स्वप्न मेरे

मंगलवार, 16 दिसंबर 2014

पल दो पल ज़िंदगानी अभी है प्रिये ...

खिलखिलाती हुई तू मिली है प्रिये
उम्र भर रुत सुहानी रही है प्रिये

आसमानी दुपट्टा झुकी सी नज़र
इस मिलन की कहानी यही है प्रिये

कौन से गुल खिले, रात भर क्या हुआ
सिलवटों ने कहानी कही है प्रिये

तोलिये से है बालों को झटका जहाँ
ये हवा उस तरफ से बही है प्रिये

ये दबी सी हंसी चूड़ियों की खनक
घर के कण कण में तेरी छवी है प्रिये

जब भी आँगन में चूल्हा जलाती है तू
मुझको देवी सी हरदम लगी है प्रिये

बाज़ुओं में मेरी थक के सोई है तू
पल दो पल ज़िंदगानी अभी है प्रिये

(पंकज सुबीर जी के ब्लॉग पर तरही मुशायरे में लिखी एक ग़ज़ल)


सोमवार, 8 दिसंबर 2014

नेह सागर सा छलकना चाहिए ...

प्रेम आँखों से झलकना चाहिए
देह चन्दन सा महकना चाहिए

बाग वन आकाश नदिया सब तेरा
मन विहग चंचल चहकना चाहिए

गंध तेरे देह की यह कह रही
मुक्त हो यौवन दहकना चाहिए

पंछियों की कलरवें उल्लास हो
नेह सागर सा छलकना चाहिए

दृष्टि का अनुबंध वो जादू करे
बिन पिए ही मय बहकना चाहिए


मंगलवार, 2 दिसंबर 2014

मील के पत्थर कभी इस रह-गुज़र के देखना ...

मील के पत्थर कभी इस रह-गुज़र के देखना
लोग मिल जाएंगे फिर मेरे शहर के देखना

दूर तक तन्हा मिलेगी रेत रेगिस्तान की
फल मगर मीठे मिलेंगे इस शजर के देखना

चुट्कियों में नाप लोगे प्रेम की गहराई तुम
मन के गहरे ताल में पहले उतर के देखना

पल दो पल में देख लोगे आदमी का सच सभी
दिल को पहले आईने सा साफ़ कर के देखना

इश्क के खिलने लगेंगे फूल पीली रेत पर
प्रेम के सहरा में पहले खुद उतर के देखना

प्रेम के आकाश पर बस कृष्ण है औ कृष्ण है
वेदना में विरह की राधा निखर के देखना   

सोमवार, 24 नवंबर 2014

गांधी की तस्वीर लगाई होती है ...

आसमान पे नज़र टिकाई होती है
खेतों में जब फसल उगाई होती है 

शहरों की चंचल चितवन के क्या कहने
मेकप की इक परत चढ़ाई होती है

दफ्तर में तो धूल जमी होती है पर
गांधी की तस्वीर लगाई होती है

उनका दिल टूटा तो वो भी जान गए
मिलने के ही बाद जुदाई होती है

चौड़ा हो जाता है बापू का सीना
बेटे की जिस रोज कमाई होती है

बूढी कमर झुकी होती है पर घर की
जिम्मेदारी खूब उठाई होती है

हो जाता है दिल सूना, घर सूना सा
बेटी की जिस रोज बिदाई होती है

चलते चलते एक और शेर ...
जिसने भी ये आग लगाई होती है
तीली हलके से सुलगाई होती है





सोमवार, 17 नवंबर 2014

धूप छाँव उम्र निकलती रही ...

बूँद बूँद बर्फ पिघलती रही
ज़िंदगी अलाव सी जलती रही

चूड़ियों को मान के जंजीर वो
खुद को झूठे ख्वाब से छलती रही

है तेरी निगाह का ऐसा असर
पल दो पल ये साँस संभलती रही

मौसमों के खेल तो चलते रहे
धूप छाँव उम्र निकलती रही

गम कभी ख़ुशी भी मिली राह में
कायनात शक्ल बदलती रही

रौशनी ही छीन के बस ले गए
आस फिर भी आँख में पलती रही