स्वप्न मेरे

मंगलवार, 7 सितंबर 2021

ज़रूर नाम किसी शख्स ने लिया होता

किसी हसीन के जूड़े में सज रहा होता.
खिला गुलाब कहीं पास जो पड़ा होता.
 
किसी की याद में फिर झूमता उठा होता,
किसी के प्रेम का प्याला जो गर पिया होता.
 
यकीन मानिए वो सामने खड़ा होता,
वो इक गुनाह जो हमने कहीं किया होता.
 
हर एक हाल में तन के खड़ा हुआ होता,
खुद अपने आप से मिलता कभी लड़ा होता.
 
किसी के काम कभी मैं भी आ गया होता,
दुआ के साथ मेरे हाथ जो शफ़ा होता,
 
किसी मुकाम पे मिलता कहीं रुका होता,
मेरी तलाश में घर से अगर चला होता.
 
लगाता हुस्न जो मरहम किसी के ज़ख्मों पर,
ज़रूर नाम किसी शख्स ने लिया होता.

सोमवार, 30 अगस्त 2021

चेहरों से होती रहती है चेहरों की गुफ़्तगू …

साहिल की भीगी रेत से लहरों की गुफ़्तगू.
सुन कर भी कौन सुनता है बहरों की गुफ़्तगू.

कुछ सब्ज पेड़ सुन के उदासी में खो गए,
खेतों के बीच सूखती नहरों की गुफ़्तगू.

अब आफ़ताब का भी निकलना मुहाल है,
इन बादलों से हो गई कुहरों की गुफ़्तगू.

ख़ामोशियों के पास जमा रहती हैं सभी,
फ़ुर्कत के चंद लम्हों से पहरों की गुफ़्तगू.

जंगल ने कान में है कहा गाँव के यही,
कितनी जुदा है आज भी शहरों की गुफ़्तगू.

गुमसुम सी महफ़िलों की हक़ीक़त सुनो कभी,
चेहरों से होती रहती है चेहरों की गुफ़्तगू.

मंगलवार, 24 अगस्त 2021

नज़र के इशारे नकाबों ने खोले ...

न महफ़िल न किस्से न बातों ने खोले.
सभी राज़ उनकी निगाहों ने खोले.
 
शहर तीरगी के मशालों ने खोले,
कई राज़ मिल के सितारों ने खोले.
 
मुहर एक दिन सब लगा देंगें इस पर,
तरक्की के रस्ते किताबों ने खोले.
 
रहस्यों का खुलना, मेरा मानना है,
लगातार होते सवालों ने खोले.
 
अदा है के मासूमियत, क्या करें हम,
कई सच तो उनके बहानों ने खोले,
 
न जुगनू की कोशिश में कोई कमी पर,
अंधेरों के चिलमन उजालों ने खोले.
 
अदा थी, हया थी, के इश्क़े – बयाँ था,
नज़र के इशारे नकाबों ने खोले
.

शनिवार, 7 अगस्त 2021

और बच्चा बन के मैं बाहों में इतराता रहा ...

सात घोड़ों में जुता सूरज सुबह आता रहा.
धूप का भर भर कसोरा सर पे बरसाता रहा.

काग़ज़ी फूलों पे तितली उड़ रही इस दौर में,
और भँवरा भी कमल से दूर मंडराता रहा.

हम सफ़र अपने बदल कर वो तो बस चलते रहे,
और मैं उनकी डगर में फूल बिखराता रहा.

एक दिन काँटा चुभा पगडंडियों में हुस्न की,
ज़िन्दगी भर रहगुज़र में इश्क़ तड़पाता रहा.

ख़ास है कुछ आम सा तेरा तबस्सुम दिलरुबा,
उम्र भर जो ज़िन्दगी में रौशनी लाता रहा.

इश्क़ में मसरूफ़ थे कंकड़ उछाला ही नहीं,
झील के तल में उतर कर चाँद सुस्ताता रहा.

एक दिन यादों की बुग्नी से निकल कर माँ मिली,
और बच्चा बन के मैं बाहों में इतराता रहा.

सोमवार, 26 जुलाई 2021

इत-उत यूँ ही भटकती है मुहब्बत तेरी ...

अब लगी, तब ये लगी, लग ही गई लत तेरी I
कब हुई, कैसे हुई, हो गई आदत तेरी I
 
ख़त किताबों में जो गुम-नाम तेरे मिलते हैं,
इश्क़ बोलूँ के इसे कह दूँ शरारत तेरी I
 
तुम जो अक्सर ही सुड़कती हो मेरे प्याले से,
चाय की लत न कहूँ क्या कहूँ चाहत तेरी I
 
तुम कहीं मेरी खिंचाई तो नहीं करती हो,
एक अनसुलझी सी उलझन है ये उलफ़त तेरी I
 
शाल पहनी थी जो उस रोज़ न माँगी अब तक,
इब्तिदा प्रेम की कह दूँ के इनायत तेरी I
 
पहने रहती थीं पुलोवर जो मेरा तुम दिन भर,
उसके रेशों से महकती है नज़ाफ़त तेरी I
 
उड़ती फिरती है जो तितली वो अभी कह के गई,
इत-उत यूँ ही भटकती है मुहब्बत तेरी
I