स्वप्न मेरे: लम्हा
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बुधवार, 31 जनवरी 2024

नादान लम्हा ...

हालाँकि लौटने लगा है वक़्त
यादों के सैलाब के साथ
दौड़ गया था जो ठीक उस पल, मिले थे जब पहली बार

वो नहीं छोड़ना चाहता, तेरे मेरे प्रेम का कोई भी राज़दार लम्हा

लौटने लगी है बारिश
सिमिट गयी थी जो बूँद बन कर उस पल
गुज़र जाती है ख़ामोश सरसराहट भी
अपने होने का एहसास दिला कर
तेज़ आँधियों के बीच रेत पर उभर कर मिटते हैं
कुछ क़दमों के निशान ...
लौटने लगे हैं फूल, पत्ते भी उगने लगे पेड़ों पर
काट कर बादलों का आवरण, बे-मौसम खिलने लगी है धूप

दूर कहीं मुस्कुराती है ख़ामोशी
और खिलखिलाता है जंगली गुलाब का आवारा पेड़
आज भी उस लम्हे पर, वक़्त की नादानी पर

प्रेम को कब कहाँ किसने समझा है ...
#जंगली_गुलाब

मंगलवार, 18 जुलाई 2023

तमाम उम्र ही जैसे गुज़ार बैठा हो ...

कहीं से चल के कहीं बार-बार बैठा हो.
मेरी तलाश में हिम्मत न हार बैठा हो.

नमक छिड़कते हैं कुछ लोग घाव पर अक्सर,
कहीं वो खुद से न पट्टी उतार बैठा हो.

यकीं नहीं तो यकीनन भरम रहेगा उसे,
भले ही पास में परवर-दिगार बैठा हो.

फ़क़ीर दिल से मुकद्दर की भेंट देता है,
गरीब हो के कहीं माल-दार बैठा हो.

पराई आग में तपती है ज़िन्दगी ऐसे,
बदन में जैसे किसी का बुखार बैठा हो.

लिबास ज़िस्म पे रहता है काँच का हर-दम,
कहीं किसी को न पत्थर से मार बैठा हो.

उलझ के एक ही लम्हे में रह गया इतना,
तमाम उम्र ही जैसे गुज़ार बैठा हो.

मंगलवार, 12 जुलाई 2016

गुज़र गए जो पल वो लौट कर नहीं मिलते ...

हजार ढूंढ लो वो उम्र भर नहीं मिलते
उजड़ गए जो आँधियों में घर नहीं मिलते

नसीब हो तो उम्र भर का साथ मिलता है
किसी के ढूँढने से हम-सफ़र नहीं मिलते

जो दुःख में सुख में साथ थे गले लगाने को
यहाँ वहां कहीं भी वो शजर नहीं मिलते

उड़ान होंसले से भर सको तो उड़ जाना
घरों में बंद पंछियों को पर नहीं मिलते

जो जी सको तो जी लो जिंदगी का हर लम्हा
गुज़र गए जो पल वो लौट कर नहीं मिलते

बुधवार, 24 जून 2015

सोच ...

प्रेम में डूब जाना योगी हो जाना तो नहीं ... फिर जीवन से आगे किसने देखा ... अचानक एक छोटे से सुख का मिलना, फिर उस सुख को अपने ही आस-पास बनाये रखने की चाह बनाए रखना ... थोड़ा सा स्वार्थी होना बेमानी तो नहीं ...

क्योंकि ऊंचाई का सफ़र
तन्हाई के रास्ते से गुज़रता है
मैं यह नहीं कहूँगा
की तुम जीवन में नई ऊँचाइयाँ छुओ

मैंने तो अपनी उड़ान का दायरा
उसी दिन तय कर लिया था
जिस दिन तुम ज़िन्दगी में आईं

मैं यह भी नहीं कहूँगा
तुमको मेरी उम्र लग जाए

क्योंकि मेरी उम्र की सीमा तो तय है
तुम्हारी उम्र की तरह
और में जीना चाहता हूँ हर गुज़रता लम्हा
तेरे और बस तेरे ही साथ

हाँ मैं जानता हूँ
खुदगर्जी की पराकाष्ठा है ये
अपने से आगे नहीं सोच पाने का स्वार्थ

पर क्या करूं ये सोच ये सोच भी तो कमबख्त
तेरे पे आकर ही ख़त्म होती है