मिटने की तमन्ना है तो कदमों को उठाना.
इतिहास में पन्नों पे न ढूँढेगा ज़माना.
अपनों की सदा रोक न लें आपकी राहें,
इस कर्म के पथ पर जो चलो मुड़ के न आना.
बादल भी निराशा के सताते हैं सफ़र में,
उम्मीद के लम्हों से नई राह बनाना.
इस और से उस और से पहुँचोगे वहीं पर,
चलने के इरादे पे न तुम ऊँगली उठाना.
माना के हमें भूलना मुमकिन तो नहीं है,
इस मील के पत्थर को मगर भूल ही जाना.
मज़बूत इरादों पे वो ऊँगली न उठा दें,
दुनिया को कभी कदमों के छाले न दिखाना.
ग़र मिल न सकी आज तो कल परसों मिलेगी,
कदमों को सफलता न मिले, सर न झुकाना.
स्वप्न मेरे
स्वप्न स्वप्न स्वप्न, सपनो के बिना भी कोई जीवन है
शनिवार, 7 मार्च 2026
शनिवार, 28 फ़रवरी 2026
आदाब उस ख़ुदा का आपसे मिला दिया ...
आदाब उस ख़ुदा का आपसे मिला दिया.
सहरा की रेत पर हसीन गुल खिला दिया.
पत्थर गिरा के चाँद आसमान तोड़ के,
बरसों से सो रही थी झील फिर हिला दिया.
अपनी फटी सी शेरवानी कर के फिर रफू,
बेटे को ईद में नया कुर्ता सिला दिया. .
वो मय थी या के जाम इश्क के भरे हुए,
महफ़िल में आपने हुजूर क्या पिला दिया
बाजू में बैठना नहीं कुबूल आपको,
हम उठ गए तो क्यों उठे है ये गिला दिया.
खुद जिंदगी की ऐश की हर शै खरीद ली,
हम भी थे साथ हमको झुनझुना दिला दिया.
दामन छुड़ा लिया हमारा हाथ काट के,
हमको वफ़ा निभाने का ये सिलसिला दिया.
सहरा की रेत पर हसीन गुल खिला दिया.
पत्थर गिरा के चाँद आसमान तोड़ के,
बरसों से सो रही थी झील फिर हिला दिया.
अपनी फटी सी शेरवानी कर के फिर रफू,
बेटे को ईद में नया कुर्ता सिला दिया. .
वो मय थी या के जाम इश्क के भरे हुए,
महफ़िल में आपने हुजूर क्या पिला दिया
बाजू में बैठना नहीं कुबूल आपको,
हम उठ गए तो क्यों उठे है ये गिला दिया.
खुद जिंदगी की ऐश की हर शै खरीद ली,
हम भी थे साथ हमको झुनझुना दिला दिया.
दामन छुड़ा लिया हमारा हाथ काट के,
हमको वफ़ा निभाने का ये सिलसिला दिया.
शनिवार, 21 फ़रवरी 2026
आग़ाज़ है समर का तो अंजाम आएगा ...
पहले तो गुफ़्तगू में मेरा नाम आएगा.
फिर इसके बाद देखना इल्ज़ाम आएगा.
होगा मेरे ही नाम जो बे-नाम आएगा.
ख़ुशबू के साथ उड़ के जो पैग़ाम आएगा.
यादों का सिलसिला तो नहीं आता पूछ कर,
ऐसे ही दिल में तू कभी गुमनाम आएगा.
बीमार हैं जो इश्क़ में घबराइए नहीं,
बीमार हो के आपको आराम आएगा.
दिल से कभी ये बात मेरी आज़माइए,
राधा का नाम लीजिए घनश्याम आएगा.
मौसम बदल गया है फ़िज़ाओं का यक-ब-यक,
बादल के साथ फिर से मेरा नाम आएगा.
कुछ लम्हे तीरगी के है हिम्मत न हारिए,
लौटा नहीं जो घर पे सुबह, शाम आएगा.
देखा नहीं है हमने तो ऐसा कभी कहीं,
प्याला ज़हर का भेजिए तो जाम आएगा.
आती है रात, दिन भी निकलता है उसके बाद,
आग़ाज़ है समर का तो अंजाम आएगा.
फिर इसके बाद देखना इल्ज़ाम आएगा.
होगा मेरे ही नाम जो बे-नाम आएगा.
ख़ुशबू के साथ उड़ के जो पैग़ाम आएगा.
यादों का सिलसिला तो नहीं आता पूछ कर,
ऐसे ही दिल में तू कभी गुमनाम आएगा.
बीमार हैं जो इश्क़ में घबराइए नहीं,
बीमार हो के आपको आराम आएगा.
दिल से कभी ये बात मेरी आज़माइए,
राधा का नाम लीजिए घनश्याम आएगा.
मौसम बदल गया है फ़िज़ाओं का यक-ब-यक,
बादल के साथ फिर से मेरा नाम आएगा.
कुछ लम्हे तीरगी के है हिम्मत न हारिए,
लौटा नहीं जो घर पे सुबह, शाम आएगा.
देखा नहीं है हमने तो ऐसा कभी कहीं,
प्याला ज़हर का भेजिए तो जाम आएगा.
आती है रात, दिन भी निकलता है उसके बाद,
आग़ाज़ है समर का तो अंजाम आएगा.
शनिवार, 14 फ़रवरी 2026
प्रेम के नाम …
मेरे तमाम जानने वालों के ख्यालों में पली
गुज़रे हुवे अनगिनत सालों की अंजान वैलेंटाइंन
हसीन यादों के कोहरे में छुपी अजनबी हसीना
समर्पित है गुलाब का वो सूखा फूल
जो बरसों क़ैद रहा डायरी के बंद पन्नों में
गुज़रे हुवे अनगिनत सालों की अंजान वैलेंटाइंन
हसीन यादों के कोहरे में छुपी अजनबी हसीना
समर्पित है गुलाब का वो सूखा फूल
जो बरसों क़ैद रहा डायरी के बंद पन्नों में
न तुझसे मिला, न देखा
तू कायनात में उसी दिन आई
जब एक सूखा जंगली गुलाब डायरी में मिला
तू कायनात में उसी दिन आई
जब एक सूखा जंगली गुलाब डायरी में मिला
मेरी तन्हाई की हमसफ़र
अनगिनत क़िस्सों की अंजान महबूबा
ख्यालों की आड़ी तिरछी रेखाओं में जब कभी
तेरा अक्स उकेरने की कोशिश करता हूँ
अनायास तेरे माथे पे बिन्दी सज़ा देता हूँ
जाने अनजाने थमा देता हूँ तेरे हाथों पूजा का थाल
फिर पलकें झुकाए सादगी भरे रूप को निहारता हूँ
मेरा जंगली गुलाब,
मेरी जानी सी अंजान प्रेमिका
तु बरसों पहले क्यों नही मिली …
अनगिनत क़िस्सों की अंजान महबूबा
ख्यालों की आड़ी तिरछी रेखाओं में जब कभी
तेरा अक्स उकेरने की कोशिश करता हूँ
अनायास तेरे माथे पे बिन्दी सज़ा देता हूँ
जाने अनजाने थमा देता हूँ तेरे हाथों पूजा का थाल
फिर पलकें झुकाए सादगी भरे रूप को निहारता हूँ
मेरा जंगली गुलाब,
मेरी जानी सी अंजान प्रेमिका
तु बरसों पहले क्यों नही मिली …
शनिवार, 31 जनवरी 2026
घर जिनके माहताब ने झट से जला दिए ...
गम बारिशों के साथ यूँ मिल कर बहा दिए.
हमने तुम्हारी याद के पन्ने हटा दिए.
तकिये को नींद आई न चादर हिली-डुली,
बिस्तर की सलवटों ने फ़साने बना दिए.
शिकवे, गिले, शिकायतें पल भर में मिट गईं,
आँखों में आँखें डाल के वो मुस्कुरा दिए.
पहले इलाज आँख का करते मेरे हजूर,
होठों पे बे-फ़िज़ूल ही ताले लगा दिए.
खिड़की की झिर्रियों से शफ़क झाँकने लगी,
पलकों ने खुद-ब-खुद ये शटर फिर उठा दिए.
दुश्मन के तीर पर ही ये इलज़ाम रख दिया,
किस-किस को कहते यार ने खंज़र चुभा दिए.
रखते थे आफताब की किरणों को बाँध कर,
घर जिनके माहताब ने झट से जला दिए.
हमने तुम्हारी याद के पन्ने हटा दिए.
तकिये को नींद आई न चादर हिली-डुली,
बिस्तर की सलवटों ने फ़साने बना दिए.
शिकवे, गिले, शिकायतें पल भर में मिट गईं,
आँखों में आँखें डाल के वो मुस्कुरा दिए.
पहले इलाज आँख का करते मेरे हजूर,
होठों पे बे-फ़िज़ूल ही ताले लगा दिए.
खिड़की की झिर्रियों से शफ़क झाँकने लगी,
पलकों ने खुद-ब-खुद ये शटर फिर उठा दिए.
दुश्मन के तीर पर ही ये इलज़ाम रख दिया,
किस-किस को कहते यार ने खंज़र चुभा दिए.
रखते थे आफताब की किरणों को बाँध कर,
घर जिनके माहताब ने झट से जला दिए.
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