स्वप्न मेरे

बुधवार, 26 अक्टूबर 2016

हम भी किसी हसीन की आहों में आ गए ...

कुछ यूँ फिसल के वो मेरी बाहों में आ गए 
ना चाहते हुए भी निगाहों में आ गए

सच की तलाश थी में अकेला निकल पड़ा
जुड़ते रहे थे लोग जो राहों में आ गए 

हम भीगने को प्रेम की बरसात में सनम
कुछ देर बादलों की पनाहों में आ गए

था प्रेम उनसे उनके लगे झूठ सच सभी
ना चाह कर भी उनके गुनाहों में आ गए

मशहूर हो गया है हमारा भी नाम अब
हम भी किसी हसीन की आहों में आ गए 

गुरुवार, 20 अक्टूबर 2016

अपने किए पे बैठ कर रोया नहीं करते ...

अपने असूलों को कभी छोड़ा नहीं करते
साँसों की ख़ातिर लोग हर सौदा नहीं करते

महफूज़ जिनके दम पे है धरती हवा पानी
हैं तो ख़ुदा होने का पर दावा नहीं करते

हर मोड़ पर मुड़ने से पहले सोचना इतना
कुछ रास्ते जाते हैं बस लौटा नहीं करते

इतिहास की परछाइयों में डूब जाते हैं
गुज़रे हुए पन्नों से जो सीखा नहीं करते

आकाश तो उनका भी है जितना हमारा है
उड़ते परिंदों को कभी रोका नहीं करते

जो हो गया सो हो गया खुद का किया था सब
अपने किए पे बैठ कर रोया नहीं करते
  

गुरुवार, 13 अक्टूबर 2016

कहीं अपने ही शब्दों में न संशोधन करो तुम ...

दबी है आत्मा उसका पुनः चेतन करो तुम
नियम जो व्यर्थ हैं उनका भी मूल्यांकन करो तुम

परेशानी में हैं जो जन सभी को साथ ले कर    
व्यवस्था में सभी आमूल परिवर्तन करो तुम

तुम्हें जो प्रेम हैं करते उन्हें ठुकरा न देना
समय फिर आए ना ऐसा की आवेदन करो तुम  

अभी भी मान लो सच को बहुत आसान होगा
कहीं लक्षमण की रेखा का न उल्लंघन करो तुम

समझदारी से अपनी बात सबके बीच रखना
कहीं अपने ही शब्दों में न संशोधन करो तुम 

रविवार, 25 सितंबर 2016

माँ ...

माँ को गए आज चार साल हो गए पर वो हमसे दूर है शायद ही किसी पल ऐसा लगा ... न सिर्फ मुझसे बल्कि परिवार के हर छोटे बड़े सदस्य के साथ माँ का जो रिश्ता था वो सिर्फ वही समझ सकता है ... मुझे पूरा यकीन है जब तक साँसें रहेंगी माँ के साथ उस विशेष लगाव को उन्हें भुलाना आसान नहीं होगा ... बस में होता तो आज का दिन कभी ना आने देता पर शायद माँ जानती थी जीवन के सबसे बड़े सत्य का पाठ वही पढ़ा सकती थी ... सच बताना माँ ... क्या इसलिए ही तुम चली गईं ना ...   


ज़िन्दगी की अंजान राहों पर
अब डर लगने लगा है

तुमने ही तो बताया था 
ये कल-युग है द्वापर नहीं  
कृष्ण बस लीलाओं में आते हैं अब
युद्ध के तमाम नियम
दुर्योधन के कहने पर तय होते हैं
देवों के श्राप शक्ति हीन हो चुके हैं
 
मैं अकेला और दूर तक फैली क्रूर नारायणी सेना
हालांकि तेरा सिखाया हर दाव
खून बन के दौड़ता है मेरी रगो में

एक तुम ही तो सारथी थीं
हाथ पकड़ कर ले आईं यहाँ तक
मेरी कृष्ण, मेरी माया
जिसके हाथों सुरक्षित थी मेरी जीवन वल्गा

अकेला तो मैं अब भी हूँ
जिंदगी के ऊबड़-खाबड़ रास्ते भी हैं हर पल 
और मेरा रथ भी वैसे ही दौड़ रहा है

सच बताना माँ

मेरी जीवन वल्गा अब भी तुम्हारे हाथों में ही है न ...? 

मंगलवार, 20 सितंबर 2016

पलकों के मुहाने पे समुन्दर न देख ले ...

डरता हूँ कहीं तेज़ धुरंधर न देख ले
हर बात में अपने से वो बेहतर न देख ले

शक्की है गुनहगार ही समझेगा उम्र भर
कोशिश ये करो हाथ में खंजर न देख ले

ऐसे न खरीदेगा वो सामान जब तलक
दो चार जगह घूम के अंतर न देख ले

मुश्किल से गया है वो सभी मोह छोड़ कर 
कुछ देर रहो मौन पलटकर न देख ले

नक्शा जो बने प्याज को रखना दिमाग में
दीवार कभी तोड़ के अन्दर न देख ले 

एहसास उसे दिल के दिखाना न तुम कभी
पलकों के मुहाने पे समुन्दर न देख ले