अधूरी ख्वाहिशें रहती हैं दरवाज़ों में अपनी
तभी तो ज़िन्दगी जीते हैं सब टुकड़ों में अपनी
तू यूँ ही बोलना मैं भी फ़कत सुनता रहूँगा
सुनो शक्कर ज़रा कम डालना बातों में अपनी
अभी तो रात ने दिन का शटर खोला नहीं है
चलो इक नींद तो लेने दो तुम बाहों में अपनी
कभी गुस्सा, झिझकना, रूठना, फिर मान जाना
हमेशा बोलती रहती हो तस्वीरों में अपनी
कहीं कमज़ोर ना कर दें बुलंदी के इरादे
समुन्दर रोक के रखना ज़रा पलकों में अपनी
ज़रुरत जब हुई महसूस हमको ज़िन्दगी में
दुआएं दोस्तों की आ गई खातों में अपनी
कई अलफ़ाज़ जब मुंह मोड़ लेते हैं बहर से
तुम्हारा नाम लिख देता हूँ बस ग़ज़लों में अपनी
सुनो इस पेड़ को मत काटना जीते जी अपने
परिंदे छुप के रहते हैं यहाँ शाखों में अपनी
झुकी पलकें दुपट्टा आसमानी चाल अल्हड़
उसी लम्हे की बस तस्वीर है आँखों में अपनी