गम बारिशों के साथ यूँ मिल कर बहा दिए.
हमने तुम्हारी याद के पन्ने हटा दिए.
तकिये को नींद आई न चादर हिली-डुली,
बिस्तर की सलवटों ने फ़साने बना दिए.
शिकवे, गिले, शिकायतें पल भर में मिट गईं,
आँखों में आँखें डाल के वो मुस्कुरा दिए.
पहले इलाज आँख का करते मेरे हजूर,
होठों पे बे-फ़िज़ूल ही ताले लगा दिए.
खिड़की की झिर्रियों से शफ़क झाँकने लगी,
पलकों ने खुद-ब-खुद ये शटर फिर उठा दिए.
दुश्मन के तीर पर ही ये इलज़ाम रख दिया,
किस-किस को कहते यार ने खंज़र चुभा दिए.
रखते थे आफताब की किरणों को बाँध कर,
घर जिनके माहताब ने झट से जला दिए.
तकिये को नींद आई न चादर हिली-डुली,
जवाब देंहटाएंवाह - कमाल
वाह
जवाब देंहटाएंबहुत खूब ! अति सुन्दर अभिव्यक्ति ।
जवाब देंहटाएंआनंदित कर देने वाले अनोखे बिंबों का प्रयोग, बेहतरीन शायरी!!
जवाब देंहटाएंतकिये को नींद आई न चादर हिली-डुली,
जवाब देंहटाएंबिस्तर की सलवटों ने फ़साने बना दिए.
अद्भुत बिम्ब...
लाजवाब गजल
वाह!!!
Loved the gazal...Beautiful lines... 👏👏👏
जवाब देंहटाएंखूब
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