स्वप्न मेरे: कदमों को सफलता न मिले, सर न झुकाना ...

शनिवार, 7 मार्च 2026

कदमों को सफलता न मिले, सर न झुकाना ...

मिटने की तमन्ना है तो कदमों को उठाना.
इतिहास में पन्नों पे न ढूँढेगा ज़माना.

अपनों की सदा रोक न लें आपकी राहें,
इस कर्म के पथ पर जो चलो मुड़ के न आना.

बादल भी निराशा के सताते हैं सफ़र में,
उम्मीद के लम्हों से नई राह बनाना.

इस और से उस और से पहुँचोगे वहीं पर,
चलने के इरादे पे न तुम ऊँगली उठाना.

माना के हमें भूलना मुमकिन तो नहीं है,
इस मील के पत्थर को मगर भूल ही जाना.

मज़बूत इरादों पे वो ऊँगली न उठा दें,
दुनिया को कभी कदमों के छाले न दिखाना.

ग़र मिल न सकी आज तो कल परसों मिलेगी,
कदमों को सफलता न मिले, सर न झुकाना.

6 टिप्‍पणियां:

  1. जोश दिलाती हुई सुंदर रचना, चौथे अश्यार में शायद 'और' की जगह 'ओर' होना चाहिए

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  2. वाह ! उम्मीद की लता लहराने लगी ! अभिनंदन।

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  3. कभी छाले न दिखाना... क्या कहने सर बहुत खूब लिखा आपने।
    सादर।
    ------
    नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना मंगलवार १० मार्च २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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  4. बहुत ही शानदार हौंसला बढ़ाती सुंदर रचना साझा करने के लिए हृदय से आभार।

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