स्वप्न मेरे

सोमवार, 14 सितंबर 2020

हम धुंवे के बीच तेरे अक्स को तकते रहे ...

हम सवालों के जवाबों में ही बस उलझे रहे , 
प्रश्न अन-सुलझे नए वो रोज़ ही बुनते रहे.

हम उदासी के परों पर दूर तक उड़ते रहे,
बादलों पे दर्द की तन्हाइयाँ लिखते रहे .

गर्द यादों की तेरी “सेंडिल” से घर आती रही,
रोज़ हम कचरा उठा कर घर सफा करते रहे.

तुम बुझा कर प्यास चल दीं लौट कर देखा नहीं,  
हम “मुनिस्पेल्टी” के नल से बारहा रिसते रहे.

कागज़ी फोटो दिवारों से चिपक कर रह गई, 
और हम चूने की पपड़ी की तरह झरते रहे.

जबकि तेरा हर कदम हमने हथेली पर लिया,
बूट की कीलों सरीखे उम्र भर चुभते रहे.

था नहीं आने का वादा और तुम आई नहीं,
यूँ ही कल जगजीत की ग़ज़लों को हम सुनते रहे.

कुछ बड़े थे, हाँ, कभी छोटे भी हो जाते थे हम,
शैल्फ में कपड़ों के जैसे बे-सबब लटके रहे.

उँगलियों के बीच में सिगरेट सुलगती रह गई,
हम धुंवे के बीच तेरे अक्स को तकते रहे.

सोमवार, 7 सितंबर 2020

उफ़ शराब का क्या होगा ...

सच के ख्वाब का क्या होगा
इन्कलाब का क्या होगा
 
आसमान जो ले आये  
आफताब का क्या होगा
 
तुम जो रात में निकले हो
माहताब का क्या होगा
 
इस निजाम में सब अंधे
इस किताब का क्या होगा
 
मौत द्वार पर आ बैठी
अब हिसाब का क्या होगा
 
साथ छोड़ दें गर कांटे 
फिर गुलाब का क्या होगा
 
है सरूर इन आँखों  में
उफ़ शराब का क्या होगा

सोमवार, 31 अगस्त 2020

तेरा जाना ट्रिगर है यादों का बंधन

सिक्कों का कुछ चाँद सितारों का बंधन.
चुम्बक है पर तेरी बाहों का बंधन.
 
दिन में भी तो चाँद नज़र आ जाता है,
इसने कब माना है रातों का बंधन.
 
तेरी आहट जैसे ही दरवाज़े पर,
खोल दिया बादल ने बूंदों का बंधन.
 
जो करना है अभी करो, बस अभी करो,
किसने जाना कब तक साँसों का बंधन.
 
तुमसे रौनक, तुमसे रोटी, सब्जी, दाल,
वरना ये घर चार दीवारों का बंधन.
 
सूरज की दस्तक को कब तक ठुकराते,
टूट गया सपनों की बातों का बंधन.

कब तक तेरा साथ, वक़्त का पता नहीं,
तेरा जाना ट्रिगर है यादों का बंधन.

सोमवार, 24 अगस्त 2020

कुछ तिलिस्मी थी माँ तेरी झोली

रात जागी तो कान में बोली
इस अँधेरे की अब चली डोली
 
बंद रहना ही इसका अच्छा था
राज़ की बात आँख ने खोली
 
दोस्ती आये तो मगर कैसे
दुश्मनी की गिरह नहीं खोली
 
तब से चिढती है धूप बादल से
नींद भर जब से दो-पहर सो ली
 
तब भी रोई थी मार के थप्पड़
आज माँ याद कर के फिर रो ली
 
खून सैनिक का तय है निकलेगा
इस तरफ उस तरफ चले गोली
 
जो भी माँगा वही मिला तुझसे
कुछ तिलिस्मी थी माँ तेरी झोली 

सोमवार, 17 अगस्त 2020

एक बुग्नी फूल सूखा डायरी ...

धूप कहती है निकल के दें … न दें
रौशनी हर घर को चल के दें … न दें  

साहूकारों की निगाहें कह रहीं
दाम पूरे इस फसल के दें … न दें

तय अँधेरे में तुम्हें करना है अब
जुगनुओं का साथ जल के दें … न दें

बात वो सच की करेगा सोच लो
आइना उनको बदल के दें … न दें

फैंसला लहरों को अब करना है ये
साथ किश्ती का उछल के दे ... न दें

सच है मंज़िल पर गलत है रास्ता
रास्ता रस्ता बदल के दे ... न दें

एक बुग्नी, फूल सूखा, डायरी  
सब खज़ाने हैं ये कल के दे ... न दें