हरे पहाड़ों की चोटियों से उतरते सफ़ेद बादल रुक जाते हैं बल खाती काली सड़क के सीने पर ललक है तुम्हें छूने की इतना करीब से की समेट सकें तेरी साँसों की महक उम्र भर के लिए
वो जानते हैं झाँकोगी तुम खुली खिड़की से छुओगी नर्म हथेली से वो रेशमी एहसास ... ठीक उसी वक़्त मैं भी हो जाऊँगा धुँवा-धुँवा घुल जाऊँगा बादलों की नर्म छुवन में
सुन प्रकृति की अप्रतिम रचना ... मेरे जंगली गुलाब छू के देखना अपने माथे की चन्द लकीरों उस पल नमी की बूँद में महसूस करोगी मुझको