चौबिस-घंटे चैटिंग तो बेशक करती हो,
इश्क़-विश्क़ करती हो या नाटक करती हो.
कुछ पल तुम जब रोक नहीं सकती हो मुख पर,
झूठ-मूठ का ग़ुस्सा क्यों नाहक करती हो.
गुपचुप निकलोगी घर से तो क्या जाएगा,
हील पहन कर बस जब-तब ठक-ठक करती हो.
इश्क़ है तुमसे, इश्क़ है तुमसे, क़सम तुम्हारी,
बात बात पे काहे इतना शक करती हो.
सच बोलो सोती भी हो या धड़कन बन के,
दिल में मेरे पल-पल बस धक-धक करती हो.
जैसी भी है मुझको तो अच्छी लगती है,
मौके-बे-मौके जो ये बक-बक करती हो.
धूप-छाँव, सुख-दुख की, शिकन नहीं चेहरे पर,
दर्द भरे लम्हों को क्या पुस्तक करती हो.
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