नहीं तो अजल से यही है फ़साना ...
इसी चापलूसी की सीढ़ी से आना.
बुलंदी की छत पे
जो तुमको है जाना.
कई बार इन्सानियत
गर जगे तो,
कड़ा कर के दिल से
उसे फिर हटाना.
भले सच ये तन कर
खड़ा सामने हो,
न सोचो दुबारा
उसे बस मिटाना.
न वादा न यारी न
रिश्तों की परवाह,
सिरे से जो एहसान
हैं भूल जाना.
उठाया है तो क्या
गिराना उसे ही,
यही रीत दुनिया
की है तुम निभाना.
नहीं हैं ये
अच्छे नियम ज़िन्दगी के,
करें क्या, है
ज़ालिम मगर ये ज़माना.
सभी मिल के बदलें तो शायद ये बदलें,
नहीं तो अजल से यही है फ़साना.
बहुत खूब
जवाब देंहटाएंread me also pls
हटाएंआपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" मंगलवार 01 फरवरी 2022 को साझा की गयी है....
जवाब देंहटाएंपाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
read me also pls
हटाएंवाह! वैसे इस तरह की कामयाबी ज़्यादा दिन टिकती नहीं है, ख़ैर, आजकल ज़माना ही शार्ट कट का है, सीड़ी की जगह शायद सीढ़ी होना चाहिए
जवाब देंहटाएंगज़ल जब व्यंग्य करने पर उतरती है तो अन्य विधाओं की अपेक्षा ज्यादा तीखी चुभती है। जमाने के चलन का कड़वा सच प्रस्तुत हुआ है।
जवाब देंहटाएंread me also pls
हटाएंबहुत खूब !! दुनियादारी के मिजाज पर धारदार व्यंग्य । लाजवाब ग़ज़ल ।
जवाब देंहटाएंनहीं हैं ये अच्छे नियम ज़िन्दगी के,
जवाब देंहटाएंकरें क्या, है ज़ालिम मगर ये ज़माना.
सभी मिल के बदलें तो शायद ये बदलें,
नहीं तो अजल से यही है फ़साना.
बिलकुल सही कहा आपने.. सुंदर धारदार, शानदार गजल ।
जवाब देंहटाएंसच सबकुछ जानकर भी दुनिया के दस्तूर के दुवाई देकर किनारा कर आगे बढ़ना कभी भी किसी को बड़ा नहीं बना सकते।
बहुत सुन्दर
वाह!लाज़वाब सर 👌
जवाब देंहटाएंइसी चापलूसी की सीढ़ी से आना.
बुलंदी की छत पे जो तुमको है जाना... क्या खूब कहा आपने।
सादर
बहुत सुंदर रचना
जवाब देंहटाएंलाजवाब
जवाब देंहटाएंबेहद खूबसूरत गज़ल
जवाब देंहटाएंसादर नमस्कार ,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (1-2-22) को "फूल बने उपहार" (चर्चा अंक 4328)पर भी होगी।आप भी सादर आमंत्रित है..आप की उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी .
--
कामिनी सिन्हा
भले सच ये तन कर खड़ा सामने हो,
जवाब देंहटाएंन सोचो दुबारा उसे बस मिटाना.
–बहुत सुन्दर ग़ज़ल
मुमकिन अगर तो कोशिश कर लो
जवाब देंहटाएंलगता नहीं बदलेगा चलन ये ज़माना।
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बेहतरीन गज़ल सर।
सादर।
इतनी आसानी से बदलने वाला नहीं है फलक लेकिन कोशिश करने में क्या हर्ज है नहीं कुछ तो तसल्ली तो मिलेगी कि मैंने पूरी कोशिश तो की थी!
जवाब देंहटाएंबेहतरीन गजल
कैसी विड़बना हो गई है !
जवाब देंहटाएंलियाकत नहीं चापलूसी सफलता की सीढ़ी बन गई है
बहुत सही लिखा है
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर ग़ज़ल।
जवाब देंहटाएंन वादा न यारी न रिश्तों की परवाह,
जवाब देंहटाएंसिरे से जो एहसान हैं भूल जाना.
बहुत दिनों बाद आपकी कविता पढ़ने को मिली, बहुत सुन्दर प्रस्तुति! आदरणीय दिगम्बर जी
भारतीय साहित्य एवं संस्कृति
बहुत सुन्दर ।
जवाब देंहटाएंकई बार इन्सानियत गर जगे तो,
जवाब देंहटाएंकड़ा कर के दिल से उसे फिर हटाना.
वाह!!!
ये बहुत ही जरूरी है इंसानियत जग गयी तो मुश्किल हो जायेगी
न वादा न यारी न रिश्तों की परवाह,
सिरे से जो एहसान हैं भूल जाना.
बहुत ही धारदार लाजवाब...
कमाल की गजल...एक से बढ़कर एक शेर👌👌👌👌
लाजवाब... बस लाजवाब🙏🙏🙏🙏
क्या है यह? इंसानियत का आईना या फिर हमारा होना? सोचने को विवश कर रही है ग़ज़ल।
जवाब देंहटाएंWaah! Samsamayik...Umda ghazal.
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत सुन्दर गजल
जवाब देंहटाएंआपकी ग़ज़लों में ये तेवर कम ही देखने को मिलते हैं ।
जवाब देंहटाएंसबको ही शायद आईना दिखाती ग़ज़ल ।।
बड़ी उम्दा ग़ज़ल
जवाब देंहटाएंसामायिक मूल्यों के उजड़ते परिवेश पर शानदार प्रहार करती सुंदर ग़ज़ल तंज़ और व्यंग्य के साथ ।
जवाब देंहटाएंउम्दा सृजन।
good awesome poem
जवाब देंहटाएंबदलना तो अब किसे है।
जवाब देंहटाएंबहुत ही शानदार ग़ज़ल है।
समय साक्षी रहना तुम by रेणु बाला
Jude hmare sath apni kavita ko online profile bnake logo ke beech share kre
जवाब देंहटाएंPub Dials aur agr aap book publish krana chahte hai aaj hi hmare publishing consultant se baat krein Online Book Publishers
उम्दा ग़ज़ल....बहुत दिन बाद आपके ब्लॉग पर आया ..बहुत अच्छा लगा
जवाब देंहटाएं31ECFE40
जवाब देंहटाएंereğli esçort
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