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गुरुवार, 31 अक्टूबर 2024
तेरी खुशबू से महके ख़त मिले हैं ...
उजाले के पर्व दीपावली की सभी को हार्दिक शुभकामनाएं ...
प्रभु राम का आगमन सभी को शुभ हो ...
तभी ये दीप घर-घर में जले हैं.
सजग सीमाओं पर प्रहरी खड़े हैं.
जले इस बार दीपक उनकी खातिर,
वतन के वास्ते जो मर मिटे हैं.
झुकी पलकें, दुपट्टा आसमानी,
यहाँ सब आज सतरंगी हुवे हैं.
अमावस की हथेली से फिसल कर,
उजालों के दरीचे खुल रहे हैं.
पटाखों से प्रदूषण हो रहा है,
दीवाली पर ही क्यों जुमले बने हैं.
सुबह उठ कर छुए हैं पाँव माँ के,
हमारे लक्ष्मी पूजन हो चुके हैं.
सफाई में मिली इस बार दौलत,
तेरी खुशबू से महके ख़त मिले हैं.
(तरही ग़ज़ल)
प्रभु राम का आगमन सभी को शुभ हो ...
तभी ये दीप घर-घर में जले हैं.
सजग सीमाओं पर प्रहरी खड़े हैं.
जले इस बार दीपक उनकी खातिर,
वतन के वास्ते जो मर मिटे हैं.
झुकी पलकें, दुपट्टा आसमानी,
यहाँ सब आज सतरंगी हुवे हैं.
अमावस की हथेली से फिसल कर,
उजालों के दरीचे खुल रहे हैं.
पटाखों से प्रदूषण हो रहा है,
दीवाली पर ही क्यों जुमले बने हैं.
सुबह उठ कर छुए हैं पाँव माँ के,
हमारे लक्ष्मी पूजन हो चुके हैं.
सफाई में मिली इस बार दौलत,
तेरी खुशबू से महके ख़त मिले हैं.
(तरही ग़ज़ल)
रविवार, 23 अक्टूबर 2022
दीपाली - फुलझड़ी ...
सभी मित्रों को दीपावली की हार्दिक बधाई और ढेरों शुभकामनायें ... कुछ नए दोहे अभी हाल ही में प्रकाशित पत्रिका “अनुभूति” के साथ ...
बच्चे, बूढ़े, चिर-युवा, हर आयू में ख़ास
भाँति-भाँति की फुलझड़ी, मिलती सब के पास
दीपों के त्योहार
में, फुलझड़ियों का जोर
बच्चों का तो ठीक
है, बड़े भी माँगे मोर
सरपट स्याही रात की, दौड़ी उल्टे पाँव
सजग फुलझड़ी आ गई, अंधियारे के गाँव
फुलझड़ियाँ केवल
नहीं, दीपोत्सव त्योहार
राम राज की कल्पना, एक समग्र विचार
टिम-टिम तारों सा
लगे फुलझड़ियों का रूप
ज्यों बादल की ओट
से झिलमिल-झिलमिल धूप
मर्यादा तोड़ी नहीं, राम गए वनवास
अवध पधारे लौट कर, प्रकट हुआ मधु-मास
फुलझड़ियों के नाम
पर, दीप-पर्व पर क्रोध
अधिक प्रदूषण हो
रहा, कह-कर करें विरोध
जगमग-जगमग फुलझड़ी, सुतली बंब घनघोर
चिटपिट-चिटपिट बज
उठीं, कुछ लड़ियाँ कमजोर
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