स्वप्न मेरे

सोमवार, 16 मई 2016

आँखों में रोज़ सपने सजाना नहीं भूलो ...

रिश्ता नया बने तो पुराना नहीं भूलो
तुम दोस्ती का फर्ज़ निभाना नहीं भूलो

जो फूल आँधियों की शरारत से हैं टूटे
उन को भी देवता पे चढ़ाना नहीं भूलो

जागे हुओं को यूँ भी उठाना नहीं आसाँ
जो सो रहे हैं उनको उठाना नहीं भूलो

इंसान हो तो साथ हो इंसानियत इतनी
तुम डूबतों को तिनका थमाना नहीं भूलो

तुमको जो आसमान को छूने की है चाहत
आँखों में रोज़ सपने सजाना नहीं भूलो

सोमवार, 25 अप्रैल 2016

कहा, हम चले जब मुहब्बत में गिरने ...

भरोसे से निकलोगे जब काम करने
बचा लोगे खुद को लगोगे जो गिरने

सफेदी सरों पे लगी है उतरने 
समझ लो जवानी लगी अब बिखरने

किनारा हूँ मैं आँख भर देख लेना 
चलो जब समुंदर को बाहों में भरने

यहाँ चैन से कौन जीने है देता 
न जब चैन से कोई देता है मरने

वहीं पर उजाला नहीं हो सका है
जहां रोक रक्खीं हैं बादल ने किरनें

तेरे ख़त के टुकड़े गिरे थे जहां पर
वहीं पर निकल आए पानी के झरने

है आसान तलवार पे चलते रहना
कहा, हम चले जब मुहब्बत में गिरने

बुधवार, 20 अप्रैल 2016

ज़िंदगी में इस कदर बड़े हुए ...

चोट खाई गिर पड़े खड़े हुए
ज़िंदगी में इस कदर बड़े हुए

दर्द दे रहे हैं अपने क्या करूं
तिनके हैं जो दांत में अड़े हुए

उनको कौन पूछता है फूल जो
आँधियों की मार से झड़े हुए

दौर है बदल गए बुज़ुर्ग अब
घर की चारपाई में पड़े हुए

तुम कभी तो देख लेते आइना
हम तुम्हारी नाथ में हैं जड़े हुए

मत कुरेदिए हमारे ज़ख्म को
कुछ पुराने दर्द हैं गड़े हुए

मंगलवार, 12 अप्रैल 2016

फकत पैसे ही पैसे और पैसे ...

मुझे ये जिंदगी मिलती है ऐसे
तेरी जुल्फों का पेचो-ख़म हो जैसे

तेरी आँखों में आंसू आ गए थे
तुझे मैं छोड़ के जाता भी कैसे

फड़कती है नहीं बाजू किसी की
रगों में बह रहा है खून वैसे

तरक्की ले गई अमराइयां सब
शजर ये रह गया जैसे का तैसे

हवस इंसान की मिटती नहीं है
फकत पैसे ही पैसे और पैसे

सोमवार, 4 अप्रैल 2016

मेरी नज़रों में ऐसे ही कभी वो बे-खबर आता ...

मुझे इक शख्स अपना सा है शीशे में नज़र आता
जो आना चाहता था घर मगर किस मुंह से घर आता

इधर की छोड़ दी, पकड़ी नहीं परदेस की मिट्टी
कहो कैसे अँधेरा चीर कर ऊंचा शजर आता

वो जिसकी याद में आंसू ढलक आते हैं चुपके से
मेरी नज़रों में ऐसे ही कभी वो बे-खबर आता

सुनाता वो कभी अपनी, सुनाते हम कभी अपनी
कभी कोई मुसाफिर बन के अपना हम-सफ़र आता

उसे मिट्टी की चाहत खींच लाई थी वतन अपने
नहीं तो छोड़ कर बच्चों को क्या कोई इधर आता

जिसे परदेस की मिट्टी हवा पानी ने सींचा था
वो अपना है मगर क्यों छोड़ के मेरे शहर आता