स्वप्न मेरे: दिगम्बर_की _ग़ज़लें
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शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2022

यादों के पिटारे से, इक लम्हा गिरा दूँ तो ...

मैं रंग मुहब्बत का, थोड़ा सा लगा दूँ तो.
ये मांग तेरी जाना, तारों से सज़ा दूँ तो.
 
तुम इश्क़ की गलियों से, निकलोगे भला कैसे,
मैं दिल में अगर सोए, अरमान जगा दूँ तो.
 
उलफ़त के परिंदे तो, मर जाएंगे ग़श खा कर,
मैं रात के आँचल से, चंदा को उड़ा दूँ तो.
 
मेरी तो इबादत है, पर तेरी मुहब्बत है,
ये राज भरी महफ़िल, में सब को बता दूँ तो.
 
लहरों का सुलग उठना, मुश्किल भी नहीं इतना,
ये ख़त जो अगर तेरे, सागर में बहा दूँ तो.
 
कुछ फूल मुहब्बत के, मुमकिन है के खिल जायें,  
यादों के पिटारे से, इक लम्हा गिरा दूँ तो.

(तरही ग़ज़ल)

सोमवार, 31 जनवरी 2022

नहीं तो अजल से यही है फ़साना ...

इसी चापलूसी की सीढ़ी से आना.
बुलंदी की छत पे जो तुमको है जाना.
 
कई बार इन्सानियत गर जगे तो, 
कड़ा कर के दिल से उसे फिर हटाना.
 
भले सच ये तन कर खड़ा सामने हो,
न सोचो दुबारा उसे बस मिटाना.
 
न वादा न यारी न रिश्तों की परवाह,
सिरे से जो एहसान हैं भूल जाना.
 
उठाया है तो क्या गिराना उसे ही,
यही रीत दुनिया की है तुम निभाना.
 
नहीं हैं ये अच्छे नियम ज़िन्दगी के,
करें क्या, है ज़ालिम मगर ये ज़माना.
 
सभी मिल के बदलें तो शायद ये बदलें,
नहीं तो अजल से यही है फ़साना.

शुक्रवार, 24 दिसंबर 2021

दो-चार बात कर के जो तेरा नहीं हुआ ...

यूँ तो तमाम रात अँधेरा नहीं हुआ.
फिर क्या हुआ के आज सवेरा नहीं हुआ.
 
धड़कन किसी का नाम सजा देगी खुद-ब-खुद,
दिल पर किसी का नाम उकेरा नहीं हुआ.
 
हर हद करी है पार फ़कत जिसके नाम पर,
बस वो निगाहें यार ही मेरा नहीं हुआ.
 
मिल कर सभी से देख लिया ज़िन्दगी में अब,
है कौन जिसको इश्क़ ने घेरा नहीं हुआ.
 
लाली किसी के इश्क़ की उतरी है गाल पर,
चेहरे पे बस गुलाल बिखेरा नहीं हुआ.
 
उनको न ढब, समझ, न सलीका, न कुछ शऊर,
दो-चार बात कर के जो तेरा नहीं हुआ.