स्वप्न मेरे

शनिवार, 3 अक्टूबर 2026

यहाँ सर्दियों का गुलाबी है मौसम …

पहाड़ों ने थामा है सर्दी का परचम,
फ़िज़ाओं में कोहरे की बजती है सरगम.

डिनर सुरमई अब्र पर बुक है अपना,
परिंदों के पर पे चलें बैठ के हम.

वहीं चाँदनी सो रही मस्त हो के,
जहाँ बर्फ़ की है रज़ाई मुलायम.

हवा सर्द मौसम के नश्तर हों जैसे,
खिली धूप जैसे के जाड़ों की मरहम.

चिनारों पे फ़ुर्क़त के लम्हे मिलेंगे,
सुलगते हैं यादों की सिगड़ी में तुम-हम.

चहकने लगे कुछ रिबन आसमानी,
हरी पत्तियों पर गिरी यूँ ही शबनम.

न जाड़ों में ठंडी, न गर्मी गरम हो,
ख़ुदा मान जाए तो बदले ये सिस्टम.

शटर दिन का खुलने पे दिखने लगा है,
यहाँ सर्दियों का गुलाबी है मौसम.
(तरही ग़ज़ल)

शुक्रवार, 25 सितंबर 2026

माँ …

आज माँ को गए 14 वर्ष हो गए, फिर भी अनेकों  बार रोज़ की बातचीत में माँ का ज़िक्र हमेशा रहता है, सच कहते है लोग, माँ आस-पास ही रहती है हमेशा … एक दिन तो बस ईश्वर तय करता है उन यादों को दोहराने के लिए. समय के साथ उम्र पक रही है और शिद्दत के साथ उसकी कमी भी महसूस हो रही है ...


तभी तो राह में ठंडी सी कुछ हवाएँ रहीं,

निकलते वक़्त मेरी माँ की कुछ दुआएँ रहीं.


ये सच है अब वो नहीं है मगर मेरे घर की,

हर एक रीत में माँ की परम्पराएँ रहीं.


शिखर के हो गए आसान रास्ते सारे,

क़दम-क़दम पे मेरी माँ की प्रार्थनाएँ रहीं.


न जाने कौन सी घुट्टी पिलाई है माँ ने,

खरा ही उतरा हूँ जो भी अपेक्षाएँ रहीं.


गुज़रती उम्र का कोई असर रहा होगा,

की माँ के पर्स में ठूँसी हुई दवाएँ रहीं.


बड़ी हुई है वो जब से मैं डाँट खाता हूँ,

की माँ के जैसी ही बेटी में कुछ अदाएँ रहीं.


कहूँ में किस को मेरे दिल को कौन समझेगा,

अधूरी दिल में जो दो चार कामनाएँ रहीं.

शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

संस्कृती धर्म विरासत मेरे गोपाल की है…

मेरी हर एक ज़रूरत मेरे गोपाल की है,
गिन के हर एक मुसीबत मेरे गोपाल की है.

झूलती अलकें अधर मन्द नयन कजरारे,
नील-वर्णी सी ये रंगत मेरे गोपाल की है.

पीत वस्त्रों पे मुकुट मोर सजे हैं सर पर,
ऐसी मन-मोहिनी सूरत मेरे गोपाल की है.

कालिया नाग पे नर्तन भी किया है उसने,
कुछ भी कर लेने की कुव्वत मेरे गोपाल की है.

जन्म का मृत्यु-पुनर्जन्म का लेखा-जोखा,
पाप और पुण्य हकीकत मेरे गोपाल की है.

गोपियों संग रचें रास भुला कर सुध-बुध,
प्रेम की ऐसी रवायत मेरे गोपाल की है.

द्वारका-धीश ही इस जग के सकल हैं स्वामी,
और मुझपे भी इनायत मेरे गोपाल की है.

तन, गगन वायु से पृथ्वी से अगन जल से बना,
रूह लेकिन ये अमानत मेरे गोपाल की है.

अब ये मन ज्ञान की बातों में नहीं है लगता,
अब तो मन को जो लगी लत मेरे गोपाल की है.

जो दिया उस ने दिया जो भी लिया उस से लिया,
मेरी साँसों पे हकूमत मेरे गोपाल की है.

इस भरत-खण्ड के कण-कण में बसी है गीता,
संस्कृती धर्म विरासत मेरे गोपाल की है.

रविवार, 30 अगस्त 2026

दर्द भरे लम्हों को क्या पुस्तक करती हो …

चौबिस-घंटे चैटिंग तो बेशक करती हो,
इश्क़-विश्क़ करती हो या नाटक करती हो.

कुछ पल तुम जब रोक नहीं सकती हो मुख पर,
झूठ-मूठ का ग़ुस्सा क्यों नाहक करती हो.

गुपचुप निकलोगी घर से तो क्या जाएगा,
हील पहन कर बस जब-तब ठक-ठक करती हो.

इश्क़ है तुमसे, इश्क़ है तुमसे, क़सम तुम्हारी,
बात बात पे काहे इतना शक करती हो.

सच बोलो सोती भी हो या धड़कन बन के,
दिल में मेरे पल-पल बस धक-धक करती हो.

जैसी भी है मुझको तो अच्छी लगती है,
मौके-बे-मौके जो ये बक-बक करती हो.

धूप-छाँव, सुख-दुख की, शिकन नहीं चेहरे पर,
दर्द भरे लम्हों को क्या पुस्तक करती हो.

शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

तेरी यादों से ओझल हो गया तो …

इसे पी कर मुक़म्मल हो गया तो,
में प्यासी रूह, तू जल हो गया तो.

बहाते हो जो भर-भर अश्क़ छुप कर,
ये रेगिस्तान जंगल हो गया तो.

रहेगा काम क्या लोगों पे बाक़ी,
धरम का मस’अला हल हो गया तो.

मुहब्बत में न इतने दंश देना,
कहीं ये ज़िस्म संदल हो गया तो.

मुझे तुम ओढ़ लेना सर्दियों में,
तेरी उल्फ़त में कम्बल हो गया तो.

समुंदर हो, तेरी छत, खेत चाहे,
बरस लूँगा जो बादल हो गया तो.

इसे जी लो अभी इस वक्त, है ये,
न होगा आज, पल-कल हो गया तो.

सफ़र मुश्किल न हो फिर ज़िन्दगी का,
तेरी यादों से ओझल हो गया तो.