स्वप्न मेरे: पायल
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मंगलवार, 27 नवंबर 2018

सजाई महफिलें जो प्रेम की खामोश पायल ने ...


सजाई महफिलें जो प्रेम की खामोश पायल ने
मधुर वंशी बजा दी नेह की फिर श्याम श्यामल ने

शिकायत क्या करूँ इस खेल में मैं भी तो शामिल हूँ
मेरी नींदों को छीना है किसी मासूम काजल ने

वो मिलते ही हकीकत हर किसी की जान लेता है
मचा रक्खी है कैसी खलबली उस एक पागल ने

मुकम्मल जानने को क्यों तुम्हें हर बात हो मालुम 
पके हैं या के हैं कच्चे बता दी एक चावल ने

फलक तो मिल गया लेकिन कसक सी रह गयी दिल में
न जाने क्यों मेरा रस्ता नहीं रोका है बादल ने

सितम, दुःख दर्द, मुश्किल राह में जितनी चली आएं 
बलाओं से बचा रक्खा है मुझको माँ के आँचल ने

सोमवार, 12 दिसंबर 2016

होले-होले बजती हो, बांसुरी कोई जैसे ...

रात के अँधेरे में, धूप हो खिली जैसे
यूँ लगे है कान्हा ने, रास हो रची जैसे

ज़ुल्फ़ की घटा ओढ़े, चाँद जैसे मुखड़े पर
बादलों के पहरे में, चांदनी सोई जैसे

सिलसिला है यादों का, या धमक क़दमों की
होले-होले बजती हो, बांसुरी कोई जैसे

चूड़ियों की खन-खन में, पायलों की रुन-झुन में
घर के छोटे आँगन में, जिंदगी बसी जैसे

यूँ तेरा अचानक ही, घर मेरे चली आना
दिल के इस मोहल्ले में आ गयी ख़ुशी जैसे
(तरही गज़ल)