स्वप्न मेरे

मंगलवार, 13 जनवरी 2015

यादें ...

कभी ख़त्म नहीं होता सिलसिला ... समझ से परे है कि जी रहा हूँ यादों में या यादें हैं तो जी रहा हूँ ... कोई एहसास, कोई नशा ... कुछ तो है जो रहता है मुसलसल तेरी यादों के साथ ... जब कभी जिंदगी की पगडण्डी पे यादों के कुछ लम्हे अंकुरित होने लगते हैं, उसी पल महकने लगती है वही पुरानी खुशबू मेरे जेहन में ...

टूटते तारों को देखना
जैसे प्रेमिका की मांग में पड़े सिन्दूर का याद आना

जंगली गुलाब की खुशबू लिए
आँखों से बहते खून के कतरे
बेवजह तो नहीं

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खामोशी तोड़ने की जिद्द
कानों का अपने आप बजना

मैं जानता हूँ वो हंसी की खनक नहीं
वो तेरी सिसकी भी नहीं
एक सरगोशी है तेरे एहसास की
गुज़र जाती है जो जंगली गुलाब की खुशबू लिए

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सन्नाटा इतना की सांस लेना भी गुनाह
ऐसे में बेसाख्ता पत्तों की सरसराहट
यकीनन बहुत करीब से गुज़रा है कोई लम्हा
जंगली गुलाब की खुशबू लिए

सोमवार, 5 जनवरी 2015

कभी भी ... कुछ भी ...

गौर से देखा मैंने चाँद , फिर तारे, फिर तुम्हें और फिर अपने आप को ... कुछ भी बदला हुआ नहीं लगा ... हवा, बादल, रेत, समुंदर, सडकें ... सब थे पर बदला हुआ कुछ भी नहीं था ... पर फिर भी था ... कुछ तो था पिछले दिनों ... हालांकि नया सा तो कुछ भी नहीं हुआ था पर सब लोग कह रहे थे नया साल आ गया ... क्या सचमुच ... और क्यों ...

वजह तो कुछ भी नहीं
पर अच्छा लगता था बातों के बीच अचानक तेरा रुक जाना
धीरे से मुस्कुराना
एक टक देखना फिर जोर से खिलखिलाना
मैं जानता था
वजह तो उसकी भी नहीं थी

पता होते हुए भी
कि तपते रेगिस्तान में नहीं आते मुसाफिर
खिलते हैं कैक्टस पे फूल पीले हो चुके काँटों के साथ
वजह तो उसकी भी नहीं होती

वजह तो सागर की छाती पे बरसती बरसात की भी नहीं होती
और ठक ठक गिरते ओलों की तो बिलकुल भी नहीं

तुम नहीं आओगी जैसे गुज़रा वक्त नहीं आता
टूटे ख्वाब आँखों में नहीं आते
फिर भी इंतज़ार है की बस रहता ही है
वजह तो कुछ भी नहीं

आस्था को तर्क पे तोलना
जंगली गुलाब में तेरा अक्स ढूंढना
वजह तो कुछ भी नहीं

वजह तो कुछ भी नहीं
नया साल भी हर साल आता है
बेइंतिहा तुम भी याद आती हो 

मंगलवार, 23 दिसंबर 2014

किसी गरीब की किस्मत से निवालों जैसे ...

लटक रहा हूँ में उलझे से सवालों जैसे
तू खिडकियों से कभी झाँक उजालों जैसे

है कायनात का जादू के असर यादों का
सुबह से शाम भटकता हूँ ख्यालों जैसे

समय जवाब है हर बात को सुलझा देगा
चिपक के बैठ न दिवार से जालों जैसे

किसी भी शख्स को पहचान नहीं हीरे की
मैं छप रहा हूँ लगातार रिसालों जैसे

में चाहता हूँ की खेलूँ कभी बन कर तितली
किसी हसीन के रुखसार पे बालों जैसे

बजा के चुटकी में बाजी को पलट सकता हूँ
मुझे न खेल तू शतरंज की चालों जैसे

करीब आ के मेरे हाथ से छूटी मंजिल
किसी गरीब की किस्मत से निवालों जैसे 

मंगलवार, 16 दिसंबर 2014

पल दो पल ज़िंदगानी अभी है प्रिये ...

खिलखिलाती हुई तू मिली है प्रिये
उम्र भर रुत सुहानी रही है प्रिये

आसमानी दुपट्टा झुकी सी नज़र
इस मिलन की कहानी यही है प्रिये

कौन से गुल खिले, रात भर क्या हुआ
सिलवटों ने कहानी कही है प्रिये

तोलिये से है बालों को झटका जहाँ
ये हवा उस तरफ से बही है प्रिये

ये दबी सी हंसी चूड़ियों की खनक
घर के कण कण में तेरी छवी है प्रिये

जब भी आँगन में चूल्हा जलाती है तू
मुझको देवी सी हरदम लगी है प्रिये

बाज़ुओं में मेरी थक के सोई है तू
पल दो पल ज़िंदगानी अभी है प्रिये

(पंकज सुबीर जी के ब्लॉग पर तरही मुशायरे में लिखी एक ग़ज़ल)


सोमवार, 8 दिसंबर 2014

नेह सागर सा छलकना चाहिए ...

प्रेम आँखों से झलकना चाहिए
देह चन्दन सा महकना चाहिए

बाग वन आकाश नदिया सब तेरा
मन विहग चंचल चहकना चाहिए

गंध तेरे देह की यह कह रही
मुक्त हो यौवन दहकना चाहिए

पंछियों की कलरवें उल्लास हो
नेह सागर सा छलकना चाहिए

दृष्टि का अनुबंध वो जादू करे
बिन पिए ही मय बहकना चाहिए