स्वप्न मेरे

शनिवार, 26 अगस्त 2023

चन्द्रयान 3

जब से इसरो ने कहा चंदा तुम्हारा हो गया.
जान था अबतक मगर अब जाँ से प्यारा हो गया.

चाँद की नाज़ुक सतह पर पाँव विक्रम के पड़े,
बस वही पल इस सदी का इक नज़ारा हो गया.

तुम सनातन देवता महबूब मामा अब भी हो,
दक्षिणी ध्रुव पर तुम्हारा अब हमारा हो गया.

द्वन्द दुविधा लक्ष्य दुर्गम राह से परिचय नहीं,
किंतु इसरो का रचा इतिहास न्यारा हो गया.

एल. वि. एम. ले कर उड़ा प्रज्ञान, विक्रम यान को,
कम बजट, थी तीव्र बुद्धि, बस गुज़ारा हो गया.

कर दिया है काम वो वैज्ञानिकों ने देश के,
गाल पर एलीट के थप्पड़ करारा हो गया.

चन्द्रमा के बाद सूरज, शुक्र, मंगल यान अब,
पथ सकल ब्रह्माण्ड का सुखमय ही सारा हो गया.

कुछ कड़ी मेहनत सफलता लक्ष्य मंगल कामनाएँ,
हो नहीं पाया था जो पहले दुबारा हो गया.

शुक्रवार, 18 अगस्त 2023

आप सिक्का हैं महज़ यूँ ही उछलते रहिए ...

कोई बहलाए तो झूठे ही बहलते रहिए.
चाहे कुछ देर सही ख़ुद से ही छलते रहिए.

आप ढूँढेंगे तो छाया भी नज़र आएगी,
मोम का जिस्म लिए धूप में चलते रहिए.

चन्द छींटों से उठी झाग उतर जाती है,
शौक़ से अपने पतीलों में उबलते रहिए.

इंतहा ख़्वाब की देखेंगे पलक में रह कर,
आप आँसू की तरह आँख से ढलते रहिए.

भीड़ हर बार शिकंजे में चली आएगी,
झूठ का ज़ायक़ा हर बार बदलते रहिए.

हम तो बरसात की बूंदों से बिखर जाएंगे,
आपको आग लगानी है तो जलते रहिए.

पालना धर्म मेरा दंश है आदत उनकी,
आस्तीनों में छुपे सांप से पलते रहिए.

ये न सोचो के निकलने पे अंधेरा होगा
ज़िन्दगी भोर है सूरज-से निकलते रहिए

ये जो चित-पट है के अँटा ये उन्ही का सब है,
आप सिक्का हैं महज़ यूँ ही उछलते रहिए.
(तरही ग़ज़ल)

रविवार, 6 अगस्त 2023

किसी के दर्द का हिस्सा उठा लिया मैंने ...

धुआँ उठा तो तेरा अक्स पा लिया मैंने.
सिगार नाम का तेरे जला लिया मैंने.

मेरा यक़ीन है दिल तो किसी का टूटा है,
दिलों के खेल में जब दिल दिया-लिया मैंने.

खरोंच एक भी आने न पाई शीशे पर,
तमाम उम्र ये रिश्ता निभा लिया मैंने.

अधूरी बात को कर लेंगे ख़्वाब में पूरा,
अभी तो नींद का कम्बल चढ़ा लिया मैंने.

फिज़ां महकने लगी कायनात सुर्ख़ हुई,
ग़ज़ल के बीच तुझे गुनगुना लिया मैंने.

कभी रहा न मैं उस दिन के बाद से तनहा,
तुम्हारे साथ जो लम्हा बिता लिया मैंने.

ख़ुशी के जाम पिलाते पिलाते छुप-छुप कर,
किसी के दर्द का हिस्सा उठा लिया मैंने.

सोमवार, 24 जुलाई 2023

इश्क़ में रोज़ वजूहात बदल जाते हैं ...

बहते अश्कों की जो बरसात बदल जाते हैं.
दर्द में डूबी हुई रात बदल जाते हैं.

ग़र तरक़्क़ी के शजर उग सके पगडण्डी पर,
शह्र के साथ ये देहात बदल जाते हैं.

चाय उँगली से हिलाने का असर मत पूछो,
मीठी चीनी के भी अनुपात बदल जाते हैं.

साथ आ जाएँ तो क्या कुछ न बदल जाएगा,
जिनकी आमद से ये लम्हात बदल जाते हैं.

तितलियाँ रंग-बिरंगी हैं यहाँ मत भेजो,
बातों-बातों में ख़यालात बदल जाते हैं.

आपका घूरना, फिर देखना, फिर शरमाना,
देखते देखते ख़तरात बदल जाते हैं.

इश्क़ तसलीम तो कर लेंगे नज़र से पर फिर,
होंठ से कहते हुए बात बदल जाते हैं.

आज इस बात पे, कल और किसी किस्से पर,
इश्क़ में रोज़ वजूहात बदल जाते हैं.
(तरही ग़ज़ल)

मंगलवार, 18 जुलाई 2023

तमाम उम्र ही जैसे गुज़ार बैठा हो ...

कहीं से चल के कहीं बार-बार बैठा हो.
मेरी तलाश में हिम्मत न हार बैठा हो.

नमक छिड़कते हैं कुछ लोग घाव पर अक्सर,
कहीं वो खुद से न पट्टी उतार बैठा हो.

यकीं नहीं तो यकीनन भरम रहेगा उसे,
भले ही पास में परवर-दिगार बैठा हो.

फ़क़ीर दिल से मुकद्दर की भेंट देता है,
गरीब हो के कहीं माल-दार बैठा हो.

पराई आग में तपती है ज़िन्दगी ऐसे,
बदन में जैसे किसी का बुखार बैठा हो.

लिबास ज़िस्म पे रहता है काँच का हर-दम,
कहीं किसी को न पत्थर से मार बैठा हो.

उलझ के एक ही लम्हे में रह गया इतना,
तमाम उम्र ही जैसे गुज़ार बैठा हो.