स्वप्न मेरे: मुहब्बत
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शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2022

यादों के पिटारे से, इक लम्हा गिरा दूँ तो ...

मैं रंग मुहब्बत का, थोड़ा सा लगा दूँ तो.
ये मांग तेरी जाना, तारों से सज़ा दूँ तो.
 
तुम इश्क़ की गलियों से, निकलोगे भला कैसे,
मैं दिल में अगर सोए, अरमान जगा दूँ तो.
 
उलफ़त के परिंदे तो, मर जाएंगे ग़श खा कर,
मैं रात के आँचल से, चंदा को उड़ा दूँ तो.
 
मेरी तो इबादत है, पर तेरी मुहब्बत है,
ये राज भरी महफ़िल, में सब को बता दूँ तो.
 
लहरों का सुलग उठना, मुश्किल भी नहीं इतना,
ये ख़त जो अगर तेरे, सागर में बहा दूँ तो.
 
कुछ फूल मुहब्बत के, मुमकिन है के खिल जायें,  
यादों के पिटारे से, इक लम्हा गिरा दूँ तो.

(तरही ग़ज़ल)

सोमवार, 26 जुलाई 2021

इत-उत यूँ ही भटकती है मुहब्बत तेरी ...

अब लगी, तब ये लगी, लग ही गई लत तेरी I
कब हुई, कैसे हुई, हो गई आदत तेरी I
 
ख़त किताबों में जो गुम-नाम तेरे मिलते हैं,
इश्क़ बोलूँ के इसे कह दूँ शरारत तेरी I
 
तुम जो अक्सर ही सुड़कती हो मेरे प्याले से,
चाय की लत न कहूँ क्या कहूँ चाहत तेरी I
 
तुम कहीं मेरी खिंचाई तो नहीं करती हो,
एक अनसुलझी सी उलझन है ये उलफ़त तेरी I
 
शाल पहनी थी जो उस रोज़ न माँगी अब तक,
इब्तिदा प्रेम की कह दूँ के इनायत तेरी I
 
पहने रहती थीं पुलोवर जो मेरा तुम दिन भर,
उसके रेशों से महकती है नज़ाफ़त तेरी I
 
उड़ती फिरती है जो तितली वो अभी कह के गई,
इत-उत यूँ ही भटकती है मुहब्बत तेरी
I

बुधवार, 12 जून 2019

मुहब्बत की है बस इतनी कहानी ...

अपने शहर की खुशबू भी कम नहीं होती ... अभी लौटा हूँ अपने कर्म क्षेत्र ... एक गज़ल आपके नाम ...

झुकी पलकें दुपट्टा आसमानी
कहीं खिलती तो होगी रात रानी

वजह क्या है तेरी खुशबू की जाना 
कोई परफ्यूम या चिट्ठी पुरानी

मिटा सकते नहीं पन्नों से लेकिन  
दिलों से कुछ खरोंचे हैं मिटानी

लड़ाई, दोस्ती फिर प्रेम पल पल
हमारी रोज़ की है जिंदगानी

अभी से सो रही हो थक गईं क्या
अभी तो ढेर बातें हैं बतानी

यहाँ राधा है मीरा कृष्ण भी है
यहाँ की शाम है कितनी सुहानी

हंसी के बीच दांतों का नज़ारा
मुहब्बत की है बस इतनी कहानी

सोमवार, 26 मार्च 2018

जीत या हार ...


सपने पालने की कोई उम्र नहीं होती

वो अक्सर उतावली हो के बिखर जाना चाहती थी
ऊंचाई से गिरते झरने की बूँद सरीखी
ओर जब बाँध लिया आवारा मोहब्बत ने उसे ... 
उतर गई अंधेरे की सीडियां, आँखें बंद किए

ये सच है वो होता है बस एक पल 
बिखर जाने के बाद समेटने का मन नहीं होता जिसे

उम्र की सलेट पर जब सरकती है ज़िंदगी
कायनात खुद-ब-खुद बन जाती है चित्रकार
हालांकि ऐसा दौर कुछ समय के लिए आता है सबके जीवन में

(ओर वो भी तो इसी दौर से गुज़र रही थी
मासूम सा सपना पाले)

फिर आया तनहाई का लम्बा सफ़र

उजली बाहों के कई शहसवार वहां से गुज़रे
पर नहीं खुला सन्नाटों का पर्दा ...
उम्र काफी नहीं होती पहली मुहब्बत भुलाने को   
जुम्बिश खत्म हो जाती है आँखों की   
पर यादें ...
वो तो ताज़ा रहती हैं जंगली गुलाब की खुशबू लिए 

ये जीत है आवारा मुहब्बत की या हार उस सपने की
जिसको पालने की कोई उम्र नहीं होती

सोमवार, 5 मार्च 2018

क़र्ज़ मुहब्बत का ...


उम्र खर्च हो जाती है लम्हा लम्हा
तुम्हारी यादों का सिलसिला ख़त्म नहीं होता

कडाके की ठंड और बरसाती लम्हों के बीच
बूढ़ी होती दूकान से उठती अदरक वाली चाय की महक 
खाली कप पे ताज़ा लिपस्टिक के निशान
कुछ साए उठ के गए हैं यहाँ से अभी 
क़दमों के निशान कितने मिलते हैं तेरे मेरे क़दमों से

हवा के झोंके उड़ा ले जाते हैं पीले पत्ते
पी लेती है नुक्कड़ की तनहाई उनका दर्द  
जैसे तुम ढांक देती थीं मुहब्बत का आँचल  
वक़्त के साथ सिकुड़ते हुए उस कोने में मिलती हो रोज़ 
सूखे पत्तों से मुहब्बत का खेल खेलते

डूबते सूरज के साथ नहीं डूबती तुम्हारी रौशनी
चाँद के साथ हो लेती है
सूरज उठा लेता है तुम्हे चाँद के पहलू से सुबह
चलता रहता है कायनात का कारोबार
तेरी मुहब्बत की रौशनी भी खेलती है ऐसे खेल

नहीं थकते दीवार पे टंगे तुम्हारे कंधे
झेलते हैं रात भर सांसों का बोझ
कुछ यादें जैसे चुका रही हैं प्रेम की किश्तें
मुहब्बत का क़र्ज़ ख़त्म होने का नाम नहीं लेता  

मद्र स्वर में विलंबित गति का गीत है मुहब्बत
खामोश ताल पे अनवरत बजता हुआ  
किरदार हैं जो बदलते हैं समय के साथ