सुबह की चाय में इलायची सी तुम,
दिन भर छूती हो ज़िस्म हवा की मानिंद,
रात होते ही उतर आती हो खुमारी सी,
करती हो चहल-क़दमी ख़्वाबों के बीच …
सुकूनी चादर सा तुम्हारा अहसास,
आसमानी शाल सा तुम्हारा विस्तार,
ज़िंदगी यूँ नहीं गुज़र रही लम्हा-लम्हा,
कुछ तो अच्छा लिखा था मेरे खातों में …
जिनकी एवज़ में तुम मिलीं.
बिगड़ते मौसम के वजूद से बचाने वाली …
यूँ ही मुझसे लिपट कर उम्र भर चलते रहना.
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सोमवार, 18 सितंबर 2023
सोमवार, 27 अप्रैल 2020
दास्ताँ - हसीन सपनों की ...
इंद्र-धनुष के सात रँगों में रँग नहीं होते ... रँग सूरज की
किरणों में भी नहीं होते और आकाश के नीलेपन में तो बिलकुल भी नहीं ... रँग होते
हैं तो देखने वाले की आँखों में जो जागते हैं प्रेम के एहसास से ...
दुनिया रंगीन दिखे
इसलिए तो नहीं भर लेते रँग आँखों में
उदास रातों की कुछ उदास यादें
आँसू बन के न उतरें
तो खुद-ब-खुद रंगीन हो जाती है दुनिया
दुनिया तब भी रंगीन होती है
जब हसीन लम्हों के द्रख्त
जड़ बनाने लगते हैं दिल की कोरी ज़मीन पर
क्योंकि उसके साए में उगे रंगीन सपने
जगमगाते हैं उम्र भर
सच पूछो तो दुनिया तब भी
रंगीन होती है
जब तेरे एहसास के कुछ कतरे लिए
फूल फूल डोलती हैं तितलियाँ
ओर उनके पीछे भागते कुछ मासूम बच्चे
रँग-बिरँगे कपड़ों में
पूजा की थाली लिए
गुलाबी साड़ी पे आसमानी शाल ओढ़े
तुम भी तो करती हो चहल-कदमी रोज़ मेरे ज़ेहन में
दुनिया इसलिए भी तो रंगीन होती है
दुनिया इसलिए भी रंगीन होती है
कि टांकती हो तुम जुड़े में जंगली गुलाब
#जंगली_गुलाब
सोमवार, 30 मार्च 2020
हिसाब चाहत का
कहाँ खिलते हैं फूल रेगिस्तान में ... हालांकि पेड़ हैं जो
जीते हैं बरसों बरसों नमी की इंतज़ार में ... धूल है की साथ छोड़ती नहीं ... नमी है
की पास आती नहीं ... कहने को सागर साथ है पीला सा ...
मैंने चाहा तेरा हर दर्द
अपनी रेत के गहरे समुन्दर में लीलना
तपती धूप के रेगिस्तान में मैंने कोशिश की
धूल के साथ उड़ कर
तुझे छूने का प्रयास किया
पर काले बादल की कोख में
बेरंग आंसू छुपाए
बिन बरसे तुम गुजर गईं
आज मरुस्थल का वो फूल भी मुरझा गया
जी रहा था जो तेरी नमी की प्रतीक्षा में
कहाँ होता है चाहत पे किसी का बस ...
मंगलवार, 27 जून 2017
सुकून ...
सुकून अगर मिल सकता बाज़ार में तो कितना अच्छा होता ... दो
किलो ले आता तुम्हारे लिए भी ... काश की पेड़ों पे लगा होता सुकून ... पत्थर मारते
भर लेते जेब ... क्या है किसी के पास या सबको है तलाश इसकी ...
नहीं चाहता प्यार करना
के जीना चाहता हूं कुछ पल सुकून के
अपने आप से किये वादों से परे
उड़ना चाहता हूं उम्मीद के छलावों से इतर
के छू सकूँ आसमां
फिर चाहे न आ सकूँ वापस ज़मीन पर
गिरती पड़ती लहरों के सहारे
जाना चाहता हूं समय की चट्टान के उस पार
जुड़ती है सीमा नए आकाश की जहाँ
स्वार्थ से अलग, प्रेम से जुदा
गढ़ सकूँ जहाँ अपने लिए नई दुनिया
के जीना चाहता हूं कुछ पल सुकून के
जंगली गुलाब की यादों से अलग ...
रविवार, 14 फ़रवरी 2016
सफ़र प्रेम का ...
प्रेम तो पनपता है पल पल ... समय की बुगनी को भरना होता है प्रेम से लम्हा दर लम्हा ... कहाँ होता है किसी एक दिन की औकात में उस प्रेम को समेट पाना ... क्या प्रेम का छलकना भी प्रेम है ... छोड़ो क्या सोचना ... अभी तो लम्हे हैं प्रेम है, समेटने दो ...
कुछ भी मांग लेने के लिए
जानना चाहा कायनात ने
कैसे बनेगा एक लम्हा पूरी ज़िन्दगी
मैंने सादे कागज़ पे लिखा तुम्हारा नाम
डाल दिया ऊपरवाले की नीली पेटी में
तब से घूमता है खुदा मेरे पीछे
सब कुछ दे देने के लिए
सोचता हूँ तुम हो, प्रेम है
और क्या है जो मांग सकूं उससे
कुछ भी मांग लेने के लिए
जानना चाहा कायनात ने
कैसे बनेगा एक लम्हा पूरी ज़िन्दगी
मैंने सादे कागज़ पे लिखा तुम्हारा नाम
डाल दिया ऊपरवाले की नीली पेटी में
तब से घूमता है खुदा मेरे पीछे
सब कुछ दे देने के लिए
सोचता हूँ तुम हो, प्रेम है
और क्या है जो मांग सकूं उससे
रविवार, 19 अप्रैल 2015
चीथड़े यादों के ...
सोचो ... यदि उम्र बांटते हुए यादें संजोने के शक्ति न देता ऊपर वाला तो क्या होता ... ठूंठ जैसा खुश्क इंसान ... सच तो ये है की यादें बहुत कुछ कर जाती हैं ... दिन बीत जाता है पलक झपकते और रात ... कितने एहसास जगा जाती है ... कई बार सोचता हूँ उम्र से लम्बी यादें न हों तो जिंदगी कैसे कटे ...
पता नही वो तुम होती हो या तुम्हारी याद
बेफिक्री से घुस आती हो कम्बल में
दौड़ती रहती हो फिर जिस्म की रग-रग में पूरी रात
जागते और सोएपन के एहसास के बीच
मुद्दतों का सफ़र आसानी से तय हो जाता है
अजीब सा आलस लिए आती है जब सुबह
अँधेरे का काला पैरहन ओढ़े तुम लुप्त हो जाती हो
बासी रात का बोझिल एहसास
रात होने के भ्रम से बहार नहीं आने देता
(हालांकि कह नहीं सकता ... ये भी हो सकता है की मैं उस
भ्रम से बाहर नहीं आना चाहता)
तमाम खिड़कियाँ खोलने पर भी पसरी रहती है सुस्ती
कभी बिस्तर, तो कभी कुर्सी पर
कभी कभी तो हवाई चप्पल पर
(कम्बख्त चिपक के रह जाती है फर्श से)
पता नहीं वो तुम होती हो या तुम्हारी याद
पर दिन के सुजाग लम्हों में
यादों के ये चीथड़े
जिस्म से उखाड़ फैकने का मन नहीं करता ...
पता नही वो तुम होती हो या तुम्हारी याद
बेफिक्री से घुस आती हो कम्बल में
दौड़ती रहती हो फिर जिस्म की रग-रग में पूरी रात
जागते और सोएपन के एहसास के बीच
मुद्दतों का सफ़र आसानी से तय हो जाता है
अजीब सा आलस लिए आती है जब सुबह
अँधेरे का काला पैरहन ओढ़े तुम लुप्त हो जाती हो
बासी रात का बोझिल एहसास
रात होने के भ्रम से बहार नहीं आने देता
(हालांकि कह नहीं सकता ... ये भी हो सकता है की मैं उस
भ्रम से बाहर नहीं आना चाहता)
तमाम खिड़कियाँ खोलने पर भी पसरी रहती है सुस्ती
कभी बिस्तर, तो कभी कुर्सी पर
कभी कभी तो हवाई चप्पल पर
(कम्बख्त चिपक के रह जाती है फर्श से)
पता नहीं वो तुम होती हो या तुम्हारी याद
पर दिन के सुजाग लम्हों में
यादों के ये चीथड़े
जिस्म से उखाड़ फैकने का मन नहीं करता ...
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