स्वप्न मेरे

शनिवार, 16 मार्च 2024

लौटना पंछी का ...

रोज़ देखता हूँ खिड़की के झरोखे से 
सूखी टहनी से लटके बियाबान घौंसले की उदासी
महसूस करता हूँ बाजरे के ताज़ा दानों की महक

रह रह के झाँकती है इक रौशनी वहाँ से
सुबुकता होगा कोई जुगनू, शायद किसी की याद में

हवा की हथेली पे लिखा सन्देश
न लौट के आने वाले पंछी ने देखा तो होगा ...

शनिवार, 9 मार्च 2024

शहर - जो गुज़र गया

मुद्दतों बाद उन रास्तों से गुज़रा
जिसकी हर शै में गंध रहती थी ज़िन्दगी की

लगभग मिटटी हो गयी सड़क पर
पीली रौशनी का बल्ब तो वहीं खड़ा है
पर अब इक उदासी सी घिरी रहती है उसके इर्द-गिर्द

अरावली की सपाट चट्टानें
जिस पर लिखते थे कभी अपना नाम
खोखली हो चुकी हैं समय के दीमक से

नुक्कड़ का खोखा जहाँ तन्दूर ठण्डा नहीं होता था
आखरी साँस के साथ खड़ा हैं गिरने की प्रतीक्षा में

माना ये सच है
जाने वाले के साथ सब कुछ खत्म तो नहीं होता
पर पता नहीं क्यों दूर-दूर तक फैला मरुस्थल
लील चूका है पूरा इतिहास

सुना था शहर कभी मरते नहीं
तो क्या पसरे हुवे सन्नाटे की साँसों को
किसी जानी पहचानी आहट का इंतज़ार है ...

शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2024

चाह - आशियाने की ...

चार दीवारें, पलंग और कुछ बक्से
ठिठोली और झगड़ों के बीच
ना ख़त्म होने वाली ढेर सारी बातों ने
कब ज़हन को गुदगुदाना बंद किया, नहीं पता

तमाम शक्लें, जो मुद्दतों हम-सफ़र रहीं
कब पोटली से गिरीं ... जान नहीं पाया
छोटी-छोटी कितनी ही बे-तरतीब चीजों का खज़ाना
क्यों और किस मोड़ पर बिखरा
समझना मुश्किल है आज

छोटा सा हसीन ख्वाब
जो ठंडी हवा के झौंके के साथ पल्लवित हुआ
कब किस रिक्शे पर छूटा, क्या पता

याद रही तो बस दूसरे से आगे निकल जाने को होड़
सब कुछ पा लेने की जंग ...
एक ऐसे आशियाने की चाह
जहाँ दफ़न हो सके जिस्म से जुड़ी हर याद
जहाँ सुनाई न दे रिश्तों के टूटने की गूँज

पूछता हूँ अपने आप से
अब तो खुश हूँ ... अपने आशियाने में ...

शनिवार, 10 फ़रवरी 2024

प्रेम ...

बन्द कर ली आँखें
नहीं चाहता किसी के प्रेम में गिरना
बन्द कर लिए कान, की चुपके से उतर न जाए प्रेम
पसंदीदा धुन के सहारे

अपने एहसास का घना जंगल समेटे
आवारगी के हम-साये से लिपट गुजर रहे थे दिन

पर हवा के झोंके पे सवार
दूर खड़ा मुस्कुरा रहा था प्रेम
सर्दी के कोहरे में सिमट कर
कब उतर गया अंतस तक ... जान नहीं पाया

अब तो गीत गुनगुनाता हूँ, बारिश में नहाता हूँ
लोग तो लोग ... मैं भी कहता हूँ
अब ज़िन्दगी जीता हूँ ... हाँ ... मैं प्रेम करता हूँ ...
#जंगली_गुलाब

बुधवार, 7 फ़रवरी 2024

कायनात का सृजन ...

बरसों पहले अपने ही सृजन को पूर्ण करने
बुना होगा कायनात ने एक लम्हा
क़तरा-क़तरा जोड़ी होगी हर साँस
रहती है जिसमें ज़िंदगी की आहट, सपनों की उड़ान
जोड़ी होगी लम्हा दर लम्हा हर ख़ुशी
जो कर सके कायनात के सृजन को पूर्ण

याद आया ...
आज ही तो उस लम्हे ने आँख खोली थी
और ये बसंत ... ये भी तो उसी दिन आया था
कायनात के उस अपूर्ण सृजन में ...

हालाँकि ये राज़ जो मेरे और कायनात के दरमियाँ है
पर आज सब को बताने का मन करता है

मैं हूँ वो अपूर्ण सृजन और तुम हो वो सजीव लम्हा
जिसकी इब्तदा आज हुयी मेरे और सिर्फ़ मेरे लिए

जनम-दिन की हार्दिक शुभकामनाएँ मेरे जंगली गुलाब
मेरे और सिर्फ़ मेरे सजीव लम्हे को ...
#जंगली_गुलाब