स्वप्न मेरे

बुधवार, 3 जनवरी 2018

उम्र के छलावे ...

सभी मित्रों को नव वर्ष की हार्दिक मंगल कामनाएं ... २०१८ सबके लिए शुभ हो. नव वर्ष की शुरुआत एक रचना के साथ ... जाने क्यों अभी तक ब्लॉग पे नहीं डाली ... अगर आपके दिल को भी छू सके तो लिखना सार्थक होगा ...

तेरे चले जाने के बाद
पतझड़ की तरह कुछ पत्ते डाल से झड़ने लगे थे  
गमले में लगी तुलसी भी सूखने लगी थी
हालांकि वो आत्महत्या नहीं थी

वो तेरे स्पर्श का आभाव भी नही था   
क्योंकि समय के साथ कोने में पड़े कैक्टस पे फूल आने लगे थे
दावा तो नहीं कर सकता की वो खुशी के नहीं थे  

छत पे उतरी सीलन
जैसे कोरे कैनवस पे अजीबो-गरीब रेखाओं में बना तेरा अक्स  
जानता हूँ अगली बारिश से पहले छत की मरम्मत ज़रूरी है

ड्रैसिंग टेबल से सारी चीजें फिकवाने के बावजूद
नए रूम फ्रेशनर का कोई असर नहीं हो रहा
तेरे ब्रैंड के डीयो की खुशबू झड़ती है दिवारों से 
लगता है अगले साल घर की सफेदी भी करवानी होगी

पिछले कई दिनों से
बीते लम्हों की काई जमने लगी है फर्श पर 
टूटी टाइलों की झिर्रियों से यादों की बास उठने लगी है
लगता है अगली गर्मियों से पहले ये मार्बल भी बदलना होगा  

और इस खिड़की, रोशनदान का क्या करूं
पल्लों की ओट से लुका छिपी का खेल खेलते अब साँस फूलने लगी है 
तेरे होने का एहसास बार बार खिड़की के मुहाने ले आता है 
लगता है अगले साल तक इन्हें भी बंद करवाना होगा

और कोने में पड़ा आदम कद टैडी-बियर
वो भी पिछले कई दिनों से उदास है
तेरे चले जाने के बाद मैं उससे लिपट के सोने लगा था
अजीब सी जिस्मानी गंध रहती है उसमें
गहरे लाल लिपस्टिक के निशानों से अटा वो टैडी-बियर  
सोचता हूँ अबकी सर्दियों से पहले गरम कपड़ों के साथ
इसको भी ड्राई-क्लीन करवा लूँ

सच कहूं तो इतना कुछ है करने के लिए
समझ नहीं आता कहाँ से शुरुआत करूं ...
हाथ की लकीरों में उम्र की लकीर देख के हंसी आने लगी है अब
अपने आप से बातें करना सकून देने लगा है 

पता नहीं ये खुद से किये वादे हैं या जिंदगी के छलावे ... 

सोमवार, 25 दिसंबर 2017

बचा कर के टांगें निकलना पड़ेगा ...

नया वर्ष आने वाला है ... सभी मित्रों को २०१८ की बहुत बहुत शुभकामनाएं ... २०१७ की अच्छी यादों के साथ २०१८ का स्वागत है ... 

ये किरदार अपना बदलना पड़ेगा
जो जैसा है वैसा ही बनना पड़ेगा

ये जद्दोजहद ज़िन्दगी की कठिन है
यहाँ अपने लोगों को डसना पड़ेगा

बहुत भीड़ है रास्तों पर शिखर के
किसी को गिरा कर के चलना पड़ेगा

कभी बाप कहना पड़ेगा गधे को
कभी पीठ पर उसकी चढ़ना पड़ेगा

अलहदा जो दिखना है इस झुण्ड में तो  
नया रोज़ कुछ तुमको करना पड़ेगा

यहाँ खींच लेते हैं अपने ही अकसर 
बचा कर के टांगें निकलना पड़ेगा 

सोमवार, 18 दिसंबर 2017

रो रही हैं आज क्यों फिर पुतलियाँ ...

छत भिगोने आ गईं जो बदलियाँ
शोर क्यों करती हैं इतना बिजलियाँ

आदमी शहरों के ऐसे हो गए
चूस कर छोड़ी हों जैसे गुठलियाँ

फेर में कानून के हम आ गए
अब कराहेंगी हमारी पसलियाँ

हाथ में आते ही सत्ता क्या हुआ
पी गईं सागर को खुद ही मछलियाँ

उँगलियों की चाल, डोरी का चलन
जानती हैं खेल सारा पुतलियाँ

खुल गया टांका पुराने दर्द का 
रो रही हैं आज क्यों फिर पुतलियाँ 

सोमवार, 11 दिसंबर 2017

या फिर हमें भी इक चराग़ लेने दो ...

फूलों की कैद से पराग लेने दो
इन तितलियों से कुछ सुराग लेने दो

इस दौड़ में कहीं पिछड़ न जाएं हम
मंजिल अभी है दूर भाग लेने दो

राजा हो रंक पेट तो सताएगा
उनको भी तो चूल्हे से आग लेने दो

नज़दीक वो कभी नज़र न आएंगे
सोए हुए हैं शेर जाग लेने दो

हम आस्तीन में छुपा के रख लेंगे
इस शहर में हमको भी नाग लेने दो 

या जुगनुओं को छोड़ दो यहाँ कुछ पल 
या फिर हमें भी इक चराग़ लेने दो  

सोमवार, 4 दिसंबर 2017

कहानी खोल के रख दी है कुछ मजबूत तालों ने ...

लहू का रंग है यकसाँ कहा शमशीर भालों ने
लगा डाली है फिर भी आग बस्ती के दलालों ने 

यकीनन दूर है मंज़िल मगर मैं ढूंढ ही लूंगा
झलक दिखलाई है मुझको अँधेरे में उजालों ने

वो लड़की है तो माँ के पेट में क्या ख़त्म हो जाए 
झुका डाली मेरी गर्दन कुछ ऐसे ही सवालों ने

अलग धर्मों के भूखे नौजवानों का था कुछ झगड़ा
खबर दंगों की झूठी छाप दी अख़बार वालों ने

हवा भी साथ बेशर्मी से इनका दे रही है अब
शहर के हुक्म से जंगल जला डाला मशालों ने

वो अपना था पराया था वो क्या कुछ ले के भागा है 
कहानी खोल के रख दी है कुछ मजबूत तालों ने