स्वप्न मेरे: मयूरी
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सोमवार, 19 अगस्त 2019

जाने क्यों आँखें रहती नम नम ...


गीत प्रेम के गाता है हर दम
जाने क्यों आँखें रहती नम नम

नाच मयूरी हो पागल
अम्बर पे छाए बादल
बरसो मेघा रे पल पल
बारिश की बूँदें करतीं छम छम
जाने क्यों आँखें ...

सबके अपने अपने गम
कुछ के ज्यादा कुछ के कम
सह लेता है जिसमें दम
सुन आँसूं पलकों के पीछे थम 
जाने क्यों आँखें ... 

हिस्से में उतना सुख दुःख
जीवन का जैसा है रुख
फिर भी सब कहते हैं सुख 
उनके हिस्से है आया कम कम
जाने क्यों आँखें ...

मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

वक़्त कितना क्या पता रिश्तों को सुलझाने तो दो ...

ये अँधेरा भी छंटेगा धूप को आने तो दो
मुट्ठियों में आज खुशियाँ भर के घर लाने तो दो

खुद को हल्का कर सकोगे ज़िन्दगी के बोझ से
दर्द अपना आँसुओं के संग बह जाने तो दो

झूम के आता पवन देता निमंत्रण प्रेम का
छू सके जो मन-मयूरी गीत फिर गाने तो दो

बारिशों का रोक के कब तक रखोगे आगमन
खोल दो जुल्फें घटा सावन की अब छाने तो दो

सब की मेहनत के भरोसे आ गया इस मोड़ पर
नाम है साझा सभी के तुम शिखर पाने तो दो

पक चुकी है उम्र अब क्या दोस्ती क्या दुश्मनी
वक़्त कितना क्या पता रिश्तों को सुलझाने तो दो ...