स्वप्न मेरे

शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2025

लाइफ़ लाइन …

आज के ख़ास दिन की, हमारी Life Line के जनम-दिवस की, हमारे खिलते हुए जंगली गुलाब को बहुत बहुत शुभकामनाएँ … उनके नाम …
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

तू भले ही पार पचास है,मेरी चाय की तू मिठास है
जो बुझी नहीं है अभी तलक, तू वो तिशनगी तो वो प्यास है
तू है मेरे इश्क़ का तर्जुमा, तेरा शुक्रिया तेरा शुक्रिया

मुझे जुगनुओं की तलाश थी, ये चराग़ तूने जला दिया
मेरे साथ साथ रही सदा, मुझे ज़िंदगी से मिला दिया
मेरे हम-सफ़र मेरी हम-नवा, तेरा शुक्रिया तेरा शुक्रिया

ये हसीन पल की जो रात है, तेरे मेरे बीच की बात है
तुझे क्या बताऊँ में दिल-रुबा, यही ज़िंदगी की हयात है
ये सफ़र जो साथ है तय किया,तेरा शुक्रिया तेरा शुक्रिया
#जंगली_गुलाब 

शनिवार, 1 फ़रवरी 2025

हमको अपनों ने मिल के लूटा है ...

बाद मुद्दत वो हमसे रूठा है.
दिल किसी बात पर तो टूटा है.

मन्नतें हो रहीं है सब पूरी,
कैसे कह दूँ शजर ये झूठा है.

छोड़ आये उसी मोहल्ले को,
जिस जगह वक़्त हमसे छूटा है.

कुछ हकीकत चुभी है पैरों में,
काँच का ख्व़ाब है जो टूटा है.

मैं उधर तुम इधर चली आईं,
चश्म-दीदी गवाह बूटा है.

याद के ढेर हैं जहाँ बिखरे,
वो ठिकाना ही अपना कूचा है.

दुश्मनों का इलाज था लेकिन,
हमको अपनों ने मिल के लूटा है.
#स्वप्न_मेरे

शनिवार, 25 जनवरी 2025

मिलते हैं मेरे जैसे, किरदार कथाओं में ...

बारूद की खुशबू है, दिन रात हवाओं में.
देता है कोई छुप कर, तक़रीर सभाओं में.

इक याद भटकती है, इक रूह सिसकती है,
घुँघरू से खनकते हैं ख़ामोश गुफाओं में.

बादल तो नहीं गरजे, बूँदें भी नहीं आईं,
कितना है असर देखो, आशिक की दुआओं में.

चीज़ों से रसोई की, अम्मा जो बनाती थी,
देखा है असर उनका, देखा जो दवाओं में.

हे राम चले आओ, उद्धार करो सब का,
कितनी हैं अहिल्याएं, कल-युग की शिलाओं में.

जीना भी तेरे दम पर, मरना भी तेरी खातिर,
मिलते हैं मेरे जैसे, किरदार कथाओं में.
(तरही ग़ज़ल)

शनिवार, 18 जनवरी 2025

साहिल से कुछ ही दूर जो फिसल गया ...

जो धूप में रहा वही तो जल गया.
पैदल तो छाँव-छाँव बस निकल गया.

क़िस्मत वो अपने आप ही बदल गया,
गिरने के बावज़ूद जो संभल गया.

बस उतनी ज़िन्दगी से उम्र कम हुई,
जो वक़्त तू-तड़ाक में निकल गया.

क़ातिल मेरे हिसाब से तो वो भी है,
सपनों को दूसरे के जो कुचल गया.

क्या सामने वो आ सकेगा धूप के,
हलकी सी रोशनी में जो पिघल गया.

कुछ सर ही फूटने को थे उतावले,
पत्थर का क्या क़सूर जो मचल गया.

क्यों हाल उस गरीब का हो पूछते,
साहिल से कुछ ही दूर जो फिसल गया.
#स्वप्नमेरे

रविवार, 12 जनवरी 2025

पार कैसे जाना है, कश्तियाँ समझती हैं ...

खेल तो बहाना है, गोटियाँ समझती हैं.
कौन है निशाने पर, पुतलियाँ समझती हैं.

पल दो पल कहीं जीवन, मौत का कहीं तांडव,
खेल है ये साँसों का, अर्थियाँ समझती हैं.

काफिला है यादों का, या हवा की सरगोशी,
कौन थपथपाता है, खिड़कियाँ समझती हैं.

चूड़ियों की खन-खन में, पायलों की रुन-झुन में,
कौन दिल की धड़कन में, लड़कियाँ समझती हैं.

नौनिहाल आते हैं, पढ़ के जब मदरसे से,
लफ्ज़ किसने सीखा है, तख्तियाँ समझती हैं.

कुछ सफ़ेद पोशों की, गूँजती हैं तकरीरें,
कितने घर जलेंगे अब, बस्तियाँ समझती हैं.

तुम तो इक मुसाफिर हो, फिक्र हो तुम्हें क्यों फिर,
पार कैसे जाना है, कश्तियाँ समझती हैं.
(तरही ग़ज़ल)