बुना होगा कायनात ने एक लम्हा
क़तरा-क़तरा जोड़ी होगी हर साँस
रहती है जिसमें ज़िंदगी की आहट, सपनों की उड़ान
जोड़ी होगी लम्हा दर लम्हा हर ख़ुशी
जो कर सके कायनात के सृजन को पूर्ण
याद आया ...
आज ही तो उस लम्हे ने आँख खोली थी
और ये बसंत ... ये भी तो उसी दिन आया था
कायनात के उस अपूर्ण सृजन में ...
हालाँकि ये राज़ जो मेरे और कायनात के दरमियाँ है
पर आज सब को बताने का मन करता है
मैं हूँ वो अपूर्ण सृजन और तुम हो वो सजीव लम्हा
जिसकी इब्तदा आज हुयी मेरे और सिर्फ़ मेरे लिए
जनम-दिन की हार्दिक शुभकामनाएँ मेरे जंगली गुलाब
मेरे और सिर्फ़ मेरे सजीव लम्हे को ...
#जंगली_गुलाब