आदाब उस ख़ुदा का आपसे मिला दिया.
सहरा की रेत पर हसीन गुल खिला दिया.
पत्थर गिरा के चाँद आसमान तोड़ के,
बरसों से सो रही थी झील फिर हिला दिया.
अपनी फटी सी शेरवानी कर के फिर रफू,
बेटे को ईद में नया कुर्ता सिला दिया. .
वो मय थी या के जाम इश्क के भरे हुए,
महफ़िल में आपने हुजूर क्या पिला दिया
बाजू में बैठना नहीं कुबूल आपको,
हम उठ गए तो क्यों उठे है ये गिला दिया.
खुद जिंदगी की ऐश की हर शै खरीद ली,
हम भी थे साथ हमको झुनझुना दिला दिया.
दामन छुड़ा लिया हमारा हाथ काट के,
हमको वफ़ा निभाने का ये सिलसिला दिया.
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