स्वप्न मेरे

बुधवार, 23 फ़रवरी 2022

आदत ...

कितनी अच्छी है
भूल जाने की ये आदत
जब भी देखता हूं तुम्हें  
हर बार
नई सी नज़र आती हो
 
पर सुनो ...
तुम मत डालना ये आदत
 

बुधवार, 16 फ़रवरी 2022

जंगली गुलाब ...

लम्बे समय से गज़ल लिखते लिखते लग रहा है जैसे मेरा जंगली-गुलाब कहीं खो रहा है ... तो आज एक नई रचना के साथ ... अपने जंगली गुलाब के साथ ...
 
प्रेम क्या डाली पे झूलता फूल है ... 
मुरझा जाता है टूट जाने के कुछ लम्हों में
माना रहती हैं यादें, कई कई दिन ताज़ा
 
फिर सोचता हूँ प्रेम नागफनी क्यों नहीं 
रहता है ताज़ा कई कई दिन, तोड़ने के बाद 
दर्द भी देता है हर छुवन पर, हर बार  
 
कभी लगता है प्रेम करने वाले हो जाते हैं सुन्न  
दर्द से परे, हर सीमा से विलग 
बुनते हैं अपन प्रेम-आकाश, हर छुवन से इतर
 
देर तक सोचता हूँ, फिर पूछता हूँ खुद से
क्या मेरा भी प्रेम-आकाश है ... ? 
कब, कहाँ, कैसे, किसने बुना ...
पर उगे तो हैं, फूल भी नागफनी भी
क्यों ...
 
कसम है तुम्हें उसी प्रेम की
अगर हुआ है कभी मुझसे, तो सच-सच बताना  
प्रेम तो शायद नहीं ही कहेंगे उसे ...
 
तुम चाहो तो जंगली-गुलाब का नाम दे देना ... 

शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2022

यादों के पिटारे से, इक लम्हा गिरा दूँ तो ...

मैं रंग मुहब्बत का, थोड़ा सा लगा दूँ तो.
ये मांग तेरी जाना, तारों से सज़ा दूँ तो.
 
तुम इश्क़ की गलियों से, निकलोगे भला कैसे,
मैं दिल में अगर सोए, अरमान जगा दूँ तो.
 
उलफ़त के परिंदे तो, मर जाएंगे ग़श खा कर,
मैं रात के आँचल से, चंदा को उड़ा दूँ तो.
 
मेरी तो इबादत है, पर तेरी मुहब्बत है,
ये राज भरी महफ़िल, में सब को बता दूँ तो.
 
लहरों का सुलग उठना, मुश्किल भी नहीं इतना,
ये ख़त जो अगर तेरे, सागर में बहा दूँ तो.
 
कुछ फूल मुहब्बत के, मुमकिन है के खिल जायें,  
यादों के पिटारे से, इक लम्हा गिरा दूँ तो.

(तरही ग़ज़ल)

सोमवार, 31 जनवरी 2022

नहीं तो अजल से यही है फ़साना ...

इसी चापलूसी की सीढ़ी से आना.
बुलंदी की छत पे जो तुमको है जाना.
 
कई बार इन्सानियत गर जगे तो, 
कड़ा कर के दिल से उसे फिर हटाना.
 
भले सच ये तन कर खड़ा सामने हो,
न सोचो दुबारा उसे बस मिटाना.
 
न वादा न यारी न रिश्तों की परवाह,
सिरे से जो एहसान हैं भूल जाना.
 
उठाया है तो क्या गिराना उसे ही,
यही रीत दुनिया की है तुम निभाना.
 
नहीं हैं ये अच्छे नियम ज़िन्दगी के,
करें क्या, है ज़ालिम मगर ये ज़माना.
 
सभी मिल के बदलें तो शायद ये बदलें,
नहीं तो अजल से यही है फ़साना.

शनिवार, 15 जनवरी 2022

परवाज़ परिंदों की अभी बद-हवास है ...

दो बूँद गिरा दे जो अभी उसके पास है,.
बादल से कहो आज मेरी छत उदास है.
 
तबका न कोई चैनो-अमन से है रह रहा,
सुनते हैं मगर देश में अपने विकास है.
 
ज़ख्मी है बदन साँस भी मद्धम सी चल रही,
टूटेगा मेरा होंसला उनको क़यास है.
 
था छेद मगर फिर भी किनारे पे आ लगी,
सागर से मेरी कश्ती का रिश्ता जो ख़ास है.
 
दीवार खड़ी कर दो चिरागों को घेर कर,
कुछ शोर हवाओं का मेरे आस पास है.
 
छिड़का है फिजाओं में लहू जिस्म काट कर,
तब जा के सवेरे का सिन्दूरी लिबास है.
 
कह दो की उड़ानों पे न कब्ज़ा किसी का हो, 
परवाज़ परिंदों की अभी बद-हवास है.