बदी, बंदगी, ग़म, हँसी, दिल्लगी के.
नहीं छोड़ता हूँ में मौक़े ख़ुशी के.
तुम अपना-पराया, मिटा कर तो देखो,
सफ़र कितने आसान हैं ज़िन्दगी के.
लहू हमने देखा है ताज़ा टपकता,
खतावार लम्हों से अब-तक सदी के.
वफ़ा, कहकहे, जाम, रिश्तों में लज्ज़त,
मिले ग़र ये बूटे खिलें दोस्ती के.
तुम्हें लफ़्ज़-दर-लफ़्ज़, रेशा-ब-रेशा,
पढ़ूँगा हुनर देखना शायरी के.
ये झिड़की थी, फिरकी थी, धमकी थी क्या था,
संदेशे नहीं ग़र जो नाराज़गी के.
सुलगता सा सूरज, सितारे, ये आतिश,
ये जुगनू मिले दौड़ में रौशनी के.
वे हैं देश-द्रोही के हैं राज-द्रोही,
गले में हैं फन्दे किसी अजनबी के.
जुदा रंगो-बू, ताज़गी, ढंग, सीरत,
मगर ग़म हैं यकसाँ गुलों में लड़ी के.
न खिड़की खुली ओर न छत झिलमिलाई,
हुवे स्वाद फ़ीके मेरी चासनी के.
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रविवार, 5 जुलाई 2026
शनिवार, 23 नवंबर 2024
सपना, काँच या ज़िन्दगी ...
खुद पे पाबन्दी कभी कामयाब नहीं होती
कभी कभी तोड़ने की जिद्द इतनी हावी होती है
पता नहीं चलता कौन टूटा ...
“सपना, काँच या ज़िन्दगी”
खुद से करने को ढेरों बातें
फुसरत के लम्हे आसानी से कहाँ मिलते हैं
काश टूटने से पहले पूरी हो ये चाहत ...
कभी कभी तोड़ने की जिद्द इतनी हावी होती है
पता नहीं चलता कौन टूटा ...
“सपना, काँच या ज़िन्दगी”
खुद से करने को ढेरों बातें
फुसरत के लम्हे आसानी से कहाँ मिलते हैं
काश टूटने से पहले पूरी हो ये चाहत ...
#जंगली_गुलाब
शनिवार, 25 मई 2024
कचरा ज़िन्दगी का ...
समय से पहले
समय से आगे निकल जाने का जूनून
पा लेने की जद्दोजहद
समेटता गया सब कुछ ज़िन्दगी की नाव में
समझ नहीं सका जरूरी है इतनी जगह का होना
की सहेज सकूँ लूटी हुयी पतंगों के माँझे
गुलाब के सूखे फूल, भीगते लम्हे के किस्से
खुशियों की गुल्लक, यादों के मर्तबान
आज उम्र के इस पड़ाव पर
जबकि इच्छाओं का अंत नज़र आने लगा है
कुछ नहीं बाकी सुविधाओं के अलावा, भौतिक सुख के इतर
ज़िन्दगी के लम्बे सफ़र में जरूरत होती है उन सब चीज़ों की
छोड़ देते हैं जिन्हें हम कचरे का ढेर समझ कर ...
समय से आगे निकल जाने का जूनून
पा लेने की जद्दोजहद
समेटता गया सब कुछ ज़िन्दगी की नाव में
समझ नहीं सका जरूरी है इतनी जगह का होना
की सहेज सकूँ लूटी हुयी पतंगों के माँझे
गुलाब के सूखे फूल, भीगते लम्हे के किस्से
खुशियों की गुल्लक, यादों के मर्तबान
आज उम्र के इस पड़ाव पर
जबकि इच्छाओं का अंत नज़र आने लगा है
कुछ नहीं बाकी सुविधाओं के अलावा, भौतिक सुख के इतर
ज़िन्दगी के लम्बे सफ़र में जरूरत होती है उन सब चीज़ों की
छोड़ देते हैं जिन्हें हम कचरे का ढेर समझ कर ...
शनिवार, 18 मई 2024
ज़िन्दगी ...
दौड़ें इतना कि खुद के करीब आ जाएँ
सुने अपने दिल की धड़कन
महसूस करें अपनी गर्म साँसें
कि उनके नाम से जीते रहना ज़िन्दगी तो नहीं
सो जाओ तुम ...
नहीं आ सकोगी ख़्वाबों में
कसम ली है आँखों ने रात भर न सोने की
तुम्हारे अलावा भी तिलिस्मी है ये ज़िन्दगी ...
सुने अपने दिल की धड़कन
महसूस करें अपनी गर्म साँसें
कि उनके नाम से जीते रहना ज़िन्दगी तो नहीं
सो जाओ तुम ...
नहीं आ सकोगी ख़्वाबों में
कसम ली है आँखों ने रात भर न सोने की
तुम्हारे अलावा भी तिलिस्मी है ये ज़िन्दगी ...
#जंगली_गुलाब
शनिवार, 9 मार्च 2024
शहर - जो गुज़र गया
मुद्दतों बाद उन रास्तों से गुज़रा
जिसकी हर शै में गंध रहती थी ज़िन्दगी की
लगभग मिटटी हो गयी सड़क पर
पीली रौशनी का बल्ब तो वहीं खड़ा है
पर अब इक उदासी सी घिरी रहती है उसके इर्द-गिर्द
अरावली की सपाट चट्टानें
जिस पर लिखते थे कभी अपना नाम
खोखली हो चुकी हैं समय के दीमक से
नुक्कड़ का खोखा जहाँ तन्दूर ठण्डा नहीं होता था
आखरी साँस के साथ खड़ा हैं गिरने की प्रतीक्षा में
माना ये सच है
जाने वाले के साथ सब कुछ खत्म तो नहीं होता
पर पता नहीं क्यों दूर-दूर तक फैला मरुस्थल
लील चूका है पूरा इतिहास
सुना था शहर कभी मरते नहीं
तो क्या पसरे हुवे सन्नाटे की साँसों को
किसी जानी पहचानी आहट का इंतज़ार है ...
जिसकी हर शै में गंध रहती थी ज़िन्दगी की
लगभग मिटटी हो गयी सड़क पर
पीली रौशनी का बल्ब तो वहीं खड़ा है
पर अब इक उदासी सी घिरी रहती है उसके इर्द-गिर्द
अरावली की सपाट चट्टानें
जिस पर लिखते थे कभी अपना नाम
खोखली हो चुकी हैं समय के दीमक से
नुक्कड़ का खोखा जहाँ तन्दूर ठण्डा नहीं होता था
आखरी साँस के साथ खड़ा हैं गिरने की प्रतीक्षा में
माना ये सच है
जाने वाले के साथ सब कुछ खत्म तो नहीं होता
पर पता नहीं क्यों दूर-दूर तक फैला मरुस्थल
लील चूका है पूरा इतिहास
सुना था शहर कभी मरते नहीं
तो क्या पसरे हुवे सन्नाटे की साँसों को
किसी जानी पहचानी आहट का इंतज़ार है ...
शनिवार, 16 दिसंबर 2023
ज़िन्दगी ...
इसलिए तो नहीं छोड़ देते दौडना
की काँटों भरी हैं जिंदगी की राहें,
झड़ जाने के डर से उगना बंद नहीं कर देते पत्ते,
हो सके तो कभी मत खोलना ज़िन्दगी के बीते पन्ने
रंग खत्म नहीं होते वक़्त के, न ही ज़िन्दगी के पन्ने ...
खत्म होती है तो चाह, कुछ कर गुजरने की
ललक कुछ पाने की ...
मेरी जिद्द है तुझे पाने की, मेरे हाथों में हैं नए रंग
खुला हुआ है ज़िन्दगी का एक नया पन्ना
काफी है मुझे उम्र भर के लिए ...
की काँटों भरी हैं जिंदगी की राहें,
झड़ जाने के डर से उगना बंद नहीं कर देते पत्ते,
हो सके तो कभी मत खोलना ज़िन्दगी के बीते पन्ने
रंग खत्म नहीं होते वक़्त के, न ही ज़िन्दगी के पन्ने ...
खत्म होती है तो चाह, कुछ कर गुजरने की
ललक कुछ पाने की ...
मेरी जिद्द है तुझे पाने की, मेरे हाथों में हैं नए रंग
खुला हुआ है ज़िन्दगी का एक नया पन्ना
काफी है मुझे उम्र भर के लिए ...
मंगलवार, 18 जुलाई 2023
तमाम उम्र ही जैसे गुज़ार बैठा हो ...
कहीं से चल के कहीं बार-बार बैठा हो.
मेरी तलाश में हिम्मत न हार बैठा हो.
नमक छिड़कते हैं कुछ लोग घाव पर अक्सर,
कहीं वो खुद से न पट्टी उतार बैठा हो.
यकीं नहीं तो यकीनन भरम रहेगा उसे,
भले ही पास में परवर-दिगार बैठा हो.
फ़क़ीर दिल से मुकद्दर की भेंट देता है,
गरीब हो के कहीं माल-दार बैठा हो.
पराई आग में तपती है ज़िन्दगी ऐसे,
बदन में जैसे किसी का बुखार बैठा हो.
लिबास ज़िस्म पे रहता है काँच का हर-दम,
कहीं किसी को न पत्थर से मार बैठा हो.
उलझ के एक ही लम्हे में रह गया इतना,
तमाम उम्र ही जैसे गुज़ार बैठा हो.
मेरी तलाश में हिम्मत न हार बैठा हो.
नमक छिड़कते हैं कुछ लोग घाव पर अक्सर,
कहीं वो खुद से न पट्टी उतार बैठा हो.
यकीं नहीं तो यकीनन भरम रहेगा उसे,
भले ही पास में परवर-दिगार बैठा हो.
फ़क़ीर दिल से मुकद्दर की भेंट देता है,
गरीब हो के कहीं माल-दार बैठा हो.
पराई आग में तपती है ज़िन्दगी ऐसे,
बदन में जैसे किसी का बुखार बैठा हो.
लिबास ज़िस्म पे रहता है काँच का हर-दम,
कहीं किसी को न पत्थर से मार बैठा हो.
उलझ के एक ही लम्हे में रह गया इतना,
तमाम उम्र ही जैसे गुज़ार बैठा हो.
शनिवार, 6 अगस्त 2022
फ़लसफा - लम्बी उम्र का ...
माँगता है इन्सान दुआ लम्बी उम्र की
पर नहीं समझ पाता कौन सी उम्र
ढल जाता है बचपन नासमझी में
बीत जाती है जवानी तय शुदा साँसों में
हाँ ... मिलती है लम्बी उम्र
जो आती है सिर्फ बुढापे के हिस्से
उम्र के एक ऐसे पक्ष में जहाँ दर्द के सिवा कुछ नहीं होता
डर रोज़ का हिस्सा होता है
अकेलेपन का एहसास गहरे अँधेरे सा फैलता है जहाँ
काश की लम्बी उम्र से ज्यादा अच्छी उम्र की दुआ होती
न होता तो बचपन लम्बा हो जाता या जवानी की राह ख़त्म न होती
काश की लम्बी उम्र की दुआओं के बाद
आमीन बोलने से पहले कोई तो समझाता ... लम्हों का घटा जोड़
किसको पता होता है लम्बी उम्र की दुआ आती है बुढापे के हिस्से
गुरुवार, 25 नवंबर 2021
कहीं से छूट गए पर कही से उलझे हैं
कहीं से छूट गए पर कही से उलझे हैं.
हम अपनी ज़िन्दगी में यूँ सभी से उलझे हैं.
नदी है जेब में पर तिश्नगी से उलझे हैं,
अजीब लोग हैं जो खुदकशी से उलझे हैं.
नहीं जो प्रेम, पतंगों की
ख़ुद-कुशी कह लो,
समझते-बूझते जो रौशनी से उलझे हैं.
तरक्कियों के शिखर झुक गए मेरी खातिर,
मगर ये दीद गुलाबी कली से उलझे हैं.
जो अपने सच से भी नज़रें चुरा रहे अब तक,
किसी के झूठ में वो ज़िन्दगी से उलझे हैं.
सुनो ये रात हमें दिन में काटनी होगी,
अँधेरे देर से उस रौशनी से उलझे हैं.
किसी से नज़रें मिली, झट से प्रेम, फिर शादी,
ज़ईफ़ लोग अभी कुण्डली से उलझे हैं.
निगाह में तो न आते सुकून से रहते,
गजल कही है तो उस्ताद जी से उलझे हैं.
सोमवार, 8 अप्रैल 2019
किसी के दर्द में तो यूँ ही छलक लेता हूँ ...
हज़ार काम उफ़ ये सोच के थक लेता हूँ
में बिन पिए जनाब रोज़ बहक लेता हूँ
ये फूल पत्ते बादलों में तेरी सूरत है
वहम न हो मेरा में पलकें झपक लेता हूँ
कभी न पास टिक सकेगी उदासी मेरे
तुझे नज़र से छू के रोज़ महक लेता हूँ
हरी हरी वसुंधरा पे सृजन हो पाए
में बन के बूँद बादलों से टपक लेता हूँ
तमाम रात तुझे देखना है खिड़की से
में चाँद बन के टहनियों में अटक लेता
हूँ
मुझे सिफ़त अता करी है मेरे मौला ने
सुबह से शाम पंछियों सा चहक लेता हूँ
यही असूल मुद्दतों से मेरा है काइम
ख़ुशी के साथ साथ ग़म भी लपक लेता हूँ
तमाम अड़चनों से मिट न सकेगी हस्ती
में ठोकरों से ज़िन्दगी का सबक लेता हूँ
सितम हज़ार सह लिए हैं सभी हँस हँस के
किसी के दर्द में तो यूँ ही छलक लेता
हूँ
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