मिटने की तमन्ना है तो कदमों को उठाना.
इतिहास में पन्नों पे न ढूँढेगा ज़माना.
अपनों की सदा रोक न लें आपकी राहें,
इस कर्म के पथ पर जो चलो मुड़ के न आना.
बादल भी निराशा के सताते हैं सफ़र में,
उम्मीद के लम्हों से नई राह बनाना.
इस और से उस और से पहुँचोगे वहीं पर,
चलने के इरादे पे न तुम ऊँगली उठाना.
माना के हमें भूलना मुमकिन तो नहीं है,
इस मील के पत्थर को मगर भूल ही जाना.
मज़बूत इरादों पे वो ऊँगली न उठा दें,
दुनिया को कभी कदमों के छाले न दिखाना.
ग़र मिल न सकी आज तो कल परसों मिलेगी,
कदमों को सफलता न मिले, सर न झुकाना.
वाह
जवाब देंहटाएंजोश दिलाती हुई सुंदर रचना, चौथे अश्यार में शायद 'और' की जगह 'ओर' होना चाहिए
जवाब देंहटाएंवाह ! उम्मीद की लता लहराने लगी ! अभिनंदन।
जवाब देंहटाएंकभी छाले न दिखाना... क्या कहने सर बहुत खूब लिखा आपने।
जवाब देंहटाएंसादर।
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नमस्ते,
आपकी लिखी रचना मंगलवार १० मार्च २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
बहुत ही शानदार हौंसला बढ़ाती सुंदर रचना साझा करने के लिए हृदय से आभार।
जवाब देंहटाएंबहुत खूब
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