स्वप्न मेरे: दीवार
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बुधवार, 24 जून 2026

कैसे कहेंगे उसको वो बे-रोज़गार है …

दीवार है जो बीच की उसमें दरार है.
कंधों पे अब इस छत का भी दारोमदार है.

किस बात का बताओ तुम्हें इंतज़ार है.
अब हो गया तो बोल भी दो हमसे प्यार है.

जिसकी नहीं कलम से कभी दोस्ती हुई,
कहते हैं वो भी एक उपन्यासकार है.

क़ानून सिर्फ़ एक है क़ानून कुछ नहीं,
जंगल का फिर भी हाल मगर शानदार है.

पैसा अगर हो पास तो जितनी बुराई हो,
बच्चा रईस बाप का भी होनहार है.

सच है के उसके दिल को नहीं जान पाएगा,
माना तमाम ग्रंथों का वो जानकार है.

मोहलत मिली न इश्क़ से आठों पहर जिसे,
कैसे कहेंगे उसको वो बे-रोज़गार है.

शनिवार, 30 मार्च 2024

तुम्हारी कविता ...

तुमने कहा लिखो कविता मेरे पर
चली गयीं फिर दूर, चाहे कुछ पल के लिए

हालांकि तुम जानतीं थीं
मेरी हर कविता तुमसे शुरू हो कर
खत्म होती है तुम पर

शब्दों का सैलाब उमड़ता तो है, पर बिखर जाता है
तेरी हथेली की मज़बूत दीवार के आभाव में

मैं जानता हूँ जब तुम आओगी तो समेट लोगी
सँवार लोगी सभी शब्द करीने से
बुन लोगी कविता जो बिखरी पड़ी है
हमारे घर के जाने पहचाने जर्रों के बीच

फिर ये जंगली गुलाब भी तो महकने लगा है ...
#जंगली_गुलान

मंगलवार, 19 मई 2015

ईगो ...

ज़िंदगी क्या इतनी है के दूजे की पहल का इंतज़ार करते रहो ... और वो भी कब तक ... प्रेम नहीं, ऐसा तो नहीं ... यादों से मिटा दिया, ऐसा भी नहीं ... तो फिर क्यों खड़ी हो जाती है कोई दीवार, बाँट देती है जो दुनिया को आधा-आधा ...

दो पीठ के बीच का फांसला
मुड़ने के बाद ही पता चल पाता है

हालांकि इंच भर की दूरी
उम्र जितनी नहीं
पर सदियाँ गुज़र जाती हैं तय करने में

"ईगो" और "स्पोंड़ेलाइटिस"
कभी कभी एक से लगते हैं दोनों
दर्द होता है मुड़ने पे
पर मुश्किल नहीं होती

जरूरी है तो बस एक ईमानदार कोशिश
दोनों तरफ से
एक ही समय, एक ही ज़मीन पर

हाँ ... एक और बात
बहुत ज़रूरी है मुड़ने की इच्छा का होना