स्वप्न मेरे: सपने
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सोमवार, 1 जून 2020

सपने आँखों में


किसी की आँखों में झाँकना
उसके दर्द को खींच निकालना नहीं होता 
ना ही होता है उसके मन की बात
लफ्ज़-दर-लफ्ज़ पढ़ना

उसकी गहरी नीली आँखों में
प्रेम ढूँढना तो बिलकुल भी नहीं होता  

हाँ ... होते हैं कुछ अधूरे सपने उन आँखों में
देखना चाहता हूँ जिन्हें
समेटना चाहता हूँ जिनको
करना चाहता हूँ दुआ जिनके पूरे होने की

सपनों का टूट जाना
ज़िन्दगी के छिज जाने से कम नहीं ...

समेटन चाहता हूँ साँस लेती पँखुरी-पँखुरी
चाहता हूँ खिल उठे जंगली गुलाब ...

#जंगली_गुलाब 

सोमवार, 27 अप्रैल 2020

दास्ताँ - हसीन सपनों की ...


इंद्र-धनुष के सात रँगों में रँग नहीं होते ... रँग सूरज की किरणों में भी नहीं होते और आकाश के नीलेपन में तो बिलकुल भी नहीं ... रँग होते हैं तो देखने वाले की आँखों में जो जागते हैं प्रेम के एहसास से ...  

दुनिया रंगीन दिखे
इसलिए तो नहीं भर लेते रँग आँखों में   

उदास रातों की कुछ उदास यादें
आँसू बन के न उतरें
तो खुद-ब-खुद रंगीन हो जाती है दुनिया

दुनिया तब भी रंगीन होती है
जब हसीन लम्हों के द्रख्त
जड़ बनाने लगते हैं दिल की कोरी ज़मीन पर
क्योंकि उसके साए में उगे रंगीन सपने
जगमगाते हैं उम्र भर

सच पूछो तो दुनिया तब भी रंगीन होती है     
जब तेरे एहसास के कुछ कतरे लिए  
फूल फूल डोलती हैं तितलियाँ
ओर उनके पीछे भागते कुछ मासूम बच्चे
रँग-बिरँगे कपड़ों में

पूजा की थाली लिए
गुलाबी साड़ी पे आसमानी शाल ओढ़े 
तुम भी तो करती हो चहल-कदमी रोज़ मेरे ज़ेहन में
दुनिया इसलिए भी तो रंगीन होती है

दुनिया इसलिए भी रंगीन होती है
कि टांकती हो तुम जुड़े में जंगली गुलाब

#जंगली_गुलाब

सोमवार, 9 सितंबर 2019

एक सौदागर हूँ सपने बेचता हूँ ...


मैं कई गन्जों को कंघे बेचता हूँ
एक सौदागर हूँ सपने बेचता हूँ

काटता हूँ मूछ पर दाड़ी भी रखता 
और माथे के तिलक तो साथ रखता  
नाम अल्ला का भी शंकर का हूँ लेता
है मेरा धंधा तमन्चे बेचता हूँ
एक सौदागर हूँ ...

धर्म का व्यापार मुझसे पल रहा है
दौर अफवाहों का मुझसे चल रहा है  
यूँ नहीं तो शह्र सारा जल रहा है
चौंक पे हर बार झगड़े बेचता हूँ
एक सौदागर हूँ ...

एक ही गोदाम में है माल सारा  
गाड़ियाँ, पत्थर, के झन्डा हो के नारा
हर गली, नुक्कड़ पे सप्लाई मिलेगी    
टोपियों के साथ चमचे बेचता हूँ
एक सौदागर हूँ ...

हर विपक्षी का कहा लिखता रहा हूँ  
जो कहे सरकार मैं जपता रहा हूँ
मैं ही टी.वी., मीडिया, अख़बार नेट मैं
यार हूँ पैसे का ख़बरें बेचता हूँ 
एक सौदागर हूँ ...

सोमवार, 16 मई 2016

आँखों में रोज़ सपने सजाना नहीं भूलो ...

रिश्ता नया बने तो पुराना नहीं भूलो
तुम दोस्ती का फर्ज़ निभाना नहीं भूलो

जो फूल आँधियों की शरारत से हैं टूटे
उन को भी देवता पे चढ़ाना नहीं भूलो

जागे हुओं को यूँ भी उठाना नहीं आसाँ
जो सो रहे हैं उनको उठाना नहीं भूलो

इंसान हो तो साथ हो इंसानियत इतनी
तुम डूबतों को तिनका थमाना नहीं भूलो

तुमको जो आसमान को छूने की है चाहत
आँखों में रोज़ सपने सजाना नहीं भूलो

रविवार, 4 अगस्त 2013

सपना माँ का ...

मैं देखता था सपने कुछ बनने के 
भाई भी देखता था कुछ ऐसे ही सपने 
बहन देखती थी कुछ सपने जो मैं नहीं जान सका 
पर माँ जरूर जानती थी उन्हें, बिना जाने ही   

सपने तो पिताजी भी देखते थे हमारे भविष्य के 
एक छोटे से मकान के, सुखी परिवार के    
समाज में, रिश्तेदारी में एक मुकाम के 

हर किसी के पास अपने सपनों की गठरी थी 
सबको अपने सपनों से लगाव था, 
अनंत फैलाव था, जहां चाहते थे सब छलांग लगाना 
वो सब कुछ पाना, जिसकी वो करते थे कल्पना 

ऐसा नहीं की माँ नहीं देखती थी सपने 
वो न सिर्फ देखती थी, बल्कि दुआ भी मांगती थी उनके पूरे होने की 
मैं तो ये भी जानता हूं ...   
हम सब में बस वो ही थीं, जो सतत प्रयास भी करती थी 
अपने सपनों को पूर्णतः पा लेने की 

हाँ ... ये सच है की एक ही सपना था माँ का   
और ये बात मेरे साथ साथ घर के सब जानते थे   
और वो सपना था ... 
हम सब के सपने पूरे होने का सपना  
उसके हाथ हमारे सपने पूरे होने की दुआ में ही उठते रहे   

हालंकि सपने तो मैं अब भी देखता हूँ 
शायद मेरे सपने पूरे होने की दुआ में उठने वाले हाथ भी हैं     

पर मेरे सपने पूरे हों ... 
बस ऐसा ही सपने देखने वाली माँ नहीं है अब ...