नफ़ा करते-करते भी कम हो रहे हैं.
बुढ़ापे में तेवर नरम हो रहे हैं.
ये दौलत की तितली पकड़ते-पकड़ते,
बहुत दूर अपनों से हम हो रहे हैं.
जमा खर्च करते हुए हमने जाना,
उधारी में डूबी रकम हो रहे हैं.
झगड़ते-लिपटते ख़रामा-ख़रामा,
शरीके-कदम हम-कदम हो रहे हैं.
किसानों के कानों में बरखा के मोती,
कहरवा की मीठी रिदम हो रहे हैं.
दुःख आए तो अपनों की यादें भी आईं,
सुख आए तो हम बे-शरम हो रहे हैं.
ख़ुदा की नहीं खा रहे हैं हमारी,
क़सम से हम उनकी क़सम हो रहे हैं.
ख़बर की लिखावट का तड़का है कहता,
के हम अब पराई कलम हो रहे हैं.
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है