स्वप्न मेरे: कायनात
कायनात लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कायनात लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 7 फ़रवरी 2024

कायनात का सृजन ...

बरसों पहले अपने ही सृजन को पूर्ण करने
बुना होगा कायनात ने एक लम्हा
क़तरा-क़तरा जोड़ी होगी हर साँस
रहती है जिसमें ज़िंदगी की आहट, सपनों की उड़ान
जोड़ी होगी लम्हा दर लम्हा हर ख़ुशी
जो कर सके कायनात के सृजन को पूर्ण

याद आया ...
आज ही तो उस लम्हे ने आँख खोली थी
और ये बसंत ... ये भी तो उसी दिन आया था
कायनात के उस अपूर्ण सृजन में ...

हालाँकि ये राज़ जो मेरे और कायनात के दरमियाँ है
पर आज सब को बताने का मन करता है

मैं हूँ वो अपूर्ण सृजन और तुम हो वो सजीव लम्हा
जिसकी इब्तदा आज हुयी मेरे और सिर्फ़ मेरे लिए

जनम-दिन की हार्दिक शुभकामनाएँ मेरे जंगली गुलाब
मेरे और सिर्फ़ मेरे सजीव लम्हे को ...
#जंगली_गुलाब

सोमवार, 25 मई 2020

क्या सच में ...


अध्-खुली नींद में रोज़ बुदबुदाता हूँ
एक तुम हो जो सुनती नहीं

हालांकि ये चाँद, सूरज ... ये भी नहीं सुनते

और हवा ...  
इसने तो जैसे “इगनोरे” करने की ठान ली है    

ठीक तुम्हारी तरह

धुंधले होते तारों के साथ
उठ जाती हो रोज मेरे पहलू से 
कितनी बार तो कहा है  
जमाने भर को रोशनी देना तुम्हारा काम नहीं

खिलता है कायनात में जगली गुलाब कहीं
उगता है रोज़ सूरज के नाम से
आकाश की बादल भरी ज़मीन पर

अरे सुनो ... कहीं तुम ही तो ...
इसलिए तो नहीं उठ जाती रोज़ मेरे पहलू से मेरे ... ?

#जंगली_गुलाब

सोमवार, 18 मई 2020

किसका खेल


कितना कुछ होता रहता है

और सच तो ये भी है
कितना कुछ नहीं भी होता ...

फिर भी ...

बहुत कुछ जब नहीं हो रहा होता  
कायनात में कुछ न कुछ ज़रूर होता रहता है

जैसे ... 

मैंने डाले नहीं, तुमने सींचे नहीं
प्रेम के बीज हैं अपने आप ही उगते रहते हैं  

उठती हैं, मिटती हैं, फिर उठती हैं
लहरों की चाहत है पाना

प्रेम खेल रहा है मिटने मिटाने का खेल सदियों से

जालसाजी कायनात की ...
कसूर तेरी आँखों का ...
या खेल .... जंगली गुलाब का ...


#जंगली_गुलाब

सोमवार, 4 फ़रवरी 2019

हया किसी के निगाहों का कह रही सच है ...


यही ज़मीन, यही आसमां, यही सच है 
यहीं है स्वर्ग, यहीं नर्क, ज़िन्दगी सच है

हसीन शाम के बादल का सुरमई मंज़र 
हथेलियों पे सजी रात की कली सच है

उदास रात की स्याही से मत लिखो नगमें  
प्रभात की जो मधुर रागिनी वही सच है  

ये तू है, मैं हूँ, नदी, पत्तियों का यूँ हिलना
ये कायनात, परिंदे, हवा सभी सच है

अभी जो पास है वो एक पल ही है जीवन
किसी के इश्क में डूबी हुई ख़ुशी सच है

कभी है गम तो ख़ुशी, धूप, छाँव, के किस्से
झुकी झुकी सी नज़र सादगी हंसी सच है

नज़र नज़र से मिली एक हो गयीं नज़रें
हया किसी के निगाहों का कह रही सच है

सोमवार, 26 फ़रवरी 2018

साक्षात्कार ब्रह्म से ...

ढूंढता हूँ बर्फ से ढंकी पहाड़ियों पर
उँगलियों से बनाए प्रेम के निशान
मुहब्बत का इज़हार करते तीन लफ्ज़
जिसके साक्षी थे मैं और तुम
और चुप से खड़े देवदार के कुछ ऊंचे ऊंचे वृक्ष    

हाँ ... तलाश है बोले हुए कुछ शब्दों की 
जिनको पकड़ने की कोशिश में
भागता हूँ सरगोशियों के इर्द-गिर्द
दौड़ता हूँ पहाड़ पहाड़, वादी वादी

सुना है लौट कर आती हैं आवाजें
ब्रह्म रहता है सदा के लिए कायनात में 
श्रृष्टि में बोला शब्द शब्द

हालांकि मुश्किल नहीं उस लम्हे में लौटना   
पर चाहत का कोई अंत नहीं 

उम्र की ढलान पे 
अतीत के पन्नों में लौटने से बेहतर है 
साक्षात ब्रह्म से साक्षात्कार करना  

मंगलवार, 23 दिसंबर 2014

किसी गरीब की किस्मत से निवालों जैसे ...

लटक रहा हूँ में उलझे से सवालों जैसे
तू खिडकियों से कभी झाँक उजालों जैसे

है कायनात का जादू के असर यादों का
सुबह से शाम भटकता हूँ ख्यालों जैसे

समय जवाब है हर बात को सुलझा देगा
चिपक के बैठ न दिवार से जालों जैसे

किसी भी शख्स को पहचान नहीं हीरे की
मैं छप रहा हूँ लगातार रिसालों जैसे

में चाहता हूँ की खेलूँ कभी बन कर तितली
किसी हसीन के रुखसार पे बालों जैसे

बजा के चुटकी में बाजी को पलट सकता हूँ
मुझे न खेल तू शतरंज की चालों जैसे

करीब आ के मेरे हाथ से छूटी मंजिल
किसी गरीब की किस्मत से निवालों जैसे