ढूँढते हो क्यों पुराने आईने चटके हुए.
और कुछ लम्हे किसी दीवार पे अटके हुए.
हम है ठहरी झील की मानिन्द गुज़रे वक़्त की,
लोग आते है किसी की याद में भटके हुए.
डूबना तो था हमारे भाग्य में लिक्खा हुआ,
हम तो वो हैं तिनके से भी खींच के झटके हुए.
एक आवारा नदी से बह रहे थे दूर तक,
वक़्त के बदलाव में तालाब हम घट के हुए.
उगते सूरज को हमेशा साथ रखते हैं सभी,
हम हैं ढलती शाम जैसे धूप से पटके हुए.
नाप में छोटा बड़ा होना लिखा तक़दीर में,
हम क़मीज़ों से हैं अक्सर शैल्फ़ में लटके हुए.
क्या कहूँगा सोच कर खोला नहीं दर फिर कभी,
पर न जाने घर पे कितनी बार ही खटके हुए.
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सोमवार, 8 सितंबर 2025
रविवार, 12 जुलाई 2015
सोच लो ताज हो न ये सर का ...
रास्ता जब तलाशने निकले
खुद के क़दमों को नापने निकले
रोक लेते जो रोकना होता
हम तो थे सब के सामने निकले
जिंदगी दांव पे लगा डाली
इश्क में हम भी हारने निकले
कब से पसरा हुआ है सन्नाटा
चीख तो कोई मारने निकले
चाँद उतरा है झील में देखो
लोग पत्थर उछालने निकले
सोच लो ताज हो न ये सर का
तुम जो बोझा उतारने निकले
खुद के क़दमों को नापने निकले
रोक लेते जो रोकना होता
हम तो थे सब के सामने निकले
जिंदगी दांव पे लगा डाली
इश्क में हम भी हारने निकले
कब से पसरा हुआ है सन्नाटा
चीख तो कोई मारने निकले
चाँद उतरा है झील में देखो
लोग पत्थर उछालने निकले
सोच लो ताज हो न ये सर का
तुम जो बोझा उतारने निकले
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