मेरी हर एक ज़रूरत मेरे गोपाल की है,
गिन के हर एक मुसीबत मेरे गोपाल की है.
झूलती अलकें अधर मन्द नयन कजरारे,
नील-वर्णी सी ये रंगत मेरे गोपाल की है.
पीत वस्त्रों पे मुकुट मोर सजे हैं सर पर,
ऐसी मन-मोहिनी सूरत मेरे गोपाल की है.
कालिया नाग पे नर्तन भी किया है उसने,
कुछ भी कर लेने की कुव्वत मेरे गोपाल की है.
जन्म का मृत्यु-पुनर्जन्म का लेखा-जोखा,
पाप और पुण्य हकीकत मेरे गोपाल की है.
गोपियों संग रचें रास भुला कर सुध-बुध,
प्रेम की ऐसी रवायत मेरे गोपाल की है.
द्वारका-धीश ही इस जग के सकल हैं स्वामी,
और मुझपे भी इनायत मेरे गोपाल की है.
तन, गगन वायु से पृथ्वी से अगन जल से बना,
रूह लेकिन ये अमानत मेरे गोपाल की है.
अब ये मन ज्ञान की बातों में नहीं है लगता,
अब तो मन को जो लगी लत मेरे गोपाल की है.
जो दिया उस ने दिया जो भी लिया उस से लिया,
मेरी साँसों पे हकूमत मेरे गोपाल की है.
इस भरत-खण्ड के कण-कण में बसी है गीता,
संस्कृती धर्म विरासत मेरे गोपाल की है.
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शुक्रवार, 4 सितंबर 2026
सोमवार, 11 मई 2020
कृष्ण
बहाने से प्रश्न करता हूँ स्वयं से ... पर उलझ जाता हूँ अपने कर्म से ... असम्भव
को सम्भव करने के प्रयास में फिर फंस जाता हूँ मोह-जाल में ... फिर सोचता हूँ, ऐसी
चाह रखता ही क्यों हूँ ... चाहत का कोई तो अंत होना चाहिए ...
क्या मनुष्य
या सत्य कहूं तो ... मैं
कभी कृष्ण बन पाऊंगा ... ?
मोह-माया से दूर
अपना-पराया मन से हटा
निज से परे
सत्य और धर्म की
राह पर
स्वयं को होम कर
पाऊंगा
क्या कृष्ण का
सत्य जान जाऊंगा
कर्म के मार्ग
पर
एक क्षण के लिए
ही
कृष्ण बन पाऊंगा ... ?
सोमवार, 3 सितंबर 2018
कर्म का उपदेश कान्हा नाम है ...
सभी की श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक बधाई ... कान्हा की कृपा सभी पर बनी रहे ...
इस मुई मुरली को कब विश्राम है
है जहां राधा वहीं घनश्याम है
बाल यौवन द्वारका के धीश हों
नन्द लल्ला को कहाँ आराम है
हाथ तो पहुँचे नहीं छींके तलक
गोप माखन चोर बस बदनाम है
पूछ कर देखो बिहारी लाल से
है जहां पर प्रेम वो ब्रज-धाम है
रास हो बस रास हो गोपाल संग
गोपियों का घर न कोई ग्राम है
हे कन्हैया शरण में ले लो मुझ
तू ही मेरा कृष्ण तू ही राम है
धर्म पथ पर ना कभी विचलित हुए
कर्म का उपदेश कान्हा नाम है
कर्म का उपदेश कान्हा नाम है
सोमवार, 15 अगस्त 2016
वेश वाणी भेद तज कर हो तिरंगा सर्वदा ...
सभी देश वासियों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं ...
लक्ष्य पर दृष्टि अटल अंतस हठीला चाहिए
शेष हो साहस सतत यह पथ लचीला चाहिए
हों भला अवरोध चाहे राह में बाधाएं हों
आत्मा एकाग्र चिंतन तन गठीला चाहिए
मुक्त पंछी, मुक्त मन, हों मुक्त आशाएं सभी
मुक्त हो धरती पवन आकाश नीला चाहिए
पीत सरसों, पीत चन्दन, खिल उठे सूरजमुखी
लहलहाता खेत हो परिधान पीला चाहिए
प्रेम निश्छल नैन पुलकित संतुलित सा आचरण
स्वप्न सत-रंगी सरल यौवन सजीला चाहिए
वेश वाणी भेद तज कर हो तिरंगा सर्वदा
चिर विजय की कामना हो कृष्ण लीला चाहिए
लक्ष्य पर दृष्टि अटल अंतस हठीला चाहिए
शेष हो साहस सतत यह पथ लचीला चाहिए
हों भला अवरोध चाहे राह में बाधाएं हों
आत्मा एकाग्र चिंतन तन गठीला चाहिए
मुक्त पंछी, मुक्त मन, हों मुक्त आशाएं सभी
मुक्त हो धरती पवन आकाश नीला चाहिए
पीत सरसों, पीत चन्दन, खिल उठे सूरजमुखी
लहलहाता खेत हो परिधान पीला चाहिए
प्रेम निश्छल नैन पुलकित संतुलित सा आचरण
स्वप्न सत-रंगी सरल यौवन सजीला चाहिए
वेश वाणी भेद तज कर हो तिरंगा सर्वदा
चिर विजय की कामना हो कृष्ण लीला चाहिए
मंगलवार, 2 दिसंबर 2014
मील के पत्थर कभी इस रह-गुज़र के देखना ...
मील के पत्थर कभी इस रह-गुज़र के देखना
लोग मिल जाएंगे फिर मेरे शहर के देखना
दूर तक तन्हा मिलेगी रेत रेगिस्तान की
फल मगर मीठे मिलेंगे इस शजर के देखना
चुट्कियों में नाप लोगे प्रेम की गहराई तुम
मन के गहरे ताल में पहले उतर के देखना
पल दो पल में देख लोगे आदमी का सच सभी
दिल को पहले आईने सा साफ़ कर के देखना
इश्क के खिलने लगेंगे फूल पीली रेत पर
प्रेम के सहरा में पहले खुद उतर के देखना
प्रेम के आकाश पर बस कृष्ण है औ कृष्ण है
वेदना में विरह की राधा निखर के देखना
लोग मिल जाएंगे फिर मेरे शहर के देखना
दूर तक तन्हा मिलेगी रेत रेगिस्तान की
फल मगर मीठे मिलेंगे इस शजर के देखना
चुट्कियों में नाप लोगे प्रेम की गहराई तुम
मन के गहरे ताल में पहले उतर के देखना
पल दो पल में देख लोगे आदमी का सच सभी
दिल को पहले आईने सा साफ़ कर के देखना
इश्क के खिलने लगेंगे फूल पीली रेत पर
प्रेम के सहरा में पहले खुद उतर के देखना
प्रेम के आकाश पर बस कृष्ण है औ कृष्ण है
वेदना में विरह की राधा निखर के देखना
सोमवार, 24 मार्च 2014
जानना प्रेम को ...
प्रेम का क्या कोई स्वरुप है? कोई शरीर जिसे महसूस किया जा सके, छुआ जा सके ... या वो एक सम्मोहन है ... गहरी नींद में जाने से ठीक पहले कि एक अवस्था, जहाँ सोते हुवे भी जागृत होता है मन ... क्या सच में प्रेम है, या है एक माया कृष्ण की जहाँ बस गोपियाँ ही गोपियाँ हैं, चिर-आनंद की अवस्था है ... फिर मैं ... मैं क्या हूँ ... तुम्हारी माया में बंधा कृष्ण, या कृष्ण सम्मोहन में बंधी राधा ... पर जब प्रेम है, कृष्ण है, राधा है, गोपियाँ हैं, मैं हूँ, तू है ... तो क्या जरूरी है जानना प्रेम को ...
कई बार करता हूँ कोशिश
कैनवस के बे-रँग परदे पे तुझे नए शेड में उतारने की
चेतन मन बैठा देता है तुझे पास की ही मुंडेर पर
कायनात के चटख रँग लपेटे
शुरू होती है फिर एक जद्दोजहद चेतन और अवचेतन के बीच
गुजरते समय के साथ उतरने लगते हैं समय के रँग
शून्य होने लगता है तेरा अक्स
खुद-ब-खुद घुल जाते हैं रँग
उतर आती है तू साँस लेती कैनवस के बे-रँग परदे पर
गुलाबी साड़ी पे आसमानी शाल ओढ़े
पूजा कि थाली हाथों में लिए
पलकें झुकाए सादगी भरे रूप में
सच बताना जानाँ
क्या रुका हुआ है समय तभी से
या आई है तू सच में मेरे सामने इस रूप में ...?
कई बार करता हूँ कोशिश
कैनवस के बे-रँग परदे पे तुझे नए शेड में उतारने की
चेतन मन बैठा देता है तुझे पास की ही मुंडेर पर
कायनात के चटख रँग लपेटे
शुरू होती है फिर एक जद्दोजहद चेतन और अवचेतन के बीच
गुजरते समय के साथ उतरने लगते हैं समय के रँग
शून्य होने लगता है तेरा अक्स
खुद-ब-खुद घुल जाते हैं रँग
उतर आती है तू साँस लेती कैनवस के बे-रँग परदे पर
गुलाबी साड़ी पे आसमानी शाल ओढ़े
पूजा कि थाली हाथों में लिए
पलकें झुकाए सादगी भरे रूप में
सच बताना जानाँ
क्या रुका हुआ है समय तभी से
या आई है तू सच में मेरे सामने इस रूप में ...?
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