स्वप्न मेरे: संस्कृती धर्म विरासत मेरे गोपाल की है…

शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

संस्कृती धर्म विरासत मेरे गोपाल की है…

मेरी हर एक ज़रूरत मेरे गोपाल की है,
गिन के हर एक मुसीबत मेरे गोपाल की है.

झूलती अलकें अधर मन्द नयन कजरारे,
नील-वर्णी सी ये रंगत मेरे गोपाल की है.

पीत वस्त्रों पे मुकुट मोर सजे हैं सर पर,
ऐसी मन-मोहिनी सूरत मेरे गोपाल की है.

कालिया नाग पे नर्तन भी किया है उसने,
कुछ भी कर लेने की कुव्वत मेरे गोपाल की है.

जन्म का मृत्यु-पुनर्जन्म का लेखा-जोखा,
पाप और पुण्य हकीकत मेरे गोपाल की है.

गोपियों संग रचें रास भुला कर सुध-बुध,
प्रेम की ऐसी रवायत मेरे गोपाल की है.

द्वारका-धीश ही इस जग के सकल हैं स्वामी,
और मुझपे भी इनायत मेरे गोपाल की है.

तन, गगन वायु से पृथ्वी से अगन जल से बना,
रूह लेकिन ये अमानत मेरे गोपाल की है.

अब ये मन ज्ञान की बातों में नहीं है लगता,
अब तो मन को जो लगी लत मेरे गोपाल की है.

जो दिया उस ने दिया जो भी लिया उस से लिया,
मेरी साँसों पे हकूमत मेरे गोपाल की है.

इस भरत-खण्ड के कण-कण में बसी है गीता,
संस्कृती धर्म विरासत मेरे गोपाल की है.

6 टिप्‍पणियां:

  1. कान्हा जी की जय हो

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  4. सुंदर सरस!! जय श्री कृष्ण !!

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