उजाले के पर्व दीपावली की सभी को हार्दिक शुभकामनाएं ...
प्रभु राम का आगमन सभी को शुभ हो ...
तभी ये दीप घर-घर में जले हैं.
सजग सीमाओं पर प्रहरी खड़े हैं.
जले इस बार दीपक उनकी खातिर,
वतन के वास्ते जो मर मिटे हैं.
झुकी पलकें, दुपट्टा आसमानी,
यहाँ सब आज सतरंगी हुवे हैं.
अमावस की हथेली से फिसल कर,
उजालों के दरीचे खुल रहे हैं.
पटाखों से प्रदूषण हो रहा है,
दीवाली पर ही क्यों जुमले बने हैं.
सुबह उठ कर छुए हैं पाँव माँ के,
हमारे लक्ष्मी पूजन हो चुके हैं.
सफाई में मिली इस बार दौलत,
तेरी खुशबू से महके ख़त मिले हैं.
(तरही ग़ज़ल)
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गुरुवार, 31 अक्टूबर 2024
सोमवार, 10 नवंबर 2014
सुर्ख़ियों में न कभी खबर में आ सके ...
शाम आ सके न वो सहर में आ सके
दर्द फिर कभी न रह-गुज़र में आ सके
कायनात प्रेम से सजा दो इस कदर
लौट के वो शख्स अपने घर में आ सके
जिक्र है हमारा महफ़िलों में आज भी
पर कभी न आपकी नज़र में आ सके
दो ही आंसुओं ने डाल दी थी बेड़ियाँ
फिर कभी न लौट के सफ़र में आ सके
हद से बढ़ गई थी बेरुखी जनाब की
इसलिए न अपने हम शहर में आ सके
मर मिटे जो सिरफिरे वतन की आन पर
सुर्ख़ियों में ना कभी खबर में आ सके
दर्द फिर कभी न रह-गुज़र में आ सके
कायनात प्रेम से सजा दो इस कदर
लौट के वो शख्स अपने घर में आ सके
जिक्र है हमारा महफ़िलों में आज भी
पर कभी न आपकी नज़र में आ सके
दो ही आंसुओं ने डाल दी थी बेड़ियाँ
फिर कभी न लौट के सफ़र में आ सके
हद से बढ़ गई थी बेरुखी जनाब की
इसलिए न अपने हम शहर में आ सके
मर मिटे जो सिरफिरे वतन की आन पर
सुर्ख़ियों में ना कभी खबर में आ सके
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