स्वप्न मेरे

गुरुवार, 11 जुलाई 2013

माँ का हिस्सा ...

मैं खाता था रोटी, माँ बनाती थी रोटी    
वो बनाती रही, मैं खाता रहा    
न मैं रुका, न वो 
उम्र भर रोटी बनाने के बावजूद उसके हाथों में दर्द नहीं हुआ   

सुबह से शाम तक इंसान बनाने की कोशिश में  
करती रही वो अनगिनत बातें, अनवरत प्रयास      
बिना कहे, बिना सोचे, बिना किसी दर्द के   

कांच का पत्थर तराशते हाथों से खून आने लगता है   
पर माँ ने कभी रूबरू नहीं होने दिया 
अपने ज़ख्मों से, छिले हुए हाथों से   
हालांकि आसान नहीं था ये सब पर माँ ने बाखूबी इसे अंजाम दिया 

अब जब वो नहीं है मेरे साथ 
पता नहीं खुद को इन्सान कहने के काबिल हूं या नहीं 

हां ... इतना जानता हूं 
वो तमाम बातें जो बिन बोले ही माँ ने बताई 
शुमार हो गई हैं मेरी आदतों में 

सच कहूं तो एक पल मुझे अपने पे भरोसा नहीं 
पर विश्वास है माँ की कोशिश पे 
क्योंकि वो जानती थी मिट्टी को मूरत में ढालने का फन 

और फिर ... 
मैं भी तो उसकी ही मिट्टी से बना हूं 

बुधवार, 3 जुलाई 2013

यादों की खिड़की जब अम्मा खोलती थी ...

अपने मन की बातें तब तब बोलती थी    
यादों की खिड़की जब अम्मा खोलती थी 

गीत पुरानी फिल्मों के जब गाती थी 
अल्हड बचपन में खुद को ले जाती थी 
कानों में जैसे शक्कर सा घोलती थी   
यादों की खिड़की ... 

मुश्किल न हो घर में उसके रहने से  
ठेस न लग जाए उसके कुछ कहने से  
कहने से पहले बातों को तोलती थी  
यादों की खिड़की ... 

नब्बे के दद्दा थे, बापू सत्तर के  
लग जाती थी चोट, फर्श थे पत्थर के     
साठ की अम्मा पर घूंघट में डोलती थी   
यादों की खिड़की ... 

बुधवार, 26 जून 2013

माँ - एक एहसास ...

उदासी जब कभी बाहों में मुझको घेरती है 
तू बन के राग खुशियों के सुरों को छेड़ती है 

तेरे एहसास को महसूस करता हूं हमेशा 
हवा बालों में मेरे उंगलियां जब फेरती है 

चहल कदमी सी होती है यकायक नींद में फिर 
निकल के तू मुझे तस्वीर से जब देखती है   

तू यादों में चली आती है जब बूढी पड़ोसन 
कभी सर्दी में फिर काढा बना के भेजती है 

“खड़ी है धूप छत पे कब तलक सोता रहेगा” 
ये बातें बोल के अब धूप मुझसे खेलती है   

तेरे हाथों की खुशबू की महक आती है अम्मा    
बड़ी बेटी जो फिर मक्की की रोटी बेलती है 

नहीं देखा खुदा को पर तुझे देखा है मैंने 
मेरी हर सांस इन क़दमों पे माथा टेकती है  

मंगलवार, 18 जून 2013

नाता ...

अब्बू के तो पाँव है छूता, माँ से लाड लड़ाता है 
अपने-पन का ये कैसा फिर माँ बेटे का नाता है 

डरता है या कर ना पाता, अब्बू से मन की बातें 
आगे पीछे माँ से पर वो सारे किस्से गाता है 

हाथ नहीं हो अब्बू का जैसे इंसान बनाने में 
सबके आगे बस वो अपनी माँ का राग सुनाता है 

मुश्किल हो या दुख जितना अब्बू से बाँट नहीं पाता 
बिन बोले माँ के सीने लग के हल्का हो जाता है 

उम्र के साथ वो अब्बू जितना हो जाता है पर फिर भी   
माँ के आगे अपने को फिर भी बच्चा ही पाता है   

ऐसी तो है बात नहीं की अब्बू से है प्यार नहीं    
माँ के आगे पर बेटे को कोई नहीं फिर भाता है 

मंगलवार, 11 जून 2013

पूछना ना क्या गलत है क्या सही है ...

माँ मेरी ये बात मुझको कह गई है 
जो मिले वो हंस के लो मिलना वही है 

दर्द के उस छोर पे सुख भी मिलेगा  
रुक न जाना जिंदगी चलती रही है  

कोशिशें गर हों कहीं भागीरथी सी     
धार गंगा की वहां हो कर बही है 

चलते चलते पांव में छाले पड़ेंगे 
ये समझना आजमाइश की घड़ी है   

दुख पहाड़ों सा अगर जो सामने हो 
सोच लेना तिफ्ल है कुछ भी नहीं है 

वक़्त के फरमान तो आते रहेंगे 
पूछना ना क्या गलत है क्या सही है