गुरुवार, 18 जून 2026
कह-कहे फ़्री में तोल देता है …
वो कहीं कुछ भी बोल देता है.
सोच लो कम-से-कम है क्या क़ीमत,
वो तो कोड़ी का मोल देता है.
टू-द-पॉइंट जवाब दूँ कैसे,
प्रश्न जब गोल-गोल देता है.
कौन सी चैट है ख़ुदा जाने,
लोल के बदले लोल देता है.
वो मदारी है विष फ़िज़ाओं में,
लफ़्ज़-दर-लफ़्ज़ घोल देता है.
वो प्रजातंत्र का है निर्देशक,
चुप ही रहने का रोल देता है.
है तो मुश्किल मगर वो दुख ले कर,
कह-कहे फ्री में तोल देता है.
शनिवार, 10 जनवरी 2026
शिव स्तुति - 2
तू ही डम-ड-डम, तू ही बम-ब-बम, तू त्रयम्बकम्, तू शिव:-शिवम्
तू ही वाध यंत्र सुगीत में, तू मृदंग नृत्य है तांडवम्
तू ही डम-ड-डम, तू ही बम-ब-बम, तू त्रयम्बकम्, तू शिव:-शिवम्
तू विषय विकार से है परे, तू विरक्त हो के शशक्त है
तू परोक्ष है, तू समक्ष है, तू ही सर्व लोक में व्यक्त है
तू ही निर्विकार तटस्थ है, तू ही सर्वगोचर भव्यतम्
तू ही डम-ड-डम, तू ही बम-ब-बम, तू त्रयम्बकम्, तू शिव:-शिवम्
तू विराट है तू विशाल है,तू ही शून्य काल-अकाल है
तू मृदुल भी है तो कराल है,तू ही आदियोगी त्रिकाल है
तू ही ब्रह्म-नाद है ताल है, तू ही सर्व रूप चराचरम्
तू ही डम-ड-डम, तू ही बम-ब-बम, तू त्रयम्बकम्, तू शिव:-शिवम्
शुक्रवार, 27 जून 2025
उम्र मुड़ के न आएगी पर साल में …
भूल जाओ इसे रख के पाताल में.
जीत ख़रगोश की हो या कछुए की हो,
फ़र्क़ होता है दोनों की पर चाल में.
धर्म, दौलत, नियंत्रण, ये सत्ता, नशा,
सब फ़रेबी हैं आना न तुम चाल में.
रिश्ते-नाते, मुहब्बत, ये बन्धन, वचन,
मौज लोगे न आओगे गर जाल में.
आप चाहें न चाहें ये बस में नहीं,
मिल ही जाएँगे कंकड़ हर इक दाल में.
अल-सुबह उठ के गुलशन में आए हो क्यूँ,
फूल खिलने लगे हैं हर इक डाल में.
तैरना-डूबना तो है सब को यहाँ,
जब उतरना हैं जीवन के इस ताल में.
साल-दर-साल आता है मुड़-मुड़ के कुछ,
उम्र मुड़ के न आएगी पर साल में.
शनिवार, 21 जून 2025
किरन जब खिलखिलाती है तेरी तब याद आती है …
तेरी आग़ोश में गुज़री हुई शब याद आती है.
इसी ख़ातिर नहीं के तू ही मालिक है जगत भर का,
मुझे हर वक़्त वैसे भी तेरी रब याद आती है.
मेरे चेहरे पे गहरी चोट का इक दाग है ऐसा,
ये दर्पण देख लेता हूँ तेरी जब याद आती है.
न थी उम्मीद कोई ज़िन्दगी से पर ये सोचा था,
न आएगी कभी भी याद पर अब याद आती है.
सफ़र आसान यूँ होता नहीं है ज़िंदगी भर का,
मुहब्बत में रहो तो दर्द की कब याद आती है.
किसी का अक्स जो तुम ढूँढती रहती हो बादल में,
कहूँ शब्दों में सीधे से तो मतलब याद आती है.
धरा पर धूप उतर आती है ले के रूप की आभा,
किरन जब खिल-खिलाती है तेरी तब याद आती है.
बुधवार, 26 फ़रवरी 2025
महा शिवरात्रि …
अभी कुछ दिन पहले बाबा भीमाशंकर के दर्शन का सौभाग्य मिला और बाबा की विशेष कृपा से कुछ लिखने को प्रभु ने प्रेरित किया … आज महा शिवरात्रि पर रचना के कुछ अँश प्रस्तुत कर रहा हूँ, शीघ्र ही पूरी रचना के साथ प्रस्तुत होऊँगा…जय जय भोले नाथ 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
तू उदय न अस्त में शेष है, तू प्रलय विनाश प्रलेश है
तू ही शब्द-अशब्द विशेष है, तू ही ब्रह्म-नाद में लेश है
तू भवेश,अशेष,महेश है, तू ही सर्व-बंध-विमोचनम्
तू ही डम-ड-डम, तू ही बम-ब-बम, तू त्रयम्बकम्, तू शिव:-शिवम्
तू ही संत असंत महंत है, तू क्षितिज है छोर दिगंत है
तू अनादि-आदि न अंत है, तू असीम अपार, अनंत है
तू अघोर घोर जयंत है, तू ही सर्व लोक चरा-चरम्
तू ही डम-ड-डम, तू ही बम-ब-बम, तू त्रयम्बकम्, तू शिव:-शिवम्
तू ही गीत-अगीत प्रगीत में, तू ही छन्द ताल पुनीत में
तू भविष्य में तू अतीत में, तू समय के साथ व्यतीत में
तू ही वाध यंत्र सुगीत में, तू मृदंग नृत्य है तांडवम्
तू ही डम-ड-डम, तू ही बम-ब-बम, तू त्रयम्बकम्, तू शिव:-शिवम्
तू पुराण है तू नवीन है, तू प्रगट भी हो के विलीन है
तू ही चिर-समाधि में लीन है,ये जगत भी तेरे अधीन है
तू ही ज्ञान, ध्यान प्रवीन है, तू ही शंभु-शंभु महेश्वरम्
तू ही डम-ड-डम, तू ही बम-ब-बम, तू त्रयम्बकम्, तू शिव:-शिवम्
#mahashivratri #shivstuti #महाशिवरात्रि
मंगलवार, 24 दिसंबर 2024
मौन और संवाद
दूरियों को पाटने वाला संवाद
या समय के साथ चौड़ी होती खाई ...
और संवाद ... वो क्या है
महज़ एक वार्तालाप ?
समझने, समझाने का माध्यम ?
या आने वाले सन्नाटे कि और बढ़ता, एक कदम ...
शायद अती में होने वाली हर स्थिति की तरह
मौन और संवाद की सीमा भी ज़रूरी है
वर्ना गिट भर कि दूरी
उम्र भर का फाँसला भी तय नहीं कर पाती ...
शनिवार, 7 सितंबर 2024
सिरफिरे ...
ओर प्रेमिका तो कभी नहीं
मैं नहीं चाहता बढ़ जाए सिरफिरों की गिनती
काँटों में न ढूँढने लग जाएँ जंगली गुलाब
टुकड़ों में न बंट जाए ये शहर …
शनिवार, 29 जून 2024
क़तरा - क़तरा ...
आईना चटखने से पहले
फिर उस रोज़ तुमने भी तो देखा था
अंजान नज़रों से एक टक
दिल की अन-गिनत दरारों से
दर्द टपकता है बे-हिसाब क़तरा – क़तरा ...
शनिवार, 11 मई 2024
मौसम ...
कितना अजीब है ये मौसम
बूंदों के साथ उतर जाते हैं दिन धरती पर
हरी शाल ओढ़े ज़मीन हो उठता मन
करता है चहल कदमी यादों की बेतरतीब घास पर
समय की करवट जाने अनजाने ले आती है सैलाब
कीचड़ होता प्रेम डूब जाता है नाले में
उठती है अजीब सी जिस्मानी गंध
कितनी मिलती जुलती है ये गंध
मन के तहखाने में छुपे प्रेम की खुशबू से
कितना चालबाज है मौसम
आती बारिश के साथ खेलता है खेल प्रेम के
शनिवार, 9 मार्च 2024
शहर - जो गुज़र गया
जिसकी हर शै में गंध रहती थी ज़िन्दगी की
लगभग मिटटी हो गयी सड़क पर
पीली रौशनी का बल्ब तो वहीं खड़ा है
पर अब इक उदासी सी घिरी रहती है उसके इर्द-गिर्द
अरावली की सपाट चट्टानें
जिस पर लिखते थे कभी अपना नाम
खोखली हो चुकी हैं समय के दीमक से
नुक्कड़ का खोखा जहाँ तन्दूर ठण्डा नहीं होता था
आखरी साँस के साथ खड़ा हैं गिरने की प्रतीक्षा में
माना ये सच है
जाने वाले के साथ सब कुछ खत्म तो नहीं होता
पर पता नहीं क्यों दूर-दूर तक फैला मरुस्थल
लील चूका है पूरा इतिहास
सुना था शहर कभी मरते नहीं
तो क्या पसरे हुवे सन्नाटे की साँसों को
किसी जानी पहचानी आहट का इंतज़ार है ...
शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2024
चाह - आशियाने की ...
ठिठोली और झगड़ों के बीच
ना ख़त्म होने वाली ढेर सारी बातों ने
कब ज़हन को गुदगुदाना बंद किया, नहीं पता
तमाम शक्लें, जो मुद्दतों हम-सफ़र रहीं
कब पोटली से गिरीं ... जान नहीं पाया
छोटी-छोटी कितनी ही बे-तरतीब चीजों का खज़ाना
क्यों और किस मोड़ पर बिखरा
समझना मुश्किल है आज
छोटा सा हसीन ख्वाब
जो ठंडी हवा के झौंके के साथ पल्लवित हुआ
कब किस रिक्शे पर छूटा, क्या पता
याद रही तो बस दूसरे से आगे निकल जाने को होड़
सब कुछ पा लेने की जंग ...
एक ऐसे आशियाने की चाह
जहाँ दफ़न हो सके जिस्म से जुड़ी हर याद
जहाँ सुनाई न दे रिश्तों के टूटने की गूँज
पूछता हूँ अपने आप से
अब तो खुश हूँ ... अपने आशियाने में ...
शनिवार, 20 जनवरी 2024
दस्तक ...
वापस लौटने लगी पहाड़ों की धूप
गडरिए भी लौटने लगे अपनी-अपनी भेड़ों के साथ
मौसम बदलने लगा रुख हवा की चाल पर
तुम तो साक्षी थीं उस पल की
कैद किया था हम दोनों ने कायनात का वो लम्हा
झपकती पलकों के दर्मियाँ
उस दिन इन सब के बीच
एक दस्तक और भी हुई थी मेरे दिल के आस-पास
वो शायद पहली हलचल थी प्यार की
क्या तुमने भी महसूस की ऐसी ही कोई हलचल
एक जंगली गुलाब भी तो खिला था उसी पल ...
शनिवार, 6 जनवरी 2024
दुआ ...
पर दौड़ने नहीं देता वक़्त अपने से आगे
जबकि तू सवार रहती है पतंग के उस कोने पे
जो रहता है आसमान में, कट जाने से पहले तक
तेरे कटने का इंतज़ार मुझे मंज़ूर नहीं
दूसरी पतंगों से आँख-मिचौली मैं चाहता नहीं
(तेरी ऊंची उड़ान, हमेशा से मेरी चाहत जो रही है)
शायद ये डोर अब वक़्त के हाथों ठीक नहीं
उम्मीद का क़तरा जो बाकी है आँखों में अभी
पतंग के उसी कोने पे बैठ
दुआ करना तू मेरे हक़ में
सुना है दुनिया बनाने वाला
वहीं रहता है ऊपर आसमान में कहीं …
#जंगली_गुलाब
सोमवार, 1 जनवरी 2024
शनिवार, 9 दिसंबर 2023
वक़्त ...
बिस्तर में अटकी कुछ गीली सलवटें
आँखों में उतरे उदास लम्हों का घना जंगल
अच्छा हुआ झमाझम बरसे बादल ...
नहीं तो कहाँ मुमकिन था
बरसों से जमें दर्द के मैल का निकल पाना
सोंधी मिट्टी की ताज़ा ख़ुशबू लिए झरने का लौट आना
काश गहरे अवसाद में जाने से पहले समझ सकें
हर रात की सुबह निश्चित है
उदास जंगल की उलझी लताओं के पीछे
चमचमाता है नीला आसमान
जहाँ खिली होती हैं सूरज की सतरंगी किरणें
किसी अजनबी की राह तकती
किसी मासूम प्रेम की इंतज़ार में
आस पास ही खिला होता है जंगली गुलाब भी ...
शनिवार, 2 दिसंबर 2023
जो हाथ कभी हमसे मरोड़ा नहीं गया ...
इक आईना था हमसे जो तोड़ा नहीं गया.
बेहतर तो यही होगा के खुद को समेट लें,
पथ तेज़ बवंडर का जो मोड़ा नहीं गया.
यह इश्क़ अधूरा ही न रह जाए उम्र भर,
नदिया को समुन्दर से जो जोड़ा नहीं गया.
टूटे तो न जुड़ पाएँगे ता-उम्र फिर कभी,
रिश्तों को अगर वक़्त पे जोड़ा नहीं गया.
मुश्किल है समझना के है आरम्भ या है अंत,
इस छोर से उस छोर जो दौड़ा नहीं गया.
मुमकिन है दिखेगा कभी गर्दन के आस-पास,
जो हाथ कभी हमसे मरोड़ा नहीं गया.
गुरुवार, 16 नवंबर 2023
कह-कहे फ़्री में तोल देता है …
पोल ऐसे ही खोल देता है.
सोच लो कम-से-कम है क्या क़ीमत,
वो तो कोड़ी का मोल देता है.
प्रश्न जब गोल-गोल देता है.
कौन सी चैट है ख़ुदा जाने,
लोल के बदले लोल देता है.
वो मदारी है विष फ़िज़ाओं में,
लफ़्ज़-दर-लफ़्ज़ घोल देता है.
वो प्रजातंत्र का है निर्देशक,
चुप ही रहने का रोल देता है
है तो मुश्किल मगर वो दुख ले कर,
कह-कहे फ्री में तोल देता है.
शनिवार, 31 दिसंबर 2022
नव-वर्ष …
हम दिसंबर की इक्कत्तिस रात में अब क्या करें ?
क्या विगत का ग़म के स्वागत मिल के आगत का करें ?
हम दिसंबर की …
है जो यह नव-वर्ष तम के साथ फिर आता है क्यों ?
बात है आनंद कि तो दुख चले आता है क्यों ?
नींद की टिक-टिक में उतरें पल तो क्या उसका करें ?
हम दिसंबर की …
वेदना का अंत क्या नव-वर्ष से हो पाएगा ?
भूख से छुटकारा क्या मानव को फिर मिल पाएगा ?
व्यर्थ है अवधारणा तो गीत क्यों गाया करें ?
हम दिसंबर की …
चल रहा आदित्य-पृथ्वी-चंद्रमा का दिव्य रथ,
लय सुनिश्चित, ताल नियमित, काल का पर एक पथ,
फिर बदल के वर्ष यह व्यवधान क्यों पैदा करें ?
हम दिसंबर की …
गुरुवार, 17 नवंबर 2022
ग़ज़ल …
गीली रेत पे सौंधी-सौंधी पुरवाई के कश भरते.
मफलर ओढ़े इश्क़ खड़ा है तन्हाई के कश भरते.
इश्क़ पका तो कच्ची-खट्टी-अम्बी भी महकी पल-पल,
पागल-पागल तितली झूमी अमराई के कश भरते.
शोर हुआ डब्बा, बस्ते, जूते, रिब्बन, चुन्नी, उछली,
पगडण्डी से बच्चे भागे तरुनाई के कश भरते.
सोचा डूब के उभरेंगे जब डूबेंगे इन आँखों में,
होले-होले डूब गए हम गहराई के कश भरते.
चाँद की चाहत या सागर के उन्मादीपन का मंज़र,
लहरों ने साहिल को चूमा रुसवाई के कश भरते.
बादल की जिद्द चाँद का धोखा कुछ सड़कों का सन्नाटा,
इन्डिया गेट पे वक़्त गुज़ारा हरजाई के कश भरते.
काश नज़र की चिट्ठी पर भी एक नज़र डाली होती,
होटों ने तो झूठ कहा था सच्चाई के कश भरते.
रविवार, 23 अक्टूबर 2022
दीपाली - फुलझड़ी ...
सभी मित्रों को दीपावली की हार्दिक बधाई और ढेरों शुभकामनायें ... कुछ नए दोहे अभी हाल ही में प्रकाशित पत्रिका “अनुभूति” के साथ ...
बच्चे, बूढ़े, चिर-युवा, हर आयू में ख़ास
भाँति-भाँति की फुलझड़ी, मिलती सब के पास
दीपों के त्योहार
में, फुलझड़ियों का जोर
बच्चों का तो ठीक
है, बड़े भी माँगे मोर
सरपट स्याही रात की, दौड़ी उल्टे पाँव
सजग फुलझड़ी आ गई, अंधियारे के गाँव
फुलझड़ियाँ केवल
नहीं, दीपोत्सव त्योहार
राम राज की कल्पना, एक समग्र विचार
टिम-टिम तारों सा
लगे फुलझड़ियों का रूप
ज्यों बादल की ओट
से झिलमिल-झिलमिल धूप
मर्यादा तोड़ी नहीं, राम गए वनवास
अवध पधारे लौट कर, प्रकट हुआ मधु-मास
फुलझड़ियों के नाम
पर, दीप-पर्व पर क्रोध
अधिक प्रदूषण हो
रहा, कह-कर करें विरोध
जगमग-जगमग फुलझड़ी, सुतली बंब घनघोर
चिटपिट-चिटपिट बज
उठीं, कुछ लड़ियाँ कमजोर
