स्वप्न मेरे

बुधवार, 14 जुलाई 2021

चाँद उतरा, बर्फ पिघली, ये जहाँ महका दिया ...

बादलों के पार तारों में कहीं छुड़वा दिया I 
चन्द टूटी ख्वाहिशों का दर्द यूँ बिखरा दिया I
 
एक बुन्दा क्या मिला यादों की खिड़की खुल गई, 
वक़्त ने बरसों पुराने इश्क़ को सुलगा दिया I
 
करवटों के बीच सपनों की ज़रा दस्तक हुई, 
रात ने झिर्री से तीखी धूप को सरका दिया I
 
आसमानी चादरें माथे पे उतरी थीं अभी,
एक तितली ने पकड़ कर चाँद को बैठा दिया I
 
प्रेम का सच आँख से झरता रहा आठों पहर,
और होठों के सहारे झूठ था, बुलवा दिया I  
 
पेड़ ने पत्ते गिराए पर हवा के ज़ोर पे,
और सारा ठीकरा पतझड़ के सर रखवा दिया I
 
एक चरवाहे की मीठी धुन पहाड़ी से उठी,
चाँद उतरा, बर्फ पिघली, ये जहाँ महका दिया I
 

गुरुवार, 1 जुलाई 2021

दिल से अपने पूछ के देखो ज़रा ...

बात उन तक तो ये पहुँचा दो ज़रा.
शर्ट का टूटा बटन टांको ज़रा.
 
छा रही है कुछ उदासी देर से,
बज उठो मिस कॉल जैसे तो ज़रा.
 
बात गर करनी नहीं तो मत करो,
चूड़ियों को बोल दो, बोलो ज़रा.
 
खिल उठेगा यूँ ही जंगली फूल भी,
पंखुरी पे नाम तो छापो ज़रा.  
 
तुमको लग जाएगी अपनी ही नज़र,
आईने में भी कभी झाँको ज़रा.
 
तितलियाँ जाती हुई लौट आई हैं,
तुम भी सीटी पे ज़रा, पलटो ज़रा.
 
उफ़, लिपस्टिक का ये कैसा दाग है, 
इस मुए कौलर को तो पौंछो ज़रा.
 
खेल कर, गुस्सा करो, क्या ठीक है, 
हार से पहले कहो, हारो ज़रा.
 
बोलती हो, सच में क्या छोड़ोगी तुम,
दिल से अपने पूछ के देखो ज़रा.

बुधवार, 23 जून 2021

पंख लगा कर पंछी जैसे चल अम्बर चलते हैं ...

सर्द हवा में गर्म चाय का थर्मस भर चलते हैं.
पंख लगा कर पंछी जैसे चल अम्बर चलते हैं.
 
खिड़की खुली देख कर उस दिन शाम लपक कर आई,
हाथ पकड़ कर बोली बेटा चल छत पर चलते हैं.
 
पर्स हाथ में ले कर जब वो पैदल घर से निकली,
इश्क़ ने फिर चिल्ला के बोला चल दफ्तर चलते हैं.
 
सब के साथ तेरी आँखों में दिख जाती है हलचल,
जब जब बूट बजाते हम जैसे अफसर चलते हैं.
 
गश खा कर कुछ लोग गिरे थे, लोगों ने बोला था,
पास मेरे जब आई बोली चल पिक्चर चलते हैं.
 
जब जब उम्र ठहरने लगती दफ्तर की टेबल पे,
धूल फांकती फ़ाइल बोली चल अब घर चलते हैं.
 
याद किसी की नींद कहाँ आने देगी आँखों में,
नींद की गोली खा ले चल उठ अब बस कर चलते हैं. 

शुक्रवार, 11 जून 2021

कश्तियाँ डूबीं अनेकों फिर भी घबराया नहीं ...

देख कर तुमको जहाँ में और कुछ भाया नहीं.
कैसे कह दूँ ज़िन्दगी में हमने कुछ पाया नहीं.
 
सोच लो तानोगे छतरी या तुम्हे है भीगना,
आसमाँ पे प्रेम का बादल अभी छाया नहीं.
 
प्रेम की पग-डंडियों पर पाँव रखना सोच कर,  
लौट कर इस राह से वापस कोई आया नहीं.
 
पत्थरों से दिल लगाने का हुनर भी सीख लो,
फिर न कहना वक़्त रहते हमने समझाया नहीं.
 
प्रेम हो, शृंगार, मस्ती, या विरह की बात हो,
कौन सा है रंग जिसको प्रेम ने गाया नहीं.
 
तुमको पाया, रब को पाया, और क्या जो चाहिए,
कश्तियाँ डूबीं अनेकों फिर भी घबराया नहीं.

गुरुवार, 3 जून 2021

तीरगी की आड़ ले कर रौशनी छुपती रही ...

इक पुरानी याद दिल से मुद्दतों लिपटी रही.
घर, मेरा आँगन, गली, बस्ती मेरी महकी रही.
 
कुछ उजाले शाम होते ही लिपटने आ गए,
रात भर ये रात छज्जे पर मेरे अटकी रही.
 
लौट कर आये नहीं कुछ पैर आँगन में मेरे,
इक उदासी घर के पीपल से मेरे लटकी रही.
 
उनकी आँखों के इशारे पर सभी मोहरे हिले,
जीत का सेहरा भी उनका हार भी उनकी रही.
 
चाँद का ऐसा जुनूं इस रात को ऐसा चढ़ा,
रात सोई फिर उठी फिर रात भर उठती रही.
 
रौशनी के चोर चोरी रात में करने चले,
तीरगी की आड़ ले कर रौशनी छुपती रही.