स्वप्न मेरे: दास्ताँ
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सोमवार, 27 अप्रैल 2020

दास्ताँ - हसीन सपनों की ...


इंद्र-धनुष के सात रँगों में रँग नहीं होते ... रँग सूरज की किरणों में भी नहीं होते और आकाश के नीलेपन में तो बिलकुल भी नहीं ... रँग होते हैं तो देखने वाले की आँखों में जो जागते हैं प्रेम के एहसास से ...  

दुनिया रंगीन दिखे
इसलिए तो नहीं भर लेते रँग आँखों में   

उदास रातों की कुछ उदास यादें
आँसू बन के न उतरें
तो खुद-ब-खुद रंगीन हो जाती है दुनिया

दुनिया तब भी रंगीन होती है
जब हसीन लम्हों के द्रख्त
जड़ बनाने लगते हैं दिल की कोरी ज़मीन पर
क्योंकि उसके साए में उगे रंगीन सपने
जगमगाते हैं उम्र भर

सच पूछो तो दुनिया तब भी रंगीन होती है     
जब तेरे एहसास के कुछ कतरे लिए  
फूल फूल डोलती हैं तितलियाँ
ओर उनके पीछे भागते कुछ मासूम बच्चे
रँग-बिरँगे कपड़ों में

पूजा की थाली लिए
गुलाबी साड़ी पे आसमानी शाल ओढ़े 
तुम भी तो करती हो चहल-कदमी रोज़ मेरे ज़ेहन में
दुनिया इसलिए भी तो रंगीन होती है

दुनिया इसलिए भी रंगीन होती है
कि टांकती हो तुम जुड़े में जंगली गुलाब

#जंगली_गुलाब

मंगलवार, 18 मार्च 2014

दास्ताँ ...

प्रेम राधा ने किया, कृष्ण ने भी ... मीरा ने भी, हीर और लैला ने भी ... पात्र बदलते रहे समय के साथ प्रेम नहीं ... वो तो रह गया अंतरिक्ष में ... इस ब्रह्मांड में किसी न किसी रूप में ... भाग्यवान होते हैं वो पात्र जिनका चयन करता है प्रेम, पुनः अवतरित होने के लिए ... तुम भी तो एक ऐसी ही रचना थीं सृष्टि की ...


वो सर्दियों की शाम थी
सफ़ेद बादलों के पीछे छुपा सूरज
बेताब था कुछ सुनने को

गहरी लंबी खामोशी के बाद
मेरा हाथ अपने हाथों में थामे तुमने कहा

आई लव यु

उसके बाद भी मुंदी पलकों के बीच
बहुत देर तक हिलते रहे तुम्हारे होंठ
पर खत्म हो गए थे सब संवाद उस पल के बाद
थम गयीं थी सरगोशियाँ कायनात की

मत पूछना मुझसे
उस धुंधली सी शाम कि दास्ताँ

कुछ मंज़र आसान नहीं होते उतारना
थोड़ी पड़ जाती हैं सोलह कलाएँ
गुम जाते हैं सारे शब्द कायनात के