स्वप्न मेरे: Maa
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शुक्रवार, 25 सितंबर 2026

माँ …

आज माँ को गए 14 वर्ष हो गए, फिर भी अनेकों  बार रोज़ की बातचीत में माँ का ज़िक्र हमेशा रहता है, सच कहते है लोग, माँ आस-पास ही रहती है हमेशा … एक दिन तो बस ईश्वर तय करता है उन यादों को दोहराने के लिए. समय के साथ उम्र पक रही है और शिद्दत के साथ उसकी कमी भी महसूस हो रही है ...


तभी तो राह में ठंडी सी कुछ हवाएँ रहीं,

निकलते वक़्त मेरी माँ की कुछ दुआएँ रहीं.


ये सच है अब वो नहीं है मगर मेरे घर की,

हर एक रीत में माँ की परम्पराएँ रहीं.


शिखर के हो गए आसान रास्ते सारे,

क़दम-क़दम पे मेरी माँ की प्रार्थनाएँ रहीं.


न जाने कौन सी घुट्टी पिलाई है माँ ने,

खरा ही उतरा हूँ जो भी अपेक्षाएँ रहीं.


गुज़रती उम्र का कोई असर रहा होगा,

की माँ के पर्स में ठूँसी हुई दवाएँ रहीं.


बड़ी हुई है वो जब से मैं डाँट खाता हूँ,

की माँ के जैसी ही बेटी में कुछ अदाएँ रहीं.


कहूँ में किस को मेरे दिल को कौन समझेगा,

अधूरी दिल में जो दो चार कामनाएँ रहीं.

गुरुवार, 25 सितंबर 2025

माँ

आ गई २५ सितम्बर ... वैस तो माँ आस-पास ही होती है पर आज के दिन रह-रह के उसकी कमी महसूस होती है ... माँ जो है मेरी ... पिछले 13 सालों में उम्र पक गई, बूढ़ा भी हो गया पर उसे याद कर के बचपना घिर आता है … 


माँ नायक अध्यापक रथ-संचालक होती है.

तिल-तिल जलती जीवन पथ पर दीपक होती है.


दख़ल बनी रहती जब तक घर गृहस्ती में माँ की,

हँसी-ठिठोली गुस्सा मस्ती तब तक होती है.


रिश्ते-नाते, लेन-देन, सुख-दुख, साँझ-सवेरा,

माँ जब तक होती है घर में रौनक होती है.


उम्र भले हो घर में सब छोटे ही रहते हैं,

बूढ़ी हो कर भी माँ सबकी रक्षक होती है.


देख के क्यों लगता है तुरपाई में उलझी माँ,

रिश्तों के कच्चे धागों में बंधक होती है.


बचपन से ले कर जब तक रहती हमें ज़रूरत,

संपादक हो कर भी वो आलोचक होती है.


कदम-कदम पे माँ ने की है क्षमता विकसित जो,

निर्णय लेने में पल पल निर्णायक होती है.