स्वप्न मेरे: सच
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शनिवार, 28 दिसंबर 2024

सच का सच ...

बिन बोले, बिन कहे
कितना कुछ कहा जा सकता है

पर जैसा कहा
क्या दूसरा वैसा ही समझ सकता है
क्या सच के पीछे छुपा सच समझ आता है

शायद हाँ ... शायद ना ...

शायद कई बार समझ तो आता है
पर समय निकल जाने के बाद 

इसे समझना कहें ... 
शायद हाँ ... शायद ना ... 

#स्वप्न_मेरे

सोमवार, 8 जून 2020

सच के झूठ ... क्या सच ...


सच
जबकि होता है सच
लग जाती है
मुद्दत
सच की ज़मीन पाने में

झूठ
जबकि नहीं होता सच
फ़ैल जाता है
आसानी से
सच हो जैसे

हालांकि अंत
जबकि रह जाता है
केवल सच
पर सच को मिलने तक
सच की ज़मीन
झूठ हो जाती है
तमाम उम्र

तो क्या है सच 
ज़िन्दगी ... 
या प्राप्ति 
सच या झूठ की ...

सोमवार, 23 जुलाई 2018

तुम जो सच कहने का फिर वादा करो ...


नफरतों की डालियाँ काटा करो
घी सभी बातों पे ना डाला करो 

गोपियों सा बन सको तो बोलना
कृष्ण मेरे प्यार को राधा करो

तुम भी इसकी गिर्द में आ जाओगे
यूँ अंधेरों को नहीं पाला करो

दुःख हमेशा दिल के अंदर सींचना
सुख जो हो मिल जुल के सब साझा करो

खिड़कियों के पार है ताज़ा हवा
धूल यादों की कभी झाड़ा करो

मैं भी अपने झूठ कह दूंगा सभी 
तुम जो सच कहने का फिर वादा करो

सोमवार, 8 जून 2015

अनकहे सच ...

हर प्रेम की इन्तहा मिलन तो नहीं ... फिसलन भरी राह कुछ पलों में जीवन गाथा से गुज़र जाती है पर बीते समय की हर गाथा सुहानी हो, जरूरी नहीं ... हर अतीत की याद मीठी हो, ये भी तो जरूरी नहीं ...

खुद की तलाश में
समय की काली पगडण्डी पर
इतना पीछे लौट गया की
बिखरी यादों के गोखरू पैरों को लहू-लुहान करने लगे
गुज़रे लम्हों के आवारा भूत ठेंगा दिखाने लगे

चुपके चुपके चलता बे-आवाज पदचापों का शोर
सीसा डालने के बावजूद बहरा करने लगा
जगह जगह बिखरे सपनों के अधजले कचरे सड़ांध मारने लगे
सांस लेने की मजबूरी में तेरी खुशबू लिपटी हवा
फेफड़ों को खोखला करने लगी

जीने मरने की कसमों के सियारी पद-चाप
विश्वास के जंगली कुत्तों की गुर्राहट

झपट्टा मारने को तैयार
प्रेम की खूनी इबारत से हांफती खूंखार बिल्लियाँ
दबे पाँव मुझको घेरने लगीं

चाँद की पीली रौशनी और तेरे बादली साए की धुंध के बीच
अनगिनत शक्लें बदलता समय
तेरे ही अक्स में तब्दील होने लगा

पलटी हुयी सफ़ेद आँखों की चुभन
काले बालों का बढ़ता जंगल
और नैपथ्य से आती विद्रूप हंसी की आवाजें
मुझे अपने आप से खींचने लगीं हैं

घुटन बढ़ने लगी है  ...

यकायक दूर से आती
फड़फड़ाते पन्नों की आवाज चुप हो जाती है
डायरी के पन्नों में इतिहास होता वर्तमान
साँस लेने लगता है


     

सोमवार, 19 जनवरी 2015

क्या सच में कोई है

ज़िन्दगी जो न दिखाए वो कम है ... आस पास बिखरे माहोल से जुड़ा हर पल कालिख की तरफ धकेला जा रहा है ... और धकेलने वाला भी कौन ... इंसान, और वो भी इंसानियत के नाम पर ... पट्टी तो किसी ने नहीं बाँधी आँख पर, फिर भी इंसान है की उसे नज़र नहीं आता ... शायद देखना नहीं चाहता ...

पूछता हूँ देह से परे हर देह से
कि कह सके कोई आँखों से आँखें मिला कर
नहीं जागा शैतान मेरे अन्दर
फिर चाहे काबू पा लिया हो उस पर

चाहता हूँ पूछना जानवर से
जानवर होने की प्रवृति क्या आम है उनमें
या जरूरी है इंसान होना इस काबलियत के लिए

यही सवाल पंछी, कीट पतंगों पेड़ पौधों से भी करता हूँ

कुछ काँटों ने कहा हम नहीं दर्द के व्योपारी
शैतान तो देखा नहीं पर आम चर्चा है कायनात में
है कोई शैतान के नाम से इंसान जैसा
बांटता फिरता है हर दर्द

सुनते हैं इंसान से ऊपर भी रहती है कोई शख्सियत
जिसका प्रचलित नाम खुदा है ... हालांकि लगता नहीं

वैसे तो जंगली गुलाब भी खूब खिलता है यादों में
पर दीखता तो नहीं ...