उसने विनम्रता से छुपाई कटार है.
मुख जिसका शिष्टता से ढका इश्तहार है.
किसने किया है साँसों का वितरण बताओ तो,
जीवन मरण का कौन यहाँ सूत्र-धार है.
शालीनता के सूत्र किताबों में छोड़ना,
बदले समय में बस ये सफलता का द्वार है.
अब तक न ओढ़ पाया जो निष्पक्ष आवरण,
कहता है स्वाभिमान से इतिहासकार है.
हर सत्य के निवास पे कालिख पुती हुई,
वातावरण में झूठ का इतना प्रचार है.
अपना तो सब मेरा है मगर, सबका सब मेरा,
इस बात का जो सार है उत्तम विचार है.
कहने को लगती ठीक है पर सच में दिल को क्या,
जितनी विजय है उतनी ही स्वीकार हार है.
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शुक्रवार, 25 अप्रैल 2025
सोमवार, 11 जून 2018
साथ गर मेरा तुम्हे स्वीकार हो ...
जीत मेरी हो न तेरी हार हो
जो सही है बस वही हरबार हो
रात ने बादल के कानों में कहा
हट जरा सा चाँद का दीदार हो
नाव उतरेगी सफीनों से तभी
हाथ में लहरों के जब पतवार हो
है मुझे मंज़ूर हर व्योपार पर
पाँच ना हो दो जमा दो, चार हो
मौत है फिर भी नदी का ख्वाब
है
बस समुन्दर ही मेरा घरबार हो
इक नया इतिहास लिख दूंगा सनम
साथ गर मेरा तुम्हे स्वीकार
हो
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