मैं खाता था रोटी, माँ
बनाती थी रोटी
वो बनाती रही, मैं खाता रहा
न मैं रुका, न वो
उम्र भर रोटी बनाने के
बावजूद उसके हाथों में दर्द नहीं हुआ
सुबह से शाम तक इंसान बनाने
की कोशिश में
करती रही वो अनगिनत बातें, अनवरत
प्रयास
बिना कहे, बिना सोचे, बिना
किसी दर्द के
कांच का पत्थर तराशते हाथों
से खून आने लगता है
पर माँ ने कभी रूबरू नहीं
होने दिया
अपने ज़ख्मों से, छिले हुए
हाथों से
हालांकि आसान नहीं था ये सब
पर माँ ने बाखूबी इसे अंजाम दिया
अब जब वो नहीं है मेरे साथ
पता नहीं खुद को इन्सान
कहने के काबिल हूं या नहीं
हां ... इतना जानता हूं
वो तमाम बातें जो बिन बोले
ही माँ ने बताई
शुमार हो गई हैं मेरी आदतों
में
सच कहूं तो एक पल मुझे अपने
पे भरोसा नहीं
पर विश्वास है माँ की कोशिश
पे
क्योंकि वो जानती थी मिट्टी
को मूरत में ढालने का फन
और फिर ...
मैं भी तो उसकी ही मिट्टी
से बना हूं