक ही रहे तब ही ठीक है,
कर देंगें वर्ना उनके ये उत्तर लहुलुहान.

यादों के तिनके पैर में कुछ इस क़दर गढ़े,
जूतों के बीच पाँव हैं दिन भर लहुलुहान.

एहसास दो-पहर का है सुबहा के नो बजे,
गर्मी में आफ़ताब है अक्सर लहुलुहान.

कुछ यूँ शबे फिराक़ में आहें दहक उठीं,
तकिया, रज़ाई, सिलवटें, बिस्तर, लहुलुहान.

रुखसत हो आफ़ताब, के आमद हो चाँद की,
हर शाम ही हुआ है समुन्दर लहुलुहान.

ज़ुल्मों सितम की हद को न पूछो तो ठीक है,
छज्जे में फिर मिले हैं कबूतर लहुलुहान.

शनिवार, 30 मई 2026

इंसानों में इंसान तो पाया नहीं जाता ...

पल पहली मुहब्बत का भुलाया नहीं जाता.
ख़त यूँ ही दराज़ों में छुपाया नहीं जाता.

जंगल में कई मेमने यह पूछ रहे हैं,
क्यों घास कभी शेर से खाया नहीं जाता.

मुमकिन है मुझे भेजा हो पैग़ाम किसी न,
बे-बात कबूतर यूँ उड़ाया नहीं जाता.

पाना है जो छुटकारा ज़रूरी हैं अंधेरे,
इस धूप में तो जिस्म से साया नहीं जाता.

उगते हैं जो गमलों में सभी पूछ रहे हैं,
क्यों गमले में जामुन को लगाया नहीं जाता.

माना के डिनर बुक है मगर छोड़ के उनको,
यूँ चाँद की टैरस पे तो जाया नहीं जाता.

आ चल के कहीं ढूँढ लें पशुओं में मिले तो,
इंसानों में इंसान तो पाया नहीं जाता.

शनिवार, 16 मई 2026

के हम अब पराई कलम हो रहे हैं ...

नफ़ा करते-करते भी कम हो रहे हैं.
बुढ़ापे में तेवर नरम हो रहे हैं.

ये दौलत की तितली पकड़ते-पकड़ते,
बहुत दूर अपनों से हम हो रहे हैं.

जमा खर्च करते हुए हमने जाना,
उधारी में डूबी रकम हो रहे हैं.

झगड़ते-लिपटते ख़रामा-ख़रामा,
शरीके-कदम हम-कदम हो रहे हैं.

किसानों के कानों में बरखा के मोती,
कहरवा की मीठी रिदम हो रहे हैं.

दुःख आए तो अपनों की यादें भी आईं,
सुख आए तो हम बे-शरम हो रहे हैं.

ख़ुदा की नहीं खा रहे हैं हमारी,
क़सम से हम उनकी क़सम हो रहे हैं.

ख़बर की लिखावट का तड़का है कहता,
के हम अब पराई कलम हो रहे हैं.

बुधवार, 6 मई 2026

पर कर के वही काम दुबारा न करो तुम …

बाज़ी ये कभी जीत के हारा न करो तुम.
शतरंज में प्यादों को उतारा न करो तुम.

है भूल अगर इश्क़ जो हम से, तो सितमगर,
भूले से भी ये भूल सुधारा न करो तुम.

सरगोशियाँ बस्ती की ये बदनाम करेंगी,
आवाज़ दे के हम को पुकारा न करो तुम.

जीवन के ये जो खेल हैं उत्सव से नहीं कम,
जीतो न अगर शर्त तो हारा न करो तुम.

जीने की जो आदत है जियो वक़्त को हर पल,
बेकार कभी वक़्त गुज़ारा न करो तुम.

ख़ुद ढूँढ के पीना जो समुंदर की तलब है,
नदिया को नमक डाल के खारा न करो तुम.

अब हो जो गया इश्क़ तो फिर क्या ही करोगे,
पर कर के वही काम दुबारा न करो तुम.

शनिवार, 28 मार्च 2026

काँटों की हिफ़ाज़त में, ग़र गुल न उगा होता ...

जीवन का सफ़र हमने, तन्हा न चुना होता.
कुछ उनकी सुनी होती, कुछ अपना कहा होता.

इक बार सनम लब से डाली को छुआ होता.
मुमकिन है के पतझड़ में, पत्ता न जुदा होता.

यह बात हवाई है, यह सोच ख़याली है,
जब ऐसे किया होता, तब ऐसा हुआ होता.

आकाश के सब तारे घर भर में सजा देते,
कुछ रोज़ मेरे घर भी चंदा जो रुका होता.

कुछ साथ गुज़र जाते, कुछ याद में कट जाते,
चुप रह के तेरी बातों को हमने सुना होता.

हम तो न सही लेकिन, दो चार अटक जाते,
उल्फ़त का जो फिर तुमने, इक जाल बुना होता.

इनको तो ये तितली ही, चुन-चुन के मसल देती,
काँटों की हिफ़ाज़त में, ग़र गुल न उगा होता.

शनिवार, 7 मार्च 2026

कदमों को सफलता न मिले, सर न झुकाना ...

मिटने की तमन्ना है तो कदमों को उठाना.
इतिहास में पन्नों पे न ढूँढेगा ज़माना.

अपनों की सदा रोक न लें आपकी राहें,
इस कर्म के पथ पर जो चलो मुड़ के न आना.

बादल भी निराशा के सताते हैं सफ़र में,
उम्मीद के लम्हों से नई राह बनाना.

इस और से उस और से पहुँचोगे वहीं पर,
चलने के इरादे पे न तुम ऊँगली उठाना.

माना के हमें भूलना मुमकिन तो नहीं है,
इस मील के पत्थर को मगर भूल ही जाना.

मज़बूत इरादों पे वो ऊँगली न उठा दें,
दुनिया को कभी कदमों के छाले न दिखाना.

ग़र मिल न सकी आज तो कल परसों मिलेगी,
कदमों को सफलता न मिले, सर न झुकाना.

शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

आदाब उस ख़ुदा का आपसे मिला दिया ...

आदाब उस ख़ुदा का आपसे मिला दिया.
सहरा की रेत पर हसीन गुल खिला दिया.

पत्थर गिरा के चाँद आसमान तोड़ के,
बरसों से सो रही थी झील फिर हिला दिया.

अपनी फटी सी शेरवानी कर के फिर रफू,
बेटे को ईद में नया कुर्ता सिला दिया. .

वो मय थी या के जाम इश्क के भरे हुए,
महफ़िल में आपने हुजूर क्या पिला दिया

बाजू में बैठना नहीं कुबूल आपको,
हम उठ गए तो क्यों उठे है ये गिला दिया.

खुद जिंदगी की ऐश की हर शै खरीद ली,
हम भी थे साथ हमको झुनझुना दिला दिया.

दामन छुड़ा लिया हमारा हाथ काट के,
हमको वफ़ा निभाने का ये सिलसिला दिया.

शनिवार, 21 फ़रवरी 2026

आग़ाज़ है समर का तो अंजाम आएगा ...

पहले तो गुफ़्तगू में मेरा नाम आएगा.
फिर इसके बाद देखना इल्ज़ाम आएगा.

होगा मेरे ही नाम जो बे-नाम आएगा.
ख़ुशबू के साथ उड़ के जो पैग़ाम आएगा.

यादों का सिलसिला तो नहीं आता पूछ कर,
ऐसे ही दिल में तू कभी गुमनाम आएगा.

बीमार हैं जो इश्क़ में घबराइए नहीं,
बीमार हो के आपको आराम आएगा.

दिल से कभी ये बात मेरी आज़माइए,
राधा का नाम लीजिए घनश्याम आएगा.

मौसम बदल गया है फ़िज़ाओं का यक-ब-यक,
बादल के साथ फिर से मेरा नाम आएगा.

कुछ लम्हे तीरगी के है हिम्मत न हारिए,
लौटा नहीं जो घर पे सुबह, शाम आएगा.

देखा नहीं है हमने तो ऐसा कभी कहीं,
प्याला ज़हर का भेजिए तो जाम आएगा.

आती है रात, दिन भी निकलता है उसके बाद,
आग़ाज़ है समर का तो अंजाम आएगा.

शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

प्रेम के नाम …

मेरे तमाम जानने वालों के ख्यालों में पली
गुज़रे हुवे अनगिनत सालों की अंजान वैलेंटाइंन
हसीन यादों के कोहरे में छुपी अजनबी हसीना
समर्पित है गुलाब का वो सूखा फूल
जो बरसों क़ैद रहा डायरी के बंद पन्नों में

न तुझसे मिला, न देखा
तू कायनात में उसी दिन आई
जब एक सूखा जंगली गुलाब डायरी में मिला

मेरी तन्हाई की हमसफ़र
अनगिनत क़िस्सों की अंजान महबूबा
ख्यालों की आड़ी तिरछी रेखाओं में जब कभी
तेरा अक्स उकेरने की कोशिश करता हूँ
अनायास तेरे माथे पे बिन्दी सज़ा देता हूँ
जाने अनजाने थमा देता हूँ तेरे हाथों पूजा का थाल
फिर पलकें झुकाए सादगी भरे रूप को निहारता हूँ
मेरा जंगली गुलाब,
मेरी जानी सी अंजान प्रेमिका
तु बरसों पहले क्यों नही मिली …

शनिवार, 31 जनवरी 2026

घर जिनके माहताब ने झट से जला दिए ...

गम बारिशों के साथ यूँ मिल कर बहा दिए.
हमने तुम्हारी याद के पन्ने हटा दिए.

तकिये को नींद आई न चादर हिली-डुली,
बिस्तर की सलवटों ने फ़साने बना दिए.

शिकवे, गिले, शिकायतें पल भर में मिट गईं,
आँखों में आँखें डाल के वो मुस्कुरा दिए.

पहले इलाज आँख का करते मेरे हजूर,
होठों पे बे-फ़िज़ूल ही ताले लगा दिए.

खिड़की की झिर्रियों से शफ़क झाँकने लगी,
पलकों ने खुद-ब-खुद ये शटर फिर उठा दिए.

दुश्मन के तीर पर ही ये इलज़ाम रख दिया,
किस-किस को कहते यार ने खंज़र चुभा दिए.

रखते थे आफताब की किरणों को बाँध कर,
घर जिनके माहताब ने झट से जला दिए.

शनिवार, 24 जनवरी 2026

शिव स्तुति - 4

तेरे तन पे भस्म का आवरण, सभी भूत-अभूत रहें शरण
तू ही श्रृष्टिबीज का अँकुरण, तूशरीरमृत्यु का व्याकरण,
न तेरा रिसाव तेरा क्षरण, तू समाधि-वेध-सुरेशनम्,
तू ही डम-ड-डम, तू ही बम-ब-बम, तू त्रयम्बकम्, तू शिव:-शिवम्.


तेरा ज्ञान-चक्षु है भाल पर, ये मयंक-अर्ध कपाल पर,
रहें हस्ती-चर्म को डाल कर, ये बिराजें केहरी छाल पर,
जहाँ काल द्वार का पाल है, तू ही सर्व शक्तिनगेश्वरम्,
तू ही डम-ड-डम, तू ही बम-ब-बम, तू त्रयम्बकम्, तू शिव:-शिवम्.


ये सकल धरा के प्रयाण का, जो ये वीतराग प्रयत्न है,
ये जो कालकूट है कंठ में, यही क्षीर-सिंधु का रत्न है,
तू ही त्राण है तू ही यत्न है तू ही चंद्रमौलि-फणीश्वरम्,
तू ही डम-ड-डम, तू ही बम-ब-बम, तू त्रयम्बकम्, तू शिव:-शिवम्.

शनिवार, 17 जनवरी 2026

शिव स्तुति - 3

तू समाधि रूप में शंकरम् तू जगत स्वरूप शिवम् शिवम्तू .
ही डम-ड-डम, तू ही बम-ब-बम, तू त्रयम्बकम्, तू शिव:-शिवम्.


तू ही रूप अरूप सरूप है, तेरी कल्पना ही अनूप है,
तू ही अंधकार में धूप है, तू ही सृष्टि प्राण स्वरूप है,
तू ही कामरूप कुरूप है,तू ही कान्तकम तू ही सुंदरम्,
तू ही डम-ड-डम, तू ही बम-ब-बम, तू त्रयम्बकम्, तू शिव:-शिवम्.


तू ही संत असंत महंत है, तू क्षितिज है छोर दिगंत है,
तू अनादि-आदि न अंत है, तू असीम अपार, अनंत है,
तू अघोर घोर जयंत है, तू ही सर्व लोक चरा-चरम्,
तू ही डम-ड-डम, तू ही बम-ब-बम, तू त्रयम्बकम्, तू शिव:-शिवम्.


तू नरत्व में, तू देवत्व में, तू ही पंच-भूत के तत्व में,
तू ही चर-अचर तू अमर-अजर, तू ही जड़ में चित के घनत्व में,
मेरे अंश-मूल शिवत्व में, तू सहत्र नाम सदा-शिवम्,
तू ही डम-ड-डम, तू ही बम-ब-बम, तू त्रयम्बकम्, तू शिव:-शिवम्.

एक यू ट्यूब चेनल शिव की कृपा से बनाया है  ... शिव की क्रपा रहेगी ऐसे कामना है.
चेनल का लिंक है ...


कोशिश रहेगी सनातन संगीत को नए अंदाज़ में प्रस्तुत करने की और 
अपनी शिव स्तुति को भी पेश करने की ...

कुछ लिंक देखिएगा, पसंद आयें तो चेनल को सब्सक्राइब कीजियेगा ...
https://youtu.be/Dm_AC8ZzuQI?si=Qlu3I8P0hVauV_Jr
https://youtu.be/TDVnQwSyI8o?si=nhI1sBkzm23A4tUa
https://youtu.be/3NJp_4Vnk8A?si=sMFiVXkBlvO2_Tjv
https://youtu.be/2VanfKZGmQ0?si=nh_PzQBOUM5GNtVg
https://youtu.be/RWEKtIRIwwo?si=GsRbmv_wRUApslvw

शनिवार, 10 जनवरी 2026

शिव स्तुति - 2

तू समाधि रूप में शंकरम् तू जगत स्वरूप शिवम् शिवम्
तू ही डम-ड-डम, तू ही बम-ब-बम, तू त्रयम्बकम्, तू शिव:-शिवम्

तू ही गीत-अगीत प्रगीत में, तू ही छन्द ताल पुनीत में
तू भविष्य में तू अतीत में, तू समय के साथ व्यतीत में
तू ही वाध यंत्र सुगीत में, तू मृदंग नृत्य है तांडवम्
तू ही डम-ड-डम, तू ही बम-ब-बम, तू त्रयम्बकम्, तू शिव:-शिवम्

तू विषय विकार से है परे, तू विरक्त हो के शशक्त है
तू परोक्ष है, तू समक्ष है, तू ही सर्व लोक में व्यक्त है
तू ही निर्विकार तटस्थ है, तू ही सर्वगोचर भव्यतम्
तू ही डम-ड-डम, तू ही बम-ब-बम, तू त्रयम्बकम्, तू शिव:-शिवम्

तू विराट है तू विशाल है,तू ही शून्य काल-अकाल है
तू मृदुल भी है तो कराल है,तू ही आदियोगी त्रिकाल है
तू ही ब्रह्म-नाद है ताल है, तू ही सर्व रूप चराचरम्
तू ही डम-ड-डम, तू ही बम-ब-बम, तू त्रयम्बकम्, तू शिव:-शिवम्

शुक्रवार, 2 जनवरी 2026

शिव स्तुति … यू ट्यूब लिंक

तू उदय न अस्त में शेष है, तू प्रलय विनाश प्रलेश है,
तू ही शब्द-अशब्द विशेष है, तू ही ब्रह्म-नाद में लेश है,
तू भवेश अशेष महेश है, तू ही सर्व-बंध-विमोचनम्.
तू ही डम-ड-डम, तू ही बम-ब-बम, तू त्रयम्बकम्, तू शिव:-शिवम् …

तू पुराण है तू नवीन है, तू प्रगट भी हो के विलीन है,
तू ही चिर-समाधि में लीन है, ये जगत भी तेरे अधीन है,
तू ही ज्ञान ध्यान प्रवीन है, तू ही शंभु-शंभु महेश्वरम्.
तू ही डम-ड-डम, तू ही बम-ब-बम, तू त्रयम्बकम्, तू शिव:-शिवम् …


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