स्वप्न मेरे: सितंबर 2026

शुक्रवार, 25 सितंबर 2026

माँ …

आज माँ को गए 14 वर्ष हो गए, फिर भी अनेकों  बार रोज़ की बातचीत में माँ का ज़िक्र हमेशा रहता है, सच कहते है लोग, माँ आस-पास ही रहती है हमेशा … एक दिन तो बस ईश्वर तय करता है उन यादों को दोहराने के लिए. समय के साथ उम्र पक रही है और शिद्दत के साथ उसकी कमी भी महसूस हो रही है ...


तभी तो राह में ठंडी सी कुछ हवाएँ रहीं,

निकलते वक़्त मेरी माँ की कुछ दुआएँ रहीं.


ये सच है अब वो नहीं है मगर मेरे घर की,

हर एक रीत में माँ की परम्पराएँ रहीं.


शिखर के हो गए आसान रास्ते सारे,

क़दम-क़दम पे मेरी माँ की प्रार्थनाएँ रहीं.


न जाने कौन सी घुट्टी पिलाई है माँ ने,

खरा ही उतरा हूँ जो भी अपेक्षाएँ रहीं.


गुज़रती उम्र का कोई असर रहा होगा,

की माँ के पर्स में ठूँसी हुई दवाएँ रहीं.


बड़ी हुई है वो जब से मैं डाँट खाता हूँ,

की माँ के जैसी ही बेटी में कुछ अदाएँ रहीं.


कहूँ में किस को मेरे दिल को कौन समझेगा,

अधूरी दिल में जो दो चार कामनाएँ रहीं.

शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

संस्कृती धर्म विरासत मेरे गोपाल की है…

मेरी हर एक ज़रूरत मेरे गोपाल की है,
गिन के हर एक मुसीबत मेरे गोपाल की है.

झूलती अलकें अधर मन्द नयन कजरारे,
नील-वर्णी सी ये रंगत मेरे गोपाल की है.

पीत वस्त्रों पे मुकुट मोर सजे हैं सर पर,
ऐसी मन-मोहिनी सूरत मेरे गोपाल की है.

कालिया नाग पे नर्तन भी किया है उसने,
कुछ भी कर लेने की कुव्वत मेरे गोपाल की है.

जन्म का मृत्यु-पुनर्जन्म का लेखा-जोखा,
पाप और पुण्य हकीकत मेरे गोपाल की है.

गोपियों संग रचें रास भुला कर सुध-बुध,
प्रेम की ऐसी रवायत मेरे गोपाल की है.

द्वारका-धीश ही इस जग के सकल हैं स्वामी,
और मुझपे भी इनायत मेरे गोपाल की है.

तन, गगन वायु से पृथ्वी से अगन जल से बना,
रूह लेकिन ये अमानत मेरे गोपाल की है.

अब ये मन ज्ञान की बातों में नहीं है लगता,
अब तो मन को जो लगी लत मेरे गोपाल की है.

जो दिया उस ने दिया जो भी लिया उस से लिया,
मेरी साँसों पे हकूमत मेरे गोपाल की है.

इस भरत-खण्ड के कण-कण में बसी है गीता,
संस्कृती धर्म विरासत मेरे गोपाल की है.