स्वप्न मेरे: ख़त
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गुरुवार, 31 अक्टूबर 2024

तेरी खुशबू से महके ख़त मिले हैं ...

उजाले के पर्व दीपावली की सभी को हार्दिक शुभकामनाएं ...
प्रभु राम का आगमन सभी को शुभ हो ...


तभी ये दीप घर-घर में जले हैं.
सजग सीमाओं पर प्रहरी खड़े हैं.

जले इस बार दीपक उनकी खातिर,
वतन के वास्ते जो मर मिटे हैं.

झुकी पलकें, दुपट्टा आसमानी,
यहाँ सब आज सतरंगी हुवे हैं.

अमावस की हथेली से फिसल कर,
उजालों के दरीचे खुल रहे हैं.

पटाखों से प्रदूषण हो रहा है,
दीवाली पर ही क्यों जुमले बने हैं.

सुबह उठ कर छुए हैं पाँव माँ के,
हमारे लक्ष्मी पूजन हो चुके हैं.

सफाई में मिली इस बार दौलत,
तेरी खुशबू से महके ख़त मिले हैं.
(तरही ग़ज़ल)

सोमवार, 22 अप्रैल 2019

मेरी निगाह में रहता है वो ज़माने से ...


कभी वो भूल से आए कभी बहाने से  
मुझे तो फर्क पड़ा बस किसी के आने से

नहीं ये काम करेगा कभी उठाने से
ये सो रहा है अभी तक किसी बहाने से

लिखे थे पर न तुझे भेज ही सका अब-तक
मेरी दराज़ में कुछ ख़त पड़े पुराने से

कभी न प्रेम के बंधन को आज़माना यूँ
के टूट जाते हैं रिश्ते यूँ आज़माने से

तुझे छुआ तो हवा झूम झूम कर महकी   
पलाश खिलने लगे डाल के मुहाने से

निगाह भर के मुझे देख क्या लिया उस दिन  
यहाँ के लोग परेशाँ हैं इस फ़साने से

मुझे वो देख भी लेता तो कुछ नहीं कहता
मेरी निगाह में रहता है वो ज़माने से
(तरही गज़ल) 

सोमवार, 22 अक्टूबर 2018

हम तुझे सिगरेट समझ कर फूंकते ही रह गए ...


अध-लिखे कागज़ किताबों में दबे ही रह गए
कुछ अधूरे ख़त कहानी बोलते ही रह गए

शाम की आगोश से जागा नहीं दिन रात भर
प्लेट में रक्खे परांठे ऊंघते ही रह गए

रेलगाड़ी सा ये जीवन दौड़ता पल पल रहा
खेत, खम्बे, घर जो छूटे, छूटते ही रह गए

सिलवटों ने रात के किस्से कहे तकिये से जब 
बल्ब पीली रौशनी के जागते ही रह गए

सुरमई चेहरा, पसीना, खुरदरे हाथों का “टच” 
ज़िन्दगी बस एक लम्हा, देखते ही रह गए

पल उबलती धूप के जब पी रही थी दो-पहर
हम तेरे बादल तले बस भीगते ही रह गए

तुम धुंए के साथ मेरी ज़िन्दगी पीती रहीं 
हम तुझे सिगरेट समझ कर फूंकते ही रह गए

सोमवार, 14 नवंबर 2016

इन आँखों से ये ख्वाब ले लो ...

अपने ख़त का जवाब ले लो
इन हाथों से गुलाब ले लो

चाहो मिलना कभी जो मुझ से
दिल की मेरे किताब ले लो

अनजाने ही दिए थे जो फिर
उन ज़ख्मों का हिसाब ले लो

मिलने वाला बने न दुश्मन
चेहरे पर ये नकाब ले लो

अमृत सा वो असर करेगी
उनके हाथों शराब ले लो

काटेंगे ये सफ़र अकेला
इन आँखों से ये ख्वाब ले लो

मंगलवार, 31 मई 2016

ये न समझो इसका मतलब सर झुकाना हो गया ...

जब से ये फुटपाथ रहने का ठिकाना हो गया
बारिशों में भीगने का इक बहाना हो गया

ख़त कभी पुर्ज़ा कभी कोने में बतियाते रहे
हमने बोला कान में तो फुसफुसाना हो गया

हम कहेंगे कुछ तो कहने का हुनर आता नहीं
जग सुनाएगा तो कह देंगे फ़साना हो गया

सीख लो अंदाज़ जीने का परिंदों से ज़रा
मिल गया दो वक़्त का तो चहचहाना हो गया

जिंदगी की कशमकश में इस कदर मसरूफ हूँ
खुद से ही बातें किए अब तो ज़माना हो गया

आपकी इज्ज़त के चलते हो गए खामोश हम
ये न समझो इसका मतलब सर झुकाना हो गया  

सोमवार, 25 अप्रैल 2016

कहा, हम चले जब मुहब्बत में गिरने ...

भरोसे से निकलोगे जब काम करने
बचा लोगे खुद को लगोगे जो गिरने

सफेदी सरों पे लगी है उतरने 
समझ लो जवानी लगी अब बिखरने

किनारा हूँ मैं आँख भर देख लेना 
चलो जब समुंदर को बाहों में भरने

यहाँ चैन से कौन जीने है देता 
न जब चैन से कोई देता है मरने

वहीं पर उजाला नहीं हो सका है
जहां रोक रक्खीं हैं बादल ने किरनें

तेरे ख़त के टुकड़े गिरे थे जहां पर
वहीं पर निकल आए पानी के झरने

है आसान तलवार पे चलते रहना
कहा, हम चले जब मुहब्बत में गिरने